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जिला अस्पताल के कोविड प्रभारी की राय:पेशेंट और उसके अटेडेंट की सोच पाॅजिटिव है तो कोरोना से बचा जा सकता है

दौसाएक महीने पहले
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कोरोना की दूसरी लहर में पाॅजिटिव आने की बात सुनकर ही लोगों की धूजणी चढ़ जाती है, लेकिन हकीकत यह है कि पेशेंट और उसका अटेडेंट की सोच पाॅजिटिव है तो कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। चाहे मरीज का ऑक्सीजन लेवल व सीटी स्कोर कितना भी हो, यह कोई मायने नहीं रखता है। मेरे पास इसके दो बड़े उदाहरण है।

केस 1 : बिजली निगम में 40 वर्षीय इंजीनियर का डिस्चार्ज के समय ऑक्सीजन का लेवल 95 था। वह भर्ती होने के पहले दिन से कह रहा था कि डाॅक्टर साहब मैं बचूंगा नहीं। उसके मन में बैठे डर व नेगेटिव अप्रोच के चलते वह अनावश्यक ही दिखाने के लिए जयपुर चला गया। जयपुर में डाॅक्टर व एक से दूसरे हाॅस्पिटल के चक्कर लगाता रहा, लेकिन आखिर में उसकी मौत हो गई।

केस 2 : नांगल राजावतान का 70 साल का व्यक्ति का ऑक्सीजन लेवल मात्र 20 पर अा गया था। वह 5 दिन तक भर्ती रहा। वह रोजाना एक ही बात कहता था कि डाॅक्टर साहब मेरी छुट्टी कर दो, मैं ठीक हूं। डिस्चार्ज के बाद पूर्ण स्वस्थ है।

जिला चिकित्सालय में कोविड प्रभारी डाॅ.आरडी मीणा का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर में मरने वालों में ज्यादातर युवा हैं। अधिकांश युवा सोचते हैं कि उनकी बाॅडी फिट है। मुझे कुछ नहीं हो सकता है। संक्रमित होने के बावजूद 5-7 दिन तक हाॅस्पिटल आते ही नहीं हैं।

तबीयत ज्यादा खराब होने पर जब हाॅस्पिटल आते हैं तो अधिकांश युवाओं के फेफड़े 60 से 90% तक डैमेज हो चुके होते है, तब जान बचाना मुश्किल होता है। पब्लिक को जागरुक होना पड़ेगा, सिस्टम के पास सीमित संसाधन है।

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