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पहाड़ से भी बड़ी ये प्यास:अधिकांश हिस्सा पहाड़ी, हैंडपंप ही आसरा-ये भी अधिकांश सूख गए, 2-3 किमी दूर कुओं से ला रहे पानी

करौलीएक महीने पहले
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आमरेकी गांव में पहाड़ चढ़कर पानी लाती महिलाएं। - Dainik Bhaskar
आमरेकी गांव में पहाड़ चढ़कर पानी लाती महिलाएं।
  • विभाग का दावा : किल्लत वाले गांवों में टैंकरों से पानी भेज रहे हैं
  • हकीकत : 30 गांवों में है जल संकट, बंूद-बंूद के लिए मीलों लंबा सफर

पानी के लिए लोगों का संघर्ष दिखाती ये तस्वीरें करौली जिले से करीब 30 किमी दूर अलवतकी गांव की है। यहां पड़ोसी से पानी भी उधार मिलता है, लेकिन शर्त यह है कि फिर उसे उतना ही घड़े पानी भरकर लौटाना पड़ता है। क्योंकि जलसंकट के दौर में यहां पानी बहुमूल्य है।

हालात सिर्फ करणपुर क्षेत्र के एक गांव के नहीं हैं बल्कि डांग क्षेत्र के करीब 30 गांव-ढाणियों में पीने के पानी के लिए ऐसा ही गंभीर संकट बना हुआ है। अधिकांश गांव पहाड़ियों पर बसे हैं। भीषण गर्मी में पहाड़ चढ़कर पानी लाना किसी चुनौती से कम नहीं होता।

गांव से दो से तीन किमी दूर कुएं या हैंडपंपों में पानी है। पसीने में लथपथ महिलाएं और बच्चे पहाड़ चढ़कर पानी लाते हैं तो रास्त में कई बार हांफ जाते हैं। पथरीली जमीन पर भूमिगत जल स्तर इतना नीचे जा चुका है कि कुंए व हैंडपंप सूख चुके हैं। ऊंटगाड़ी, मोटरसाइकिल से पानी लाना पड़ रहा है।

करणपुर डांग क्षेत्र के 30 से ज्यादा गांव-ढाणियाें में जलसंकट के भयंकर हालात बने हुए हैं। महिलाएं, बच्चों के साथ युवाओं को भी सुबह से ही पानी का जुगाड़ करने में जुटना पड़ता है। महिलाएं और बच्चे दो से तीन किमी दूर से पानी ला रहे हैं। हालात करीब दो माह से बने हुए हैं।

कहने को तो पीएचईडी ने करणपुर डांग क्षेत्र के 27 गांवों में पानी के 48 टैंकर मंजूर कर रखे हैं, लेकिन कई गांवों में पीने का पानी नहीं पहुंच रहा है। कई गांवों में हैंडपंप ही पानी का एकमात्र सोर्स है, लेकिन ये खराब पड़े हैं। कूरतकी गांव के मुकेश गुर्जर, सुमरन सिंह, कैलाश गुर्जर ने बताया कि पानी की सबसे ज्यादा किल्लत कूरतकी, ठेकलेकी झोपड़ी, अलवतकी में हैं, महिलाएं एक से डेढ़ किमी दूर कुंओं से पानी ला रही है।

मां पहाड़ी चढ़कर पानी लाती थी, पीड़ा देखकर 10 साल के बेटे ने जुगाड़ बनाया

अलवतकी गांव में 10 वर्षीय रामू गुर्जर पानी लाने में रोज मां की मदद करता है। पहाड़ी चढ़कर पानी लाना पड़ता था। यह काफी मुश्किल होता था तो उसने जुगाड़ से दो पहिए की लकड़ी की गाड़ी बना ली। इस पर पीपा रस्सी से बांधकर वह एक किमी दूर पहाड़ी चढ़कर कुएं पर पानी लाने जाता है।

उसके साथ छोटी बहन भी पानी लाने में मदद करती है। रामू कहता है कि गर्मी ज्यादा है और मां दूर से पानी सिर पर लाने में पहाड़ चढ़ने, पथरीले रास्तों का सफर करने में थक जाती है। इसीलिए मां की मदद करने के लिए उसने लकड़ी का जुगाड़ बना लिया है।

इन गांवों में है पानी की किल्लत

आशाकी, निभैरा, मरमदा, मोरोची, पाटोरन, नैनियाकी, पहाड़पुरा, चौड़िया खाता, बहरदा, चौडक्या कलां, पातीपुरा, रावतपुरा, कल्याण पुरा, राहिर, गसीनपुरा, आमरेकी, अलवतकी, सोनपुरा, कूरतकी, ठेकलेकी झोपड़ी, आमरेेकी, पाटोरन, दयारामपुरा में पानी की किल्लत है।

करौली से करीब 30 किमी दूर अलवतकी गांव में महिलाओं को प्रतिदिन करीब डेढ़ किमी दूर से पानी लाना पड़ रहा है। गांव में पहाड़ी पर पानी नहीं है। एक गहरी खाई में पानी का कुआं है, जो करीब एक से डेढ़ किमी दूर पड़ता है। महिलाएं, बच्चे सुबह से ही पानी लाने में जुट जाते हैं। भीषण गर्मी में उन्हें सिर पर पानी का मटका लिए पहाड़ चढ़कर पथरीले रास्तों से होकर पानी लाना पड़ रहा है।

ग्रामीण ऊंटगाड़ी पर ला रहे हैं पानी

गांवों के लोग मोटरसाइकिल, ऊंटगाड़ी और जुगाड़ की गाड़ियों से भी पानी लाते हैं। ग्रामीण भूरा गुर्जर, रामअवतार गुर्जर आदि ने बताया कि पानी की समस्या को लेकर कई साल से लगातार जिला प्रशासन से स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं, लेकिन कोई हल नहीं निकला है।

गांवों में पानी के टैंकर शुरू कर दिए हैं : एईएन

​​​​​​​गांवों में पानी के टैंकर शुरू कर दिए हैं। जिस गांव में जितने टैंकर जा रहे हैं, मैं उतनी ही रिपोर्ट दे रहा हूं। जहां पानी की किल्लत है, वहां टैंकरों से पानी सप्लाई कराया जाएगा। आरसी मीना, एईएन, जलदाय विभाग सपोटरा

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