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वाइल्ड लाइफ:उज्बेकिस्तान से 1857 किमी उड़ कर जोड़बीड़ पहुंचा गिद्ध, सैटेलाइट ट्रैकिंग से पहली बार जगह का पता चला

बीकानेर19 दिन पहलेलेखक: नवीन शर्मा
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उज्बेकिस्तान से दो महीने में 1857 किलोमीटर की दूरी तय कर एक गिद्ध भोजन की तलाश में जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व में आया है। - Dainik Bhaskar
उज्बेकिस्तान से दो महीने में 1857 किलोमीटर की दूरी तय कर एक गिद्ध भोजन की तलाश में जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व में आया है।
  • उज्बेकिस्तान में गिद्धों के केवल 135 जोड़े ही बचे हैं, प्रजाति को बचाने के लिए रखी जा रही नजर

उज्बेकिस्तान से दो महीने में 1857 किलोमीटर की दूरी तय कर एक गिद्ध भोजन की तलाश में जोड़बीड़ कंजर्वेशन रिजर्व में आया है। गिद्ध की सैटेलाइट टेगिंग के कारण पहली बार उसके स्थान का खुलासा हुआ है। बुल्गारियन प्रोटेक्शन सोसायटी ऑफ बर्ड के साइंटिस्ट बुल्गारिया निवासी ब्लादमीर और ब्रिटेन के जॉन बर्न साइट ने जुलाई 2021 में 60 दिन के दो गिद्धों की सैटेलाइट टेगिंग की थी। उनके पैर में एक रिंग डाली और पीठ पर जीपीएस के साथ सोलर प्लेट लगा कर उन्हें छोड़ा था। यह टेगिंग काराकुम डेजर्ट में की गई थी।

इजिप्शियन की नेपटॉन पिटोरियस प्रजाति के इन गिद्धों को आरयास नाम दिया गया। इनमें से एक गिद्ध पाकिस्तान के कराची में रुक गया और दूसरा यहां जोड़बीड़ आ गया। सैटेलाइट से उसकी लोकेशन को ब्लादमीर ने अपनी बेबसाइट पर डाला। उसे देखने के बाद बीकानेर के वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ डीएल बोहरा गिद्ध को कैमरे के कैद करने के लिए तीन दिन तक जोड़बीड़ में डेरा डाले रहे।

उन्होंने ब्लादमीर से संपर्क कर गिद्ध के बारे में जानकारी जुटाई। बोहरा ने बताया कि सैटेलाइट इमेज से गिद्ध की लोकेशन जोड़बीड़ में नजर आ रही है। यहां करीब तीन हजार इजिप्शियन की नोफ्रोमिक प्रजाति के गिद्ध है। उज्बेकिस्तान से आया गिद्ध उनमें घुल मिल गया है। उसे लगातार मॉनिटर किया जा रहा है। बोहरा ने बताया कि इस गिद्ध का ऑफ रूट आना खोज का विषय है।

2019 में शुरू हुई थी गिद्धों की टैगिंग

उज्जबेकिस्तान में गिद्धों के संरक्षण के लिए 2019 में उनकी टैगिंग का काम शुरू हुआ था। वहां मात्र 135 जोड़े ही बचे हैं। आम तौर पर ठंड ज्यादा होने पर गिद्ध भोजन की तलाश में अफ्रीका, दक्षिणी अरेबिया जाते हैं। ऐसा पहली बार पता चला है जब वहां से कोई गिद्ध जोड़बीड़ आया है।

सैटेलाइट से मिलता है हवा, तापमान, ऊंचाई का डेटा : प्रवासी पक्षियों पर अध्ययन करने का सबसे आधुनिक तरीका उपग्रह टेलीमेट्री है। इसमें आधुनिक ट्रांसमीटर लगाया जाता है, जो नेविगेशन सिस्टम और सौर पैनल से लैस होता है। उसमें सेंसर भी लगे होते हैं। यह सेंसर स्थान, हवा के तापमान, ऊंचाई और उड़ान की गति आदि का डेटा भेज सकते हैं। ऐसा माना जाता है कि पक्षी 10 वर्षों से भी अधिक समय अपने संकेतों को संचारित कर सकते हैं।

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