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  • The Young "martyr", Who Lost His Life In The Maneuvers, May Not Be Considered, But The Tricolor Remained Wrapped Around The Chest Till The Last Moment.

अंतिम विदाई:जिंदा जलने वाले जवान 'शहीद' भले ही न कहलाये, लेकिन आखिरी क्षणों तक तिरंगा सीने से लिपटा रहा, आज हुई अंतिम विदाई

बीकानेर4 महीने पहले
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आग में झुलसने के बाद इस तरह हो गया था जवान का शव। - Dainik Bhaskar
आग में झुलसने के बाद इस तरह हो गया था जवान का शव।

भारत और पाकिस्तान की सीमा से कुछ किलोमीटर दूर युद्धाभ्यास में जुटे सेना के जो तीन जवान जिंदा जल गए थे। उन्हें सैन्य सम्मान के साथ उनके घर ले जाया गया। जहां उनका अंतिम संस्कार भी हो गया। यह जवान 'शहीद' की परिभाषा में तो शामिल नहीं हो सके। लेकिन अंतिम क्षण तक उनके सीने से तिरंगा लिपटा रहा। घटना के दाे दिन बाद भी राजियासर में इस बड़ी क्षति से लोगों की आंखें नम है। शुक्रवार को आंध्रप्रदेश के ऐवेनेजर हमाडाला और पश्चिम बंगाल के देवकुमार का अंतिम संस्कार हो गया, वहीं शनिवार को सुबेदार अजीत शुक्ला का इलाहबाद स्थित उनके पैतृक गांव में अंतिम संस्कार हुआ।

सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल अमिताभ शर्मा ने दैनिक भास्कर को बताया कि तीनों जवानों के शव उनकी ब्रिगेड के हवाले कर दिए गए थे। जहां से वो पूरे सम्मान के साथ परिजनों तक पहुंचा दिए गए। भटिंडा से युद्धाभ्यास के लिए आए यह जवान उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश के थे। तीनों युवा थे। कुछ के परिवार संभवत: भटिंडा रहे होंगे और कुछ जवान अकेले भी रहे। शुक्रवार को ऐवेनेजर और देवकुमार का उनके गांव में अंतिम संस्कार हुआ तो शनिवार को दोपहर सुबेदार अजीत शुक्ला को अंतिम विदाई दी गई। तीनों के परिवार अपने लाल को खोने से दुखी है।

क्या तीनों शहीद माने जाएंगे? इस सवाल पर एक सैन्य प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल शर्मा ने बताया कि किसी तरह की कार्रवाई के दौरान वीरगति को प्राप्त होने वाले ही शहीद कहे जाते हैं। इन तीनों जवानों की मौत ऑपरेशनल एक्टिविटी के दौरान एक टास्क में हुई है, ऐसे में इन्हें सामान्य मृत्यु से थोड़ा अलग माना जाता है। ऐसे मामलों में भी जान देने वाले जवानों के सीने से तिरंगा लिपटा होता है। यह किसी सेना के जवान के लिए सबसे बड़ा मान व सम्मान है। सेना में रहते हुए भी सामान्य मौत पर ऐसा सम्मान नहीं मिलता। चूंकि यह जवान ऑपरेशनल एक्टिविट का हिस्सा थे, इसलिए इन्हें भी तिरंगे जैसा सर्वोच्च सम्मान मिला।

मिलते हैं सभी तरह के लाभ
इस तरह जवानों के चले जाने के बाद उनके परिवारों के प्रति सेना काफी गंभीर व संवेदनशील रहती है। ऐसे परिवारों की फैमिली पेंशन के साथ ही सभी तरह के आर्थिक लाभ दिए जाते हैं। जब तक बच्चे वयस्क नहीं हो जाते हैं, तब तक उनकी शिक्षा सहित अन्य जिम्मेदारी के प्रति सेना के पास रहती है।

दुखी है जवानों के साथी
भटिंडा की 47-AD यूनिट के जवान भी इस दुर्घटना के दो दिन बाद भी दुखी हैं। कुछ जवान अपने साथी के शवों के साथ गांव तक गए हैं तो बाकी जवान फिर अभ्यास में जुट गए हैं। पूरे जोश के साथ राष्ट्र के लिए अभ्यास कर रहे यह जवान तन्हा होते ही फिर उन्हें याद करने लगते हैं। खासकर जो पांच जवान उसी वाहन में सवार थे, वो रह रहकर अपने मित्रों को याद कर रहे हैं। इन सभी की हालत अब खतरे से बाहर हैं।