विजय दिवस विशेष-1:3 दिसंबर को युद्ध छिड़ा, हमारे जांबाजों ने 2 दिन में पाक की 3 चौकी कब्जा ली

बीकानेरएक महीने पहलेलेखक: नवीन शर्मा
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1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान की रनिहाल पोस्ट को कैप्चर किया था। यह तस्वीर सेना की उस टुकड़ी की है, जिसने रनिहाल पर तिरंगा फहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पोस्ट को कैप्चर करने के बाद यह तस्वीर ली गई थी। - Dainik Bhaskar
1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान की रनिहाल पोस्ट को कैप्चर किया था। यह तस्वीर सेना की उस टुकड़ी की है, जिसने रनिहाल पर तिरंगा फहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पोस्ट को कैप्चर करने के बाद यह तस्वीर ली गई थी।

1971 का युद्ध बीकानेर से सटी भारत-पाक सीमा के सांचू बॉर्डर पर भी लड़ा गया था। तीन दिसंबर से शुरू हुआ युद्ध 16 दिसंबर को खत्म हो गया। भारतीय सेना ने पाकिस्तान की तीन चौकियां रनिहाल, बीजनोठ और रुकनपुर पर कब्जा कर लिया। बीकानेर में 1971 की लड़ाई में शामिल होने वाले 28 वार हीरो में से छह शहीद हो गए थे। इन सभी ने देशभर में अलग-अलग मोर्चों पर लड़ाई लड़ी थी।

इससे पहले 1965 में हमारी सांचू सीमा चौकी को पाकिस्तान ने कैप्चर कर लिया था। भारत-पाक के बीच भीषण युद्ध हुआ। उस युद्ध में भारतीय सेना ने सांचू को वापस पाक से छीना था। उस वक्त आरएएसी भी सेना के साथ युद्ध में शामिल हुई थी। भारत-पाक युद्ध के स्वर्णिम वर्ष पर 16 दिसंबर को विजय दिवस के उपलक्ष्य में भास्कर लाया है सेना के विशेष सहयोग से उन योद्धाओं के किस्से, जिन्होंने पाक सेना को घुटने टेकने पर मजबूर किया।

भारत की पाक पर जीत का पर्व है विजय दिवस
1971 के युद्ध में भारतीय सेना ने बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजाद कराया था। 16 दिसंबर को पूर्वी पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल खान नियाजी ने अपने 93 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण किया था। इस जीत के बाद बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का निर्माण हुआ। इसलिए हर साल 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है।

बीकानेर के 6 लाल 1971 के युद्ध में दुश्मनों से लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए

रफीक खान, वीर चक्र 5 ग्रेनेडियर
ग्रेनेडियर्स की एक बटालियन को ईस्ट में दुश्मन की चौकी पर कब्जा करने का टास्क मिला था। ग्रेनेडियर रफीक खान रेंगते हुए चौकी की तरफ बढ़े और बंकर में एक हथगोला फेंका, जो बाहर ही फट गया। वे गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने अदम्य साहस दिखाते हुए दूसरा ग्रेनेड फेंक दुश्मन की लाइट मशीन गन को खामोश कर दिया।

नारायण सिंह, 8 राजरिफ
नारायण सिंह की यूनिट को जम्मू कश्मीर में तंगधार (चौकीबल) एरिया में रिंग कंटूर पाक पोस्ट को कैप्चर करने का टास्क मिला था। सिंह एलएमजी चलाते वक्त काउंटर अटैक में शहीद हो गए।

भगवत सिंह, 14 ग्रेनेडियर
सेना की 14 ग्रेनेडियर को जम्मू कश्मीर के बिंबरजली सेक्टर में पाक की पोस्ट दूरतला को कैप्चर करने का टास्क मिला था। लड़ाई के दौरान आमने-सामने फायरिंग में भगवत सिंह को गोली लग गई।

केके मजूमदार, 10 बिहार
अखौरा की लड़ाई 1971 के युद्ध की सबसे महत्वपूर्ण थी। ढाका पर अंतिम कब्जा करने के लिए इसका एक बड़ा सैन्य महत्व है। 57 एमटीएन डिविजन को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के सीमावर्ती शहर अखौरा पर कब्जा करने का काम सौंपा गया था। सैकंड लेफ्टिनेंट मजूमदार उस युद्ध में शहीद हो गए।

जय सिंह, 14 ग्रेनेडियर
सेना की 14 ग्रेनेडियर के जय सिंह भी उस दौरान भगवत सिंह के साथ ही थे। उन्होंने भी दुश्मन से जमकर लोहा लिया और अंत में वीरगति को प्राप्त हुए।

तेजमाल सिंह, 19 राजरिफ
युद्ध के समय सेना की 19 राजरिफ बटालियन बांग्लदेश में ही डिप्लॉयड थी। लड़ाई के दौरान तेजमाल शहीद हो गए।

1971 के युद्ध में बीकानेर के शूरवीरों ने अदम्य साहस दिखाया। ऐसे वीरों की कहानी उन्हीं की जुबानी

1. श्याम सुदंर सिंह राठौड़, डिप्टी कमांडेंट बीएसएफ

भारी बरसात में भी मोर्चे पर डटे रहे
युद्ध के समय 18 बटालियन को बनगांव में बांग्लादेश बॉर्डर पर तैनात किया गया था। मेरे पास कंपनी कमांडर के साथ-साथ वाहिनी दंडपाल व क्वार्टर मास्टर की भी जिम्मेदारी थी। एक रात दुश्मन ने अटैक कर दिया। हम 15 जवान थे। दो जवान जख्मी हो गए। चार जवानों के साथ उन्हें मेडिकल कैंप भेज दिया। अब नौ ही रह गए। भारी बरसात हो रही थी। बिजली चमकने पर छिपे हुए दुश्मन की लोकेशन का पता चलता था। सेना से आर्टिलरी सपोर्ट मांगा। एक गोला हमारे पास आकर फटा। उसके धमाके से मेरे कान का पर्दा फट गया और खून बहने लगा।

2. जगमाल सिंह राठौड़, वीर च्रक, ब्रिगेडियर

पाक की तीन चौकियां कैप्चर की
3 दिसंबर 71 को बीकमपुर में हमारी पलटन के सैनिक कबड्‌डी खेल रहे थे। उसी दौरान कर्नल विजय सिंह बंकर से निकले और जोर से चिल्लाए, मूव...। खेलना छोड़ सभी वर्दी पहन कर तैयार हो गए। रात होने पर गंगा रिसाला ने कूच किया। सांचू पहुंचकर पाक की रनिहाल पोस्ट पर हमला किया। रनिहाल को घेर लिया। एलएमजी से ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं। मोर्टार दागे। दुश्मन डर गया और सफेद झंडा लहरा दिया। रनिहाल पोस्ट बीएसएफ को सौंप हम आगे बढ़े। पाक की रुकनपुर और बीजनोठ पोस्ट को भी कैप्चर कर लिया।

3. भंवर सिंह, वीर चक्र, हवलदार
पाक से जीता टैंक बीकानेर में खड़ा
1971 की लड़ाई में हमारी पलटन को खेमकरण सैक्टर में तैनात किया गया था। वहां दुश्मन के टैंक बेकाबू हो रहे थे। उन्हें ठिकाने लगाना था। पलटन ने जोरदार हमला किया। ग्रेनेड टैंक के अंदर फैंके। दो टैंक तबाह किए। इससे पहले 1965 की लड़ाई भी इसी सेक्टर में लड़ी। खबर मिली थी कि पाक आर्मी अमृतसर के रास्ते दिल्ली पहुंचकर झंडा फहराने की तैयारी कर रही है। हमारी पलटन को उन्हें रोकने भेजा तो दुश्मन ने हमला कर दिया। हम दूसरे रास्ते से असलउत्तर की ओर गए। मोर्टार से तीन टैंक तोड़ डाले। सौ टैंकों पर कब्जा कर लिया। पाक सेना से जीता एक पेटन टैंक आज भी पब्लिक पार्क में खड़ा है।

4. हेम सिंह शेखावत, सेना मेडल, कर्नल

पाक में 80 किमी तक घुसकर मारा
उस वक्त मैं 10 पैरा बटालियन में था। लेफ्टिनेंट जनरल सवाई भवानी सिंह के नेतृत्व में हमारी बटालियन ने छह दिसंबर की रात 11 बजे छाछरो के लिए कूच किया। सबसे पहले किता पोस्ट कैप्चर की। सात दिसंबर को सुबह छाछरों पर कब्जा कर लिया। पाकिस्तान के स्टार फाइटर्स बमबारी करते रहे, लेकिन हमें नुकसान नहीं पहुंचा सके।

अगले दिन वीरवाह और नगरपारक पर विजय पताका फहराई। वहां के तहसील हैडक्वार्टर पर कब्जा कर लिया। करीब 80 किलोमीटर तक अंदर घुसकर दुश्मन को तबाह किया। भाखासर और खीनसर होते हुए बाड़मेर पहुंचे।

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