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मन से त्यागें मृत्यु भोज:कुरीतियों पर पैसा बहाने की बजाय शिक्षा पर खर्च कर पेश की मिसाल

दौसा21 दिन पहले
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  • मृत्यु पर गम बांटिए..! एेसा कुछ करें कि पीढ़ियां रखे याद, झूठी शान से कोई फायदा नहीं, समाज के विकास पर दिया जोर
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मृत्यु भोज की कुरीति को मिटाने के लिए कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने तेरहवीं न कर समाज को एक ऐसी नसीहत दी कि ऐसे सदकार्य लोग करने लगें तो इन कुरीतियों का खात्मा ही जल्द हो जाए। दरअसल दुख के समय परिवार के किसी प्रिय का निधन होता है तो लोग तेरहवीं में पैसा खर्च करके समाज के रीति रिवाज को निभाते हैं। जबकि इन कुरीतियों को निभाने के चक्कर में खाने पीने की वस्तुओं पर पैसा खर्च करने के बजाय यदि परिजन की स्मृति में कुछ ऐसा काम किया जाए तो पीढ़ियां उनकी स्मृति को जन्म-जन्मों तक याद रख सकती हैं।

मृत्यु भोज रोकने व कुरीतियों पर विराम लगाने की दिशा में हमारा पूरा समर्थन
गीजगढ़ निवासी यश निर्बाण ने बताया कि मृत्यु भोज पर पकवान बनवाकर लोग गरीब को कर्ज में धकेल देते हैं। यह प्रथा बंद होनी चाहिए। धांधोलाई के कमल सैनी कहते हैं कि 80 साल पहले ही हमारे गुरूजी ने मृत्यु भोज बंद करा दिया था। सभी को यह निर्णय मानना चाहिए। कुंडल के रितिक शर्मा ने कहा कि मृत्यु भोज जैसी सामाजिक कुप्रथा के कारण ही समाज का विकास अवरुद्ध हो रहा है। महवा के सतीश सोनी बोले झूठी शान में दिखावे के लिए लोग क्षमता से अधिक खर्च कर परिवार को कर्ज के दलदल में धकेल रहे हैं। डिडवाना के अभिनव जैमिनी ने कहा कि समाज को इस कुप्रथा पर अब विराम लगाना ही होगा। प्रकाश शर्मा गड्डू ने बताया कि इस कुप्रथा का अंत करना बहुत जरूरी है। लोग दबाव बनाकर खर्च कराते हैं जो गलत है।

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