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गड़बड़ा रहा बारिश का चक्र:चार साल से गड़बड़ा रहा बारिश का चक्र, उत्पादन हो रहा प्रभावित

करौली22 दिन पहले
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मासलपुर। प्रकृति का चक्र बिगड़ने से फसल बुवाई के बाद खेतों में सूरज की तपन से झुलस रही हैं फसलें। - Dainik Bhaskar
मासलपुर। प्रकृति का चक्र बिगड़ने से फसल बुवाई के बाद खेतों में सूरज की तपन से झुलस रही हैं फसलें।

संवत 2036 में अकाल की भयंकर त्रासदी के बाद से लगातार सर्दी, गर्मी और बरसात का चक्र गड़बडा रहा है। इससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। पिछले चार दशकों में प्रकृति के बिगड़ते संतुलन से फसल का उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। इस मामले को लेकर मासलपुर में भास्कर द्वारा किसानों के दर्द को किसानों की जुबानी जानने का प्रयास किया है।किसानों ने बताया है कि चार दशक पूर्व तक निर्धारित समय पर ऋतुओं का समय परिवर्तन होने से किसानों की फसल बुवाई से लेकर फसल के उत्पादन की प्रक्रिया नियत समय पर पूरी की जाती रही थी लेकिन वर्तमान हालातों में प्रकृति ने अपना स्वरूप बदल लिया है।

सर्दी और गर्मी अपने क्रम से भटकने लगी है। अकाल और खण्ड बरसात के चलते हालात बदल गए है। जमीन का जल स्तर लगातार घट रहा है। फसल उत्पादन के परंपरागत जलस्स्रोतों के नाकारा होने से किसानों के लिए फसल सिंचाई मंहगी और दुर्लभ हो रही है। ऐसे में कही जमीन बंजर है कहीं पर पर्याप्त सिंचाई के अभाव में फसल का उत्पादन घट रहा है। प्रकृति संतुलन के गड़बड़ाने से फसल के उत्पादन में मंहगी लागत और कम उत्पादन से किसान आर्थिक रूप से कमजोर होता जा रहा है।इन हालातों को लेकर मासलपुर के किसानों से बात करने पर किसानों का दर्द छलकता हुआ दिखाई देता है। मासलपुर के ऊंचा गाव निवासी चेतराम माली का कहना है कि ऋतुओं का समय चक्र गड़बड़ाने से फसल बुवाई का समय निर्धारित नहीं रहा है, उन्होंने बताया कि पूर्व में अषाढ़ी के शुरू होते ही मानसून की पहली बरसात के बाद खरीफ की फसल बुवाई का कार्य शुरू कर दिया जाता था।

इसके बाद समय समय पर बरसात होने से जोरदार फसल की पैदावार होती थी, लेकिन आज के हालात में पहली बरसात की बुवाई के बाद खेतों में फसल के अंकुर झुलस जाते है किसानों को बरसात के लिए ताकना पड़ता है।रौहर के समय सिंह मीना का कहना है कि प्रकृति का संतुलन बिगडऩे से किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। किसान समय ने बताया कि इस बार उन्होंने पहली बरसात के बाद बाजार से 3200 रुपए का बीज खरीद लिया और खेतों की बुवाई करा दी, इसके बाद बरसात नहीं आई। सूरज की तपन में बुवाई गई फसल के अंकुर ही नहीं निकले। एक बार फिर बरसात के आने पर खेतों की बुवाई करानी पडेगी। ऐसे में किसानों को आर्थिक नुकसान उठाने के लिए विवश होना पड़ रहा है। मासलपुर के सिंघाड़े उत्पादक किसान हरीपाल कश्यप ने बताया कि अगाड़ माह शुरू होते ही बरसात का चक्र शुरू होता था ऐसे में तालाबों में जल भराव होने पर सिंघाड़े की फसल बुवाई का कार्य कर लिया जाता था लेकिन आज के हालात में बड़े तालाबों में पर्याप्त जल भराव नहीं होता है।

हल्की फुल्की बरसात होने पर छोटे तालाबों में सावन माह में सिंघाड़े की फसल बुवाई करते है। फसल की देरी से बुवाई करने से सिंघाड़े की फसल आते आते सर्दी का मौसम शुरू हो जाता है। सिंघाड़े उत्पादक किसान ने बताया कि सर्दियों में फसल टपकने लगती है। दूसरी ओर तालाबों में पर्याप्त जल भराव नहीं होने से पानी सूखने लग जाता है। ऐसे में कई बार फसल के बीज और उत्पादन की लागत भी नहीं निकल पाती है इससे सिंघाड़े का उत्पादन भी घट रहा है।भारतीय किसान संघ के जिला मंत्री मासलपुर के खेडिय़ा निवासी किसान श्याम सुंदर मीना का कहना है कि चार दशक पूर्व किसान फसल उत्पादन के लिए अपनी फसल से ही बीज की व्यवस्था करके रखता था लेकिन ऋतुओं का चक्र बिगडऩे से किसानों को अब बाजार से कम पानी में फसल उत्पादित होने वाले हाईब्रिड बीज खरीदने के लिएविवश होना पड़ रहा है। लगातार अकाल के हालातों में घटते भूजल स्तर के चलते किसानों को सिंचाई के लिए मंहगी कीमत चुकानी पड़ रही है। ऐसे में कई बार किसानों की लागत भी नहीं निकल पाती है।

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