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कुंभकारों की उम्मीदों का दीपक:दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए चमकने लगा कुंभकारों की उम्मीदों का दीपक

करौली6 दिन पहले
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  • चाक ने पकड़ी रफ्तार

दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने गति पकड़ ली है। भारत देश में कोई भी त्योहार बिना चाक पर तैयार किए गए बर्तन के नहीं मनाया जाता।कुम्हारों के हाथ जब चाक पर थिरकने लगते हैं तो मिट्टी कई आकर्षक आकारों में दीपक,गणेश प्रतिमा,लक्ष्मी प्रतिमा से लेकर करवे और कई बेहतरीन सामान स्वरूप में आ जाती है। कुम्हारों के पसीने से आकार ले रहे दीपक दीपावली पर कई घरों को रोशन करने के लिए अभी से ही गावों के हर कोने में बिकने शुरू हो चुके हैं। इन दिनों विभिन्न साइज के दीपक गढ़ने में कुम्हार जुटे हुए हैं।कुम्हारों का कहना है कि बदलते परिवेश में मिट्टी के दीपों का स्थान इलेक्ट्रिक झालरों ने भले ही ले लिया हो,लेकिन इसके बावजूद मिट्टी के दीपक का अपना अलग ही महत्व है।चाइनीज इलेक्ट्रिक झालरों के बढ़ते दौर में भी त्योहारों पर मिट्टी से बने दीपक और अन्य चीजों का क्रेज बना हुआ है। मिट्टी के दीपक को बनाने से लेकर पकाने तक में आने वाला खर्च बढ़ गया है,जिससे उन्हें मेहनत के हिसाब से आर्थिक लाभ नहीं हो पा रहा रहा है। करीब 10 हजार रुपए में आने वाला चाक का पहिया पत्थर के कारीगरों की ओर से तैयार किया जाता है।इस पर सारे मिट्टी के बर्तन बनाए जाते है।दीपावली के कारण ही उनका यह पुश्तैनी धंधा अब तक जीवित है। कुंभकार परिवार मिट्टी का सामान तैयार करने में व्यस्त है। कोई मिट्टी गूंथने में लगा है तो किसी के हाथ चाक पर मिट्टी के बर्तनों को आकार दे रहे हैं। महिलाओं को आवा जलाने व पके हुए बर्तनों को व्यवस्थित रखने का जिम्मा सौंपा गया है।चाक से बनती कलाकृृतियांकरीब आठ से 10 हजार रुपए में आने वाला चाक का पहिया बड़ी मेहनत से पत्थर के कारीगरों की ओर से तैयार किया जाता है। इस पर सारे मिट्टी के बर्तन बनाए जाते हैं। दीपक, घड़ा, मलिया, करवा, गमला, गुल्लक, गगरी, मटकी,नाद, देवी-देवता,कनारी,बच्चों की चक्की सहित अन्य उपकरण बनाए जाते हैं। चाक का पानी व मिट्टी औषधि का काम करती है। मिट्टी गढ़कर उसे आकार देने वालों पर शायद धन लक्ष्मी मेहरबान नहीं है,इसके चलते अनेक परिवार अपने परंपरागत धंधे से विमुख होते जा रहे हैं। दीपावली पर मिट्टी का सामान तैयार करना उनके लिए सीजनेबल धंधा बनकर रह गया है। हालात यह है कि यदि वे दूसरा धंधा नहीं करेंगे तो दो जून की रोटी जुटा पाना कठिन हो जाएगा। दीपावली व गर्मी के सीजन में मिट्टी से निर्मित बर्तनों की मांग जरूर बढ़ जाती है,लेकिन बाद के दिनों में वे मजदूरी करके ही परिवार का पेट पालते हैं।हाईटेक हो गई कलाअब चाक पर कमाल दिखाने वाली कला हाईटेक हो गई है। इसलिए इनके हाथों की कला अब मशीनों के सामने लुप्त होती दिखाई दे रही है।हालांकि त्योहारी सीजन शुरू हो चुका है। लेकिन इनके सामने अपनी कला को जिंदा रखने के लिए मिट्टी की समस्या बरकरार है। कुंभकारों का कहना है कि चिकनी मिट्टी का अभाव है। इस कारण मिट्टी महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती है।नहीं मिल रहे उतने दाममिट्टी का सामान तैयार करने में ज्यादा लागत आती है और बाजार में उतना दाम नहीं मिल पाता। इस स्थिति को देखता समाज का युवा वर्ग भी पुश्तैनी कार्य से परहेज करने लगा है। क्योंकि,लोग अब मिट्टी के बर्तनों के उपयोग के स्थान पर प्लास्टिक के दौने-पत्तल और स्टील आदि के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। यह भी कुंभकार के रोजगार पर धक्का है।

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