• Hindi News
  • Local
  • Rajasthan
  • Jaipur
  • Dausa
  • Out Of 173 Village Cooperative Societies In The District, Only 90 Societies Are In Profit, Financial Crisis In Front Of 83 Administrators, Not Getting Salary

वित्तीय संकट:जिले में 173 ग्राम सहकारी समितियों में से मात्र 90 समितियां लाभ में, 83 व्यवस्थापकों के सामने वित्तीय संकट, नहीं मिल रहा वेतन

दौसाएक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
  • 83 व्यवस्थापकों के वेतन के लिए चाहिए 1 करोड़, 29 लाख, 48 हजार, ब्याज राशि के भरोसे जीएसएस व्यवस्थापकों की पगार

सरकारी सिस्टम की उदासीनता के चलते जिले में ग्राम सेवा सहकारी समितियों के व्यवस्थापकों को विगत 6 से 10 माह तक का वेतन नहीं मिला है। ऐसे में इन ग्राम समितियों में कार्यरत व्यवस्थापकों को आर्थिक परेशानी के साथ-साथ समितियों के संचालन में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मसलन, लाभ वाली समितियों को छोड़कर 83 व्यवस्थापकों के 6 माह के वेतन के लिए 1 करोड़, 29 लाख, 48 हजार की राशि चाहिए।दरअसल, राज्य सरकार की ओर से समितियों के खाते में ब्याज की राशि नहीं डाले जाने के कारण कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़ रहे हैं। वहीं समिति संचालन के होने वाले खर्च के लिए भी बजट तक नहीं है।

जिले में 173 ग्राम सेवा सहकारी समितियां संचालित हैं, जिन पर व्यवस्थापक व सहायक व्यवस्थापक कार्यरत हैं। कार्यरत कर्मचारियों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि पहले समिति ऑफलाइन थी, इस पर किसान सीधे ही ऋण के ब्याज सहित अन्य राशि समिति के खाते में जमा होती थी। जिसमें से व्यवस्थापक वेतन ले लेते थे और समिति के खर्चे के लिए भी राशि आसानी से उपलब्ध हो जाती थी। मगर, अब सरकार द्वारा समितियों को ऑनलाइन कर देने से स्थिति बदल गई है। अब किसानों को ऑनलाइन ऋण के साथ पैसों का लेनदेन भी ऑनलाइन ही होता है। जिसके चलते व्यवस्थापकों के हाथ में कोई राशि नहीं रहती है। सहकारिता अधिकारियों द्वारा भी समितियों से रिपोर्ट भिजवाने और निरीक्षण पर आने वाले अधिकारियों व राजनेताओं द्वारा कार्य करने के निर्देश मिलते हैं, मगर वित्तीय समस्या का समाधान नहीं किया जाता। समिति कर्मचारियों ने बताया कि अधिकारियों द्वारा हर माह रिपोर्ट के लिए लंबे-लंबे आदेश जारी कर दिए जाते हैं, जिनके लिए ना तो समिति के पास स्टेशनरी खरीदने के लिए बजट आवंटन किया जाता है और ना ही कंप्यूटरीकृत कार्य संपादन की व्यवस्था की जाती है।

यहां तक कि बिजली का बिल जमा कराने के लिए भी राशि स्वीकृत नहीं हो रही। मजबूरन, व्यवस्थापकों को इधर-उधर से पैसा लेकर समिति का संचालन करना पड़ रहा है। दूसरा, कोविड व ऋणी किसानों के डिफॉल्टर होने से यह समस्या उत्पन्न हुई है।सहकारी समिति यूनियन के जिलाध्यक्ष रमेशचंद्र भारद्वाज ने बताया कि 1 वर्ष से सरकार द्वारा ग्राम सेवा सहकारी समिति के लिए कोई बजट का आवंटन नहीं किया जा रहा है और ना ही समिति के खातों में ब्याज की राशि डाली जा रही है। इसके चलते समिति पर कार्यरत कर्मचारी वेतन की समस्या से जूझ रहे हैं। कई बार सरकार को ज्ञापन व अधिकारियों को प्रार्थना पत्र देकर समितियों के खाते में ब्याज की राशि डलवाए जाने की मांग की, मगर कोई सुनवाई नहीं हुई।जिला महामंत्री राजकुमार शर्मा ने बताया कि सरकार की अनदेखी के चलते समिति पर कार्यरत कर्मचारी बिना बजट के कोई कार्य नहीं कर पा रहे हैं।

समितियों पर स्टेशनरी का खर्चा,बिजली का बिल का खर्चा सहित अन्य सामान्य कार्यों के खर्चे के लिए भी व्यवस्थापकों को अपने स्तर पर ही व्यवस्थाएं करनी पड़ रही हैं।केंद्रीय सहकारी बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक जितेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि समितियों पर कार्यरत व्यवस्थापकों का वेतन समिति द्वारा ही दिया जाता है। समिति लाभ के लिए ज्यादा कार्य करेगी तो समिति की आय अधिक होगी। इससे आसानी से व्यवस्थापकों को हर माह वेतन मिल सकेगा।सभी समितियों को खाद बीज व ई-मित्र का लाइसेंस दे रखा है। उसके बाद भी व्यवस्थापक कार्य नहीं कर रहे हैं। बिना लाभ के लिए कार्य किए बिना पैसा कहां से आएगा और कैसे मिलेगा। हर माह मार्च के माह में ऋण वसूली से मिलने वाला ब्याज समितियों के खाते में डाला जाता है ।

जब तक वसूली नहीं करेंगे तो ब्याज समिति में कहां से डाला जाएगा। इनमें से भी 50% ब्याज ही डाला जाता है। जिसमें से व्यवस्थापकों पूरे 12 माह का वेतन नहीं मिल सकता है।व्यवस्थापकों का प्रति माह 26 हजार औसत वेतन : व्यवस्थापकों का प्रति माह 26 हजार औसत वेतन है। इससे आधी ही राशि ब्याज की मिल पा रही है, जिसके चलते पूरे 12 महीने का वेतन मिलना मुश्किल हो रहा है। समिति अच्छा लाभ का कार्य करेगी तो उन्हें वेतन के लिए इधर-उधर नहीं भटकना पड़ेगा।

खबरें और भी हैं...