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राजेश पायलट की 21वीं पुण्यतिथि:एयरफोर्स की नौकरी छोड़ राजेश्वर प्रसाद से बने राजेश पायलट पहली बार भरतपुर व पांच बार दौसा से सांसद चुने गए, ''राम-राम सा’’ के अभिवादन ने बनाई थी पहचान

दौसा9 दिन पहलेलेखक: राघवेंद्र सिंह गूजर
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दौसा के एक गांव में भोजन करते राजेश पायलट  (फाइल फोटो)। - Dainik Bhaskar
दौसा के एक गांव में भोजन करते राजेश पायलट (फाइल फोटो)।

“जब किसानों और मजदूरों के बच्चे पढ़-लिखकर उन कुर्सियों तक नहीं पहुंचेंगे, जहां से नीतियां बनती और क्रियान्वित होती हैं तब तक भारत का सही मायनों में विकास नहीं होगा“ ऐसा प्रेरणादायी बात कहने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री राजेश पायलट की आज शुक्रवार को पुण्यतिथि है। एयरफोर्स के पायलट राजेश्वर प्रसाद से किसान नेता राजेश पायलट बनने तक के सफर में वे गांधी परिवार के बेहद नजदीकी रहे और किसानों के सर्वमान्य नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई।

आज ही के दिन 11 जून 2000 को दौसा से जयपुर जाने के दौरान उनका भंडाना गांव के पास एक्सीडेंट हो गया था। उन्हें गंभीर हालत में जयपुर लाया गया। SMS अस्पताल के डॉक्टरों ने जैसे ही पायलट को मृत घोषित किया तो अस्पताल के चारों तरफ रोना सुनाई देने लगा। लोग अपने आपको संभाल नहीं पा रहे थे। उनका आकर्षक व्यक्तित्व और लोगों से जुड़ाव ऐसा था कि उनकी मृत्यु का समाचार जिसने भी सुना रोए बिना नहीं रह सका। उनके निर्वाचन क्षेत्र दौसा में तो ऐसा मातम पसरा कि हजारों घरों में उस शाम का चूल्हा भी नहीं जला था।

जीवन परिचय
10 फरवरी 1945 को उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर के वेदपुरा गांव में एक गुर्जर परिवार में राजेश्वर प्रसाद का जन्म हुआ था। 11 साल की छोटी उम्र में पिता का आकस्मिक देहांत होने के बाद परिवार की जिम्मेदारी की भावना बहुत कम उम्र में ही उन पर आ गई। उस उम्र में पैदल कई किलोमीटर नंगे पैर चलते हुए भी शिक्षा पूरी करने की लगन और कुछ करने की चाहत लिए राजेश्वर प्रसाद को कुछ सालों के बाद गांव छोड़कर दिल्ली आने का निर्णय लेना पड़ा, जहां उनके चचेरे भाई की दूध की डेयरी थी।

राजेश पायलट के साथ दौसा विधायक मुरारीलाल मीणा (फाइल फोटो)।
राजेश पायलट के साथ दौसा विधायक मुरारीलाल मीणा (फाइल फोटो)।

स्कूल के दिनों दूध बेचा
राजेश्वर प्रसाद स्कूल दिनों में दूध बेचा करते थे। सुबह जल्दी उठते, दूध निकालते और मंत्रियों की कोठी में दूध देने जाते फिर जल्दी आकर स्कूल भी जाते। इसी तरह शाम को भी दूध बांटकर फिर पढ़ने के लिए समय निकालते। दूध बेचने के साथ साथ राजेश्वर प्रसाद मंदिर मार्ग के म्युनिसिपिल बोर्ड स्कूल में पढ़ाई भी कर रहे थे।

दूध सप्लाई का काम करते करते ही इन्होंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की और एयरफोर्स में भर्ती हो गए। वायु सेना में प्रशिक्षण के बाद वे लड़ाकू विमान के पायलट बने और फिर पंद्रह सालों की अथक मेहनत के बाद प्रमोशन पाकर स्क्वार्डन लीडर बने। लेकिन, लुटियन जोंस के बंगलों में बचपन में दूध बेचने वाले राजेश्वर प्रसाद की जिन्दगी उन्हें वायु सेना से फिर वापस उन्हीं बंगलों तक ले जाना चाहती थी जहां उनका कष्ट भरा समय बीता था।

भरतपुर से जीता पहला चुनाव
1980 के लोकसभा चुनाव के दौरान राजेश्वर प्रसाद ने वायुसेना छोड़ लोकसभा चुनाव लड़ने का मन बनाया, लेकिन इंदिरा गांधी ने पहली बार में इसके लिए मना कर दिया। बाद में संजय गांधी ने उन्हें भरतपुर से चुनाव लड़वाया, जहां से राजपरिवार की सदस्य को हराकर राजनीति की दुनिया में उन्होंने पहला कदम रखा। इसके बाद वे दौसा से लगातार तीन बार चुनाव जीते और 1991 से 1993 तक टेलीकॉम मिनिस्टर रहे और 1993 से 1995 तक आंतरिक सुरक्षा मंत्री रहे।

जीरोता में स्थापित राजेश पायलट की प्रतिमा।
जीरोता में स्थापित राजेश पायलट की प्रतिमा।

कर्मभूमि दौसा में ही निकले प्राण
राजेश पायलट का दौसा से गहरा लगाव था। वे यहां से लगातार 11वीं, 12वीं व 13वीं लोकसभा के सदस्य रहे। उन्होंने लोकसभा में पांच बार दौसा का प्रतिनिधित्व किया तथा इसी कर्म भूमि के भंडाना गांव में अंतिम सांस ली। उन्हें जीप चलाने का शौक था, अपनी जीप वो अधिकतर खुद ही ड्राइव कर लेते थे।

11 जून 2000 को अपने क्षेत्र दौसा में एक कार्यकर्ता सम्मलेन को संबोधित कर जयपुर लौटने के दौरान हाईवे पर उनकी जीप एक ट्रोले से टकरा गई। इस हादसे में वे गंभीर रूप से घायल हो गए और अस्पताल ले जाते वक्त दम तोड़ दिया था।

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