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मन से त्यागें मृत्यु भोज:ऐसी रूढि़वादी परंपरा को निभाना उचित नहीं, जो परिवार को कर्ज में डुबो दे

दौसा22 दिन पहले
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  • मौत पर गम बांटिए..! सामाजिक कार्यों से जुड़कर आप दिवंगत परिजन को दे सकते हैं श्रद्धांजलि
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सगे संबंधियों की मौत पर जहां एक ओर परिजन रोते बिलखते हैं वहीं दूसरी ओर तेरहवीं का भोज भी करते हैं। माली हालत अच्छी नहीं होने पर समाज के चलन को निभाने के लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। इसमें न केवल साहूकारी ब्याज चुकाना पड़ता है। बल्कि कभी कभी जमीन बेचने तक की नौबत आ जाती है। इस प्रकार के हालात समाज के हर वर्ग में बनते हैं। पर लोग इसे उजागर नहीं होने देते। पिछले सालों में मृत्यु हो जैसी सामाजिक कुरीति को लेकर सामाजिक संगठनों द्वारा शुरू की गई मुहिम से अंदर ही अंदर प्रसन्न सब लोग हैं।

युवा वर्ग में आई अधिक जागरूकता,अभी नहीं चेते तो फिर हो जाएगी देर
कई समाज मृत्यु भोज कर चुके बंद युवा वर्ग में अधिक जागरूकता खबर को लोगों ने पसंद किया। सोशल मीडिया पर मदन मीणा हरिपुरा ने कहा कि इस कुरीति पर विराम लगाने के लिए समाज को आगे आना चाहिए। त्रिशला महिला मंडल की प्रवक्ता विधि सेठी जैन ने कहा कि लॉक डाउन ने बहुत सबक सिखा दिए हैं। अब सभी को इस बुराई के खिलाफ एक होना चाहिए। धर्मराज सेहरा नंगल बेरसी ने कहा कि अब हम नहीं चेते तो फिर कब चेतना आएगी। मीणा समाज सुधार सेवा समिति के व्यवस्थापक गिर्राज रिंग्या बोले मृत्यु भोज और पगड़ी की रस्म से दोनों परिवार आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। एलके वैद्य महेश्वर ने कहा कि मृत्यु भोज की परंपरा समाप्त होनी ही चाहिए। ब्राह्मण परिषद के जिला अध्यक्ष दिनेश तिवारी ने कहा कि मृत्यु भोज एक सामाजिक अभिशाप है। यह समाज की उन्नति में बाधक है। राजेश मीणा गुमानपुरा ने कहा कि मृत्यु भोज करने के बजाय समाज सेवा के लिए आगे आना चाहिए।

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