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पर्यावरण बचाओ:आज जहां ऑक्सीजन के बिना टूट रही है सांसें, वहीं प्राण वायु देने वाले हरे वृक्ष कट रहे रोज

दौसा3 दिन पहले
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पापड़दा | जौंण किले के समीप एक दशक पहले लगाई नर्सरी में अब छाई वीरानी, यहां से हरे पेड़ों को लोग काटकर ले गए। - Dainik Bhaskar
पापड़दा | जौंण किले के समीप एक दशक पहले लगाई नर्सरी में अब छाई वीरानी, यहां से हरे पेड़ों को लोग काटकर ले गए।
  • सन 1730 में हरे पेड़ों को बचाने के लिए 363 बिश्नोईयों के बलिदान से लेनी होगी प्रेरणा
  • शासन और प्रशासन इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदारनवल शर्मा | पापड़दा

आज जिस आक्सीजन के लिए तड़प तड़प कर लोग अपनी जान दे रहे हैं और हर तरफ आक्सीजन की पुकार है। इसके लिए पूरी तरह शासन और प्रशासन जिम्मेदार हैं। यदि हम जोधपुर के खेजड़ली गांव के बलिदानियों से थोड़ी सी भी प्रेरणा लेते तो आज हमें इन सांसों के लिए नहीं तड़पना पड़ता। उल्लेखनीय है कि जोधपुर जिले के खेजड़ली गांव में सन 1730 में खेजड़ी के हरे वृक्षों को बचाने के लिए अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 महिला पुरुषों व बच्चों ने अपने शीश को यह बोलकर(सिर सांटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण) बलिदान कर दिया था कि सिर कटने से अगर हरे वृक्ष बचते है तो भी सौदा सस्ता ही है महंगा नहीं। लेकिन उसे हम इतिहास के पन्नों में पढ़कर भूल गए।

अगर हम एक छोटा सा आंकड़ा ले तो जिले में कोरोना काल में भी आम जमीन व सरकारी भूमि से रोजाना हजारों हरे पेड़ काटे जा रहे हैं। यहां तक कि 24 घंटे आक्सीजन देने वाले पीपल के पेड़ों को ये यमदूत सब कुछ जानते हुए भी नहीं छोड़ रहे हैं। जिससे आज हम आक्सीजन की एक नहीं हम आधी सांस को तड़प रहे हैं। लेकिन फिर भी हालात वही है कि हम पेड़ों के संहार करने से नहीं चूक रहे हैं। इसमें अहम भूमिका जिला प्रशासन में राजस्व विभाग और वन विभाग की है यदि दोनों विभाग ठान लें कि पेड़ों को नहीं कटने देना है तो पर्यावरण और प्रकृति और हमारी सांसों को चार चांद लग जाए। उदाहरण के तौर पर उपखंड क्षेत्र के कालीखाड़ गांव के कूकलाल क्षेत्र में 30 से 35 फीट गहराई के रेतीले नालों में वन विभाग द्वारा करीब पांच सौ बीघा में लाखों की संख्या में में जंगली पेड़ व लगाई गई नर्सरी एक दम हरी भरी थी। लेकिन गत पांच वर्षों में हजारों दरख्त हरे पेड़ों को वो ही गांववासी काट ले गए।

जिनके परिवार सगे संबंधी आज उन्हीं पेड़ों से मिलने वाली आक्सीजन की एक एक सांस के लिए तड़प रहे हैं। इस नर्सरी में इतनी हरियाली थी कि यहां वन्य जीवों में बघेरा, जरख, लोमड़ी, बंदर, खरगोश व सैकड़ों तरह के परिंदे आदि आज भी काफी संख्या में रहते हैं। लेकिन अब पेड़ों की बर्बादी के बाद अब जगह छोड़ने लगे हैं। इस नर्सरी की अंधाधुंध कटाई में गत पांच वर्षों में वन विभाग एक दम सुस्ती साधे रहा और इस धरा की हरियाली वीरान होती गई। इसी तरह डेढ़ दशक पूर्व जौंण किले के समीप वन विभाग ने यहां के चारागाह क्षेत्र में करीब पांच हजार पेड़ों की नर्सरी लगाई थी। इसमें इतने घने पेड़ थे कि इस नर्सरी के अंदर पांच सौ गाए भी दिखाई नहीं देती थी। यहां तक कि लोग वन्य जीवों के खतरे से इसके आस पास नहीं जाते थे। लेकिन अब वहां वीरानी छाई हुई है। इसी तरह अवैध खनन से तो अरावली पहाड़ों के वन क्षेत्र में लाखों पेड़ों की बलि के साथ वन्य जीवों के हजारों आशियाने उजड़ गए। गौरतलब है कि वन क्षेत्र की तलहटी में रहने वाले लोग तो अधिकार पूर्वक यहां हरे पेड़ों को काटते हैं और इनकी कटाई अनवरत सी रहती है।

वहीं अवैध खनन के चलते अरावली वन क्षेत्र में पिछले दो दशक में पहाड़ से लाखों हरे पेड़ कटने के बाद पहाड़ों में अब वीरानी छाई है।आज भी कट रहे हजारों पेड़इन दिनों खाली पड़े खेतों में पीपल, नीम, अरडू, आम जामुन, गुलर, खजूर विभिन्न तरह के पेड़ों को किसान बेझिझक आरा मशीन संचालकों व ठेकेदारों को बेच रहे है। जबकि स्वंयम के खेत में भी हरे पेड़ काटने के लिए प्रशासन से अनुमति लेनी होती है।

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