• Hindi News
  • Local
  • Rajasthan
  • Jaipur
  • Karauli
  • Shardiya Navratri Started With Ghat Establishment, Worship Of Maa Shailputri On The First Day Of Navratri, Kaila Devi Reverberated In The House Of Mata

उत्तर भारत का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है कैला देवी:घट स्थापना के साथ शारदीय नवरात्र शुरु, नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा, माता का भवन में कैला देवी के जयकारों से गुंज उठा

करौली19 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
कैला देवी। - Dainik Bhaskar
कैला देवी।

करौली जिले में उत्तर भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल कैला देवी में शारदीय नवरात्रा गुरुवार को घट स्थापना के साथ प्रारंभ हो गए है। नवरात्रि में 9 दिन विधि विधान से माता की पूजा-अर्चना, शतचंडी पाठ, भैरव स्त्रोत पाठ, कन्या-लांगरा पूजन जैसे अनुष्ठानों का आयोजन किया जाएगा। कोरोना के चलते प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला मेला निरस्त रहेगा। लेकिन, कोरोना गाइडलाइन के अनुसार श्रद्धालुओं को माता के दर्शन कराए जाएंगे।

गुरुवार को प्रथम नवरात्रि पर कोरोना के कारण कैला देवी में कम संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे है। माता के दरबार में श्रद्धालु धोक लगाकर खुशहाली की मनौती मांगते हैं। 10 दिनों तक चलने वाले शारदीय नवरात्रों में पहले 8 से 10 लाख श्रद्धालु राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली आदि से पहुंचतें है। लेकिन, कोरोना गाइडलाइन के कारण इस बार संख्या कम रहने का अनुमान है। नवरात्र के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा की गई। इसके साथ कैला देवी की विभिन्न धर्मशालाओं में भी श्रद्धालुओं ने देवी अनुष्ठान शुरू किए तो घरों में भी घटस्थापना कर धार्मिक आयोजन और पाठ शुरू हुए है। नवरात्र शुरू होते ही कैला देवी में श्रद्धालुओं की चहल पहल शुरू हो गई है। वहीं, माता का भवन में कैला देवी के जयकारों से गुंज उठा।

राज परिवार के राज ऋषि प्रकाश जत्ती के निर्देशन में कैला माता मंदिर के सोल ट्रस्टी कृष्ण चंद्र पाल की ओर से मंत्रोच्चार के साथ पूजा अर्चना कर घट स्थापना की गई। देश के प्रसिद्ध प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल कैला देवी का शारदीय नवरात्र मेला एक बार फिर कोरोना के कारण निरस्त होने से लोग निराश है। सोशल डिस्टेंस के साथ थर्मल स्कैनर, सैनिटाइजर की व्यवस्था की गई है। बिना मास्क के लोगो को प्रवेश नहीं दिया जा रहा है। नवरात्र के पवित्र मौके पर कैला देवी में महिला, पुरुष, बच्चों, बुजुर्ग भारी संख्याम में पहुंचतें है। श्रद्धालु माता को प्रसादी, चुनरी चढ़ाकर मनौती मांगते है।

कैला देवी मंदिर।
कैला देवी मंदिर।

कैला देवी माता राजपरिवार की कुलदेवी है। राजपरिवार ने इसकी स्थापना की थी। वर्तमान में करौली के पूर्व नरेश कृष्णचंद पाल नवरात्र पर मंदिर परिसर में घट स्थापना करते है। जिसके बाद 9 दिन तक माता के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। देशभर से आने वाले हजारों श्रद्धालु कैला देवी पहुंचकर धर्मशाला व होटलों में घट स्थापना करते हैं और 9 दिन तक माता की आराधना करते हैं। कैला देवी में छठ से दशमी तक विशेष भीड़ रहती है। कैला देवी का मेला वर्ष में दो बार लगता है। प्रमुख मेला चैत्र माह में भरता है, जब करीब 50 लाख श्रद्धालु माता के दरबार में आते है। कैला देवी माता के दर्शनों के लिए यू तो सभी प्रकार के श्रद्धालु आते हैं। लेकिन, मान्यता है कि घर में बेटे की शादी अथवा बेटे के जन्म के बाद कैला देवी में नवविवाहित जोड़े की ओर से माता के दर्शन करने आवश्यक रूप से आते हैं। वहीं, बच्चों का जन्म के बाद प्रथम मुण्डन संस्कार भी कैला देवी में ही कराया जाता है।

धर्मग्रंथों के अनुसार सती के अंग जहां-जहां गिरे वहीं शक्तिपीठ का उद्गम हुआ और उन्हीं में से एक कैला देवी शक्तिपीठ है। इतिहासकारों का कहना है कि बाबा केदार गिरी ने मां की कठोर तपस्या कर माता के श्रीमुख की स्थापना कैला शक्तिपीठ के रूप में की। ऐतिहासिक साक्ष्यों और किंवदंतियों के अनुसार प्राचीन काल में कालीसिल नदी के तट पर जहां बाबा केदार गिरी ने तपस्या की वहां सघन जंगल है। मान्यता है कि इन गिरी कंदराओं में एक दानव निवास करता था, जिसकी वजह से आमजन व संत परेशान थे। बाबा की तपस्या का मकसद यही था कि माता को प्रसन्न कर इस क्षेत्र को दैत्य के आतंक से मुक्ति मिले। मान्यता है कि बाबा केदार गिरी ने हिंगलाज पर्वत पर घोर तप किया। बाबा बाद में त्रिकूट पर्वत पर रहने लगे। जिसके बाद वहां मां कैला ने प्रकट हो कालीसिल के तट पर दानव का वध किया। एक अन्य मान्यता है कि त्रिकूट पर्वत पर बोहरा नामक चरवाहा अपने पशुओं को चराने जाता था। चरवाहे ने एक दिन देखा एक स्थान विशेष पर बकरियां खुद ही दूध निकाल रही हैं तो उसने उस जगह पर खुदाई की, जहां देवी मां की प्रतिमा प्रकट हुई। चरवाहे ने भक्ति के साथ मां की ज्योति जलाई और धीरे-धीरे प्रतिमा की ख्याति क्षेत्र में फैल गई। आज भी बोहरा भगत का मंदिर कैला माता के श्रीमुख के सामने बना हुआ हैै।

कैला मैया के एक और अन्यन्य भक्त लांगुरिया का मंदिर भी मता राणी के श्रीमुख के सामने स्थापित है। जहां के दर्शन करने के बाद ही माता की यात्रा पूरी होती है। कैला देवी का मंदिर कालीसिल नदी के तट पर स्थित है, जो दूर से ही रमणीक दिखाई देता है। करौली जिला मुख्यालय से दक्षिण दिशा में 23 किलोमीटर दूर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच त्रिकूट पर्वत पर विराजमान कैला मैया का दरबार जन-जन की आस्था का केन्द्र है। उत्तरी-पूर्वी राजस्थान में चम्बंल नदी के बीहडों के बीच कैला ग्राम में स्थित मां के दरबार में यूं तो पूरे वर्षभर श्रृद्धालु आते हैं, लेंकिन चैत्र मास में भरने वाले वार्षिक मेले में जन सैलाब इस तरह उमड़ता है कि कैला दवी का मेला कुम्भ का लघु रूप दिखाई देता है। इस मंदिर का इतिहास करीब 1 हजार वर्ष पुराना बताया जाता है। कैला मैया के मंदिर की कई मान्यताएं हैं। बताया जाता है कि वर्तमान में जो कैला ग्राम है, वह करौली के यदुवंशी राजाओं के आधिपत्य में आने से पहले गागरोन के खींची राजपूतों के शासन में था। राजा मुकंद दास ने सन 1116 में मंदिर की सेवासुश्रा, सुरक्षा का दायित्व राजकोष पर लेकर नियमित भोग प्रसादी और ज्योत की व्यवस्था करा दी। इससे पहले राजा रघुदास ने मंदिर का निर्माण कराया था। इसके बाद स्थानीय रियासत की ओर से मंदिर के प्रबंधन का कार्य किया जाता रहा है। मां कैला देवी की मुख्य प्रतिमा के साथ ही चामुण्डा देवी की प्रतिमा विराजमान है। जहां अखंड ज्योति जलती रहती है।

खबरें और भी हैं...