अनदेखी:14 वर्ष बाद भी 103 बीघा जमीन का नहीं हुआ नियमन

चौमूएक महीने पहले
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  • खसरा नं 855 की भूमि पहले थी चरागाह, कब्जों के बाद पूरी कॉलोनी बस गई, पट्टा देने पर अब तक नहीं हुआ निर्णय

धर्मेंद्र शेखावत | किशनगढ़-रेनवाल शहर में 14 वर्ष पहले खसरा नं. 855 की 103 बीघा चरागाह भूमि नगरपालिका के नाम हुई थी, लेकिन आज तक भूमि का न तो नियमन हुआ और न ही अतिक्रमियों को हटाने की कार्रवाई हुई। वर्षों पहले चरागाह भूमि पर राजस्व विभाग व नगरपालिका प्रशासन की नाकामी से धीरे-धीरे पूरी जमीन पर अतिक्रमण हो गया। वर्ष 2007 में खारड़ा क्षेत्र की उक्त चरागाह भूमि को सरकार ने भू रूपांतरण कर नगरपालिका के नाम कर दी थी, लेकिन नगरपालिका ने आज तक नियमन करने के लिए कोई प्रयास ही नहीं किया।प्रशासन शहरों के संग अभियान का मुख्य उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा पट्टे जारी कर राजस्व एकत्रित करना है, लेकिन अभी तक उक्त 103 बीघा जमीन पर बसे लोगों को पट्टा देने पर कोई निर्णय नहीं हुआ है।

करोड़ों रुपए की हो सकती है आय

सरकार के नियमों के अनुसार 300 वर्गगज तक के वर्षों से काबिज लोगों को निर्धारित दर पर नियमन किया जा सकता है। इससे ज्यादा के कब्जों को बोर्ड बैठक में प्रस्ताव लेकर अलग से दरें तय कर नियमन हो सकता है। अधिक जमीन पर काबिज लोगों को बेदखल भी किया जा सकता है, लेकिन नक्शा पास हुए आठ वर्ष के दौरान कभी भी नगर पालिका प्रशासन न तो नियमन की कार्रवाई शुरू की और न ही बोर्ड नियमन का प्रस्ताव लेने की हिम्मत जुटा सका। कारण चारागाह भूमि पर सैकड़ों लोगों के अवैध कब्जे है, जिनमें कई रसूखदार एक हजार से अधिक वर्गगज पर काबिज है। अगर नगरपालिका उक्त भूमि को नियमन करें, तो करोड़ों रुपए की पालिका को आय हो सकती है। चरागाह से लगती भूमि पर आवासीय जमीन के भाव 3 से 4 हजार रुपए वर्गगज है, जबकि दुकान के 8 से 10 लाख रुपए प्रति दुकान है।

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