पर्यावरण के प्रति बढ़ रही जागरूकता:घरों में बागवानी, रसोई की बगिया और पॉलिथीन से बनी ईको-ब्रिक्स के माध्यम से सहेज रहे पर्यावरण; कारगर साबित हो रहे अपना संस्थान के प्रयास

राघवेन्द्र सिंह गुर्जर, दौसा4 महीने पहले
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रसोई की बगिया - Dainik Bhaskar
रसोई की बगिया

पिछले एक साल में पर्यावरण के प्रति लोगों के बीच जागरूकता और रूचि बढ़ी है। ऐसे में अनेकों लोग अपने घर की छत, बालकनी या फिर किसी भी खाली जगह में गार्डनिंग कर एक सुंदर बगीचे में बदल रहे हैं। इस दिशा में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे संगठन अपना संस्थान से जुड़े लोग कई नवाचार कर रहे हैं। इनके द्वारा रसोई की बगिया, ईको-ब्रिक्स व पक्षी आवास जैसे कई प्रयोग किए जा रहे हैं और इन्हें अपेक्षा से ज्यादा सफलता भी मिल रही है।

रसोई की बगिया का अभिनव प्रयोग
अक्सर हम देखते हैं कि रसोई से निकलने वाला वेस्ट घरों के बाहर पड़ा हुआ बदबू मारने लगता है। जिसे आवारा जानवरों के खा लेने से संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। इससे निजात दिलाने के लिए अपना संस्थान ने रसोई की बगिया नाम से एक अभिनव प्रयोग शुरू किया है। इस प्रयोग के माध्यम से घरों में सूक्ष्म प्लांट लगाकर रसोई से निकलने वाले वेस्ट को पौधों के लिए उपयोगी बना रहे हैं। प्लांट में 13 प्रकार के औषधीय व सुंगध वाले पौधे लगाकर घर की छत पर बगिया बनाने का यह प्रयोग अब तक करीब सात सौ परिवारों में शुरू किया जा चुका है।

बगिया में तैयार हो रहे औषधीय पौधे
अपना संस्थान के प्रांतीय संयोजक अशोक शर्मा बताया कि शहरों में भूमि के अभाव व कचरे के निस्तारण को ध्यान में रखकर रसोई की बगिया प्रकल्प शुरू किया गया है। इसमें एक 200 लीटर के खाली ड्रम में रसोई से निकलने वाले अवशिष्ट आदि से तीन परतें बनाकर उसमें नीम गिलोय, हारश्रृंगार, कचनार, मोगरा, चमेली समेत विभिन्न प्रकार के 13 औषधीय पौधे लगाए जाते हैं। इसी ड्रम में एक जैविक गोउत्पाद डाला जाता है। जिससे बनने वाले कीट रसोई के अवशिष्ट को खाकर खाद में बदल देते हैं। वह खाद उन पौधों को पोषित कर तैयार करता है। इस प्रकार रसोई के अवशिष्ट को बाहर फेंकने की बजाय प्लांट में डालकर स्वच्छता की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

पॉलिथीन से बना रहे इको ब्रिक्स
प्लास्टिक आज पर्यावरण के प्रदूषण के लिए सबसे प्रमुख जिम्मेदार है। ऐसे में अनुपयोगी प्लास्टिक से निपटने के लिए एक अनूठी पहल काम आ रही है। यहां प्लास्टिक की बोतलों का उपयोग पाॅलिथिन सहेजने में किया जा रहा है। बाजार से कोई भी सामग्री खरीदारी के दौरान साथ मिलने वाली पाॅलिथिन को उपयोग के बाद बोतल के अंदर नियमित रूप से भरा जाता है। बोतल के पूरा भरने पर इको ब्रिक्स तैयार होती है।

इको ब्रिक्स
इको ब्रिक्स

क्या है इको ब्रिक्स ?
प्लास्टिक की पुरानी-बेकार बोतलों को फेंकने की बजाय इनमें प्लास्टिक के रैपर जैसे चिप्स आदि के पैकेट्स या पॉलिथीन को ठूंस-ठूंसकर भरने के बाद ढक्कन बंद कर दें। इन बोतलों का इस्तेमाल ईंटों की जगह निर्माण कार्यों के लिए किया जा सकता है और इसलिए ही इन्हें ‘इको-ब्रिक्स’ कहते हैं। इसके माध्यम से पर्यावरण को बचाने कर दिशा में कार्य किया जा रहा है। ऐसे में, अपना संस्थान ने तय किया कि वह लोगों को इस बारे में जागरूक करेंगे।

सफलतम साबित हुआ प्रयोग
अपना संस्थान के मीडिया प्रभारी विवेकानंद शर्मा ने बताया कि रसोई की बगिया के कई जिलों में सैकड़ों प्लान्ट लगाए जा चुके हैं। इसके साथ ही पक्षी आवास प्रकल्प में पचास हजार से अधिक पक्षी आवास लगवाए जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि अभी बर्ड फीडर प्रकल्प शुरू कर पांच हजार फीडर तैयार किए हैं। जिन्हें पक्षियों के चुग्गा स्थल के रूप में उपयोग किया जाएगा। पॉलिथीन वेस्ट को प्लास्टिक की बोटल में ठूंस-ठूंसकर भर बाद में उपयोग का प्रयोग भी सफलतम सिद्ध हुआ है।

पक्षी चुग्गा
पक्षी चुग्गा

घर में बनाया बगीचा
पर्यावरण प्रेमी सीएम मीणा ने बताया कि मकान के सामने खाली जगह में कुछ पौधे लगाएं तो धीरे-धीरे उनका गार्डनिंग की तरफ रुझान बढ़ने लगा। ऐसे में उन्होंने और अलग-अलग प्रजातियों के फलदार पेड़-पौधे लगाना शुरू किया। उनके गार्डन में साग-सब्जियों, फलों से लेकर फूल के पौधे भी हैं। गार्डन के लिए जैविक खाद खुद ही बनाते हैं। इसके लिए, वह अपने घर की रसोई और गार्डन के जैविक कचरे का इस्तेमाल करते हैं।

अमरूद का पेड
अमरूद का पेड

दौसा में पर्यावरण गतिविधि से जुड़े मीणा ने बताया कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहा अपना संस्थान का प्रयास है कि गांव-ढ़ाणियों से लेकर शहरों तक लोग प्रकृति संरक्षण के अभियान में जुड़कर जागरूक बन भागीदारी निभाएं। इसके लिए स्वच्छ भारत-स्वस्थ भारत, रसोई की बगिया, जापानी पद्धति से सघन पौधरोपण, पक्षी आवास व बर्ड फीडर आदि प्रकल्प चलाए जा रहे हैं।

नींबू का पेड
नींबू का पेड
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