संतान का सुख देती है श्रवण माता:चीथवाड़ी में पहाड़ी पर बसा श्रवण माता मंदिर, सच्चे मन और श्रद्धा से प्रार्थना करने पर हर मनोकामना पूरी करती है मां

चौमूं2 महीने पहले
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श्रवण माता मंदिर में लगी मां की प्रतिमा। - Dainik Bhaskar
श्रवण माता मंदिर में लगी मां की प्रतिमा।

चीथवाड़ी गांव में अरावली की पहाड़ी के बीच श्रवण माता वैष्णो देवी का मंदिर शक्तिपीठ के रूप में स्थापित है। माताजी अपनी कई चमत्कारी शक्तियों व कृपा के लिए प्रसिद्ध है। श्रद्धालु चैत्र व शारदीय नवरात्रि पर माता के धोक लगाकर मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करते हैं। गुरुवार को शारदीय नवरात्र के मौके पर मंदिर में घट स्थापना की गई। नवरात्र में मंदिर में रोजाना शाम को 101 दीपोत्सव के साथ महाआरती होगी। अष्टमी के दिन विशेष पूजा अर्चना की जाएगी और 1008 दीपोत्सव के साथ महाआरती का आयोजन होगा। इस दौरान कोरोना गाइडलाइन के तहत श्रद्धालुओं को प्रवेश दिया जाएगा।

पुजारी रामनारायण शर्मा ने बताया कि जागा की पोथी के अनुसार संवत 1132 में चीथवाड़ी की पहाड़ी पर गुमटी बनाकर शक्तिपीठ के रूप में श्रवण माता वैष्णो देवी मंदिर की स्थापना की गई थी। बड़े बुजुर्गों के अनुसार श्रवण माता मंदिर की प्रधान पीठ कोटपूतली के पास सरुण्ड गांव में पहाड़ी पर है। जो सरुण्ड माता के नाम से जानी जाती हैं। कालांतर में भाषा अपभ्रंश के चलते सरुण्ड माता को श्रवण माता कहने लगे।

पहाड़ी के बीच माता का मंदिर।
पहाड़ी के बीच माता का मंदिर।

किवंदती है कि बहुत समय पहले कुछ श्रद्धालु बैलगाड़ियों पर खाद्य सामग्री व अन्य सामान के साथ ध्वज यात्रा लेकर सरुण्ड गांव जा रहे थे। रास्ते में एक चरवाहा भेड़-बकरियां चरा रहा था। पदयात्रा में कुछ उत्पाती श्रद्धालुओं ने चरवाहे की भेड़ का बच्चा चुराकर बैलगाड़ी में छुपा लिया। चरवाहे को पता चला तो वह लोगों के साथ श्रद्धालुओं को पीटने के लिए आया। तब श्रद्धालुओं ने जान बचाने के लिए माता से क्षमा याचना की और भविष्य में ऐसी गलती नहीं करने का वचन दिया। जब चरवाहे ने बैलगाड़ी में भेड़ के बच्चे को ढूंढना शुरू किया तो भेड़ के बच्चे के स्थान पर मिठाई मिली। श्रद्धालुओं ने माता का चमत्कार देख उसे अपने साथ चलने की प्रार्थना की। जिस पर श्रवण माता ने आकाशवाणी करते हुए कहा कि भक्तों यहां से मेरा एक पत्थर बैलगाड़ी में रखकर ले जाओ। जहां पत्थर के बोझ से बैलगाड़ी रुक जाए, वहीं पत्थर को रखकर पूजा करना शुरू कर देना।

श्रद्धालु माता के पत्थर को बैलगाड़ी में रखकर चीथवाड़ी के रास्ते से गुजर रहे थे कि चीथवाड़ी पहाड़ी पर बैलगाड़ी खुद ही रुक गई और आगे नहीं बढ़ी। इस पर श्रद्धालुओं ने गुमटी बनाकर सरुण्ड माता के नाम का पत्थर रखकर पूजा करने लगे। तब से ही श्रवण माता का मंदिर चीथवाड़ी समेत आसपास के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन गया। श्रवण माता शक्तिपीठ संतान का सुख देने वाली माता के नाम से भी मंदिर प्रसिद्ध है। जिस दंपती को संतान सुख की प्राप्ति नहीं होती है, तो वो यहां सच्चे मन और श्रद्धा से भक्ति करें तो श्रवण माता उनकी प्रार्थना जरूर सुनती है।

वैशाख शुक्ल पंचमी 2015 में ग्रामीणों ने मंदिर विकास समिति बनाकर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। जीर्णोद्धार के बाद मंदिर में पत्थर की जगह माता के वैष्णो स्वरूप की मूर्ति रखवाई गई और गुंबद पर ध्वज लगाया गया है। गांव के युवाओं ने श्रवण माता चैरिटेबल ट्रस्ट बनाया, जो मंदिर के विकास को लेकर काम कर रहा है। हर साल वैशाख शुक्ल पंचमी को श्रवण माता का पाटोत्सव, मेला व भंडारा भरता है। कोरोना काल के चलते पिछले दो साल से मेला व भंडारे का आयोजन नहीं किया गया है। इसके अलावा साल में दो बार चैत्र व शारदीय नवरात्रों में भी मेले का आयोजन होता है। इस बार नवरात्रों में भरने वाले मेले को स्थगित कर दिया गया है।

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