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सुप्रीम कोर्ट ने धारा 324 को माना बेलेबल:श्रीगंगानगर के एक मामले में रिव्यू याचिका पर कहा- पुलिस थाने में हो सकती है जमानत

बीकानेर2 महीने पहले
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 324 में मामला दर्ज होने पर आरोपी को पुलिस थाने से ही जमानत मिल सकती है। आईपीसी की धारा 324 को लेकर अभी तक असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। क्योंकि केन्द्र सरकार ने 2005 में एक संशोधन कर इसे गैर जमानतीय अपराध घोषित कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ये एक बेलेबल ऑफेंस है। सुप्रीम कोर्ट ने श्रीगंगानगर जिले के एक प्रार्थी की और से दाखिल रिव्यू याचिका पर यह टिप्पणी की है। यह धारा किसी के उपर जान बूझकर हथियार से हमला करने के जु्र्म में लगाई जाती है।

दरअसल, वर्ष 2005 में सरकार ने CRPC में संशोधन करते हुए खतरनाक हथियार से हमला करने के अपराध को IPC की धारा 324 के तहत गैर जमानतीय अपराध घोषित तो किया था। लेकिन उसका प्रोसेस पूरा नहीं किया। ऐसे में सीआरपीसी के रिकॉर्ड में ये अपराध आज भी जमानत देने लायक है। संसद की ओर से भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम 2005 के तहत यह किताबों में भी पब्लिश कर दिया गया था। इससे असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। अब सर्वोच्च न्यायालय ने 26 नवंबर को श्रीगंगानगर जिला निवासी प्रार्थी आकाशदीप मौर्य की रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई करते हुए एक मामले में इसे स्पष्ट किया है। हालांकि प्रार्थी को किसी प्रकार की राहत नहीं दी गई है। जज के एम जोसेफ, पी. एस. नरसिम्हा की अदालत ने इस पर सुनवाई की।

आवश्यक निर्देश नहीं
एडवोकेट निमेष सुथार ने जानकारी देते हुए बताया कि दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) 2005 में उक्त अपराध को अजमानतीय की केटेगरी में डाला गया था लेकिन सरकार ने इसके लिए आवश्यक निर्देश जारी ही नहीं किए थे। इसी कारण ये संशोधन लागू ही नहीं हुए। ऐसे में आज भी ये धारा जमानतीय है। थाना स्तर पर इसकी जमानत हो सकती है। एडवोकेट निमेष सुथार का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश संपूर्ण देश के उच्च न्यायालयों तथा अधीनस्थ न्यायालयों व पुलिस थानों में उक्त अपराध के आरोपित व्यक्तियों को त्वरित न्याय मिलने में सहायक होगा। इस धारा के अपराध के कारण जो लोग जेल में है, उन्हें इससे राहत मिल सकती है।

क्या था मामला
दरअसल, बीकानेर संभाग के श्रीगंगानगर जिला निवासी आकाशदीप मौर्यका सिविल जज परीक्षा में सिलेक्शन हो गया, लेकिन उन्हें इस आधार पर नियुक्ति नहीं दी गई कि उनके खिलाफ धारा 324 के तहत मामले दर्ज हैं। मौर्य पर आईपीसी की धारा 324 के तहत मारपीट करने के कुल चार मामले वर्ष 1999 से 2012 के बीच में दर्ज हुए थे। इनमें दो मामलों पर पुलिस ने ही एफआर लगा दी जबकि दो में पुलिस ने चालान पेश किया। एक भी केस में सजा नहीं मिली, बल्कि बरी हो गए।

मौर्य ने इस पर हाईकोर्ट में ही याचिका दायर की। इस पर धारा 324 को इतना गंभीर नहीं माना गया कि नौकरी नहीं दी जा सके। इसके बाद हाईकोर्ट प्रशासन ने ही सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए अपना पक्ष रखा। हाईकोर्ट प्रशासन का कहना था कि सिविल जज के महत्वपूर्ण पद पर ऐसे मामलों में नियुक्ति नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में आकाशदीप मौर्य को नियुक्ति देने का आदेश तो नहीं दिया लेकिन ये स्पष्ट कर दिया कि IPC की धारा 324 जमानती अपराध है।