नवरात्रि विशेष:बरवासन देवी का प्राचीन मंदिर, नवरात्रि के बाद यहां दशमी पर कुश्ती दंगल में एक क्विंटल वजनी नाल उठाते हैं पहलवान

करौली2 महीने पहले
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  • हाडौती क्षेत्र के आडाडूंगर गांव में है बरवासन देवी का मंदिर, सालवाड़ कार्यक्रम में जुटते हैं श्रद्धालु

उपखण्ड मुख्यालय के उत्तर पूर्व की अरावली पहाडियों पर सात किमी दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत अमरवाड़ के आडाडूंगर गांव में क्षेत्र की अराध्य बरवासन देवी पर्यटन के साथ सामाजिक सौहार्द, धार्मिक लोक परंपराओं और चमत्कारिक दैवीय शक्तिपीठ के रूप में स्थापित है। चैत्र शुक्ल अष्टमी को मंदिर मे नवरात्रा के साथ अद्भुत चमत्कारिक सालवाड़ कार्यक्रम से दो दिवसीय विशाल मेला आयोजित किया जाता है।

बरवासन देवी के मंदिर में स्थित शिलालेख में शाके संवत 1834 में करौली नरेश भंवरपाल के पंडित बालगाविंद ने यदुवंशी शासकों का इतिहास के साथ मंदिर का जीर्णोद्धार तथा दूसरे शिलालेख में 1326 ईस्वी में दिल्ली बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक द्वारा मंदिर स्थापना के साथ राजा हरिश्चंद, पहुडा देवी, माधव देव, विग्रह देव, हम्मीर देव तथा मंगल देव आदि शासकों के संघर्षों और तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक स्थितियों का उत्कीर्ण युद्ध और विजय की शक्तिपीठ देवी के रूप में मान्यता प्रदान करता है। किंवदंती के अनुसार मीणा समाज के भोंगला और भगवान के वंशजों द्वारा देवी की पूजा तथा एक बंजारे द्वारा मूर्ति स्थापना करना भी बताया जाता है।

चैत्र शुक्ल अष्टमी को मंदिर के मावडियों (पुजारियों) द्वारा युद्ध और विजय का इतिहास समेटे बरवासन देवी मंदिर पर पंच पटेलों की उपस्थिति में जयकारों व ढोल नंगाडों की गूंज पर अद्भुत सालवाड़ कार्यक्रम में लोहे के नुकीले त्रिशुल जीभ में घोंपकर भक्तों को देवी की शक्ति का प्रदर्शन कर मंदिर की परिक्रमा की जाती है। रोंगटे खडे करने वाले दृश्य को देखकर श्रद्धालु आश्चर्य चकित होकर दंग रह जाते है। इस दौरान दोपहर करीब एक बजे होने वाले कार्यक्रम के दौरान हवा भी थम जाती है तथा श्रद्धालु पसीने में तरबतर हो जाते है। नवमी को लोकगीत व नृत्य तथा दसवीं को विशाल कुश्ती व एक क्विंटल नाल उठाने की प्रतियोगिता आयोजित होती है। यह मंदिर आमजन के लिए आस्था का केंद्र है। मंदिर में हर दिन विभिन्न धार्मिक आयोजन होतेरहते है।

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