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खुशियों की घर वापसी:8 माह में 15 पर्व रोक-टोक में रहे, आज उत्साह से मनाएंगे साल का पहला बड़ा त्यौहार

जयपुर10 दिन पहले
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  • दान का शुभ समय; सुबह 7:21 बजे से शाम 5:50 बजे तक पुण्यकाल। सुबह 8:15 बजे दक्षिणायन से उत्तरायण होंगे भगवान सूर्यनारायण

राजस्थान में मार्च से कोरोना का कहर शुरू हो गया था, जो अगस्त तक बेकाबू हो गया। नतीजा- रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणगौर, दशहरा, नवरात्र, ईद और दीपावली जैसे बड़े त्योहारों समेत 15 पर्व रोक-टोक व पाबंदी में गुजर गए। लेकिन नया साल आते ही खुशियों के दरवाजे खुले और साल का पहला सबसे बड़ा त्योहार मकर संक्रांति आ गया...

खुलकर मनाएं संक्रांति क्योंकि कहा गया

दूरी बनाकर रखें; तो इस त्योहार में सब अपनी छत पर ही होते हैं। हर छत के बीच दूरी होती ही है। यही नहीं, पतंग को छुट्‌टी देने वाला भी दूर जाकर ही देगा और चरखी पकड़ने वाला भी दो गज दूर ही खड़ा होगा।
कहा गया, घर में रहें; तो इस त्योहार की बड़ी खूबी ये है कि सब अपने-अपने घर पर ही रहते हैं। अपनों के बीच रहने से तनाव कम करने में मदद मिलती है।

कहा गया, इम्युनिटी बढ़ाएं; तो इसमें तिल, गुड़, मूंगफली आदि खाते हैं। तिल कोलेस्ट्रॉल घटाता है। मूंगफली में 30 विटामिन हैं। गुड़ में खूब आयरन होता है।

कल से टीकाक्रांति का भी शुभारंभ

  • बुधवार को जयपुर में वैक्सीन की डोज आई, जो 16 से लगने भी लगेगी।
  • पिछले 10 दिनों से कोरोना के मरीज प्रदेश में 300 के आसपास ही सिमट गए हैं।

राजस्थान ही ऐसा, जहां हर दानी के लिए खास संबोधन- ‘भामाशाह’ और हर सुबह ‘करण री वेळा’ जिसमें जो मांगा जाए, देने की परंपरा

1. भैरूं ने घर-जमीन यहां तक कि ऊंट तक दान कर दिया

बाड़मेर-जैसलमेर के पळी गांव के अद्‌भुत दानी थे ठाकुर भैरूंसिंह। सुबह उनके पास जो भी आता वे मुंहमांगा दान देते थे। सबकुछ दान करने के बाद उनके पास सिर्फ एक ऊंट बचा। उन्होंने सोचा, कल सुबह कोई मांगने आया तो उसे क्या दूंगा? इसी सोच में ऊंट लेकर निकल गए। कुछ दूर एक व्यक्ति नीम की टहनियां काट रहा था।

उन्होंने पूछा, ये हरा पेड़ क्यों छांग रहा है? युवक बोला-मैं पळी जाऊंगा और भैरूंसिंह से ऊंट मांगूगा। ऊंट को खिलाने के लिए काट रहा हूं। भैरूंसिंह बोले, उसने नहीं दिया तो! वह बोला, ऐसा नहीं हो सकता। कहावत है, भैर नटै तो पृथ्वी फटै! ये सुनते ही उन्होंने ऊंट दे दिया।

2. फूलाणी रो मायरो; ताना सुना तो झाड़ियों तक को बेटी माना

करीब 400 साल पहले प्रदेश के एक बड़े दानवीर लाखा फूलाणी गुजरात में कारोबार करते थे। वह राजस्थान व गुजरात में ऐसी बेटियों का मायरा भरा करते थे, जो निर्धन थीं या फिर जिनके पिता या भाई नहीं थे। उनकी दानशीलता से जलने वालों की भी कमी नहीं थी।

एक बार किसी ने कह दिया झाड़ियां भी तो बिना मां-बाप और भाई की हैं। इन झाड़ियों का मायरा कौन भरेगा? लाखा फूलाणी इस बात से इतने व्यथित हुए कि कच्छ से राजस्थान तक रास्ते में जितनी भी झाड़ियां आईं, वे सबकाे चुनरी ओढ़ाते गए। बाद में यही चुनरियां किसी न किसी निर्धन बेटी के काम आईं।
3. गौशाला-अनाथालय बनवाए पर किराए पर रहे सोहनलाल

​​​​​​​फतेहपुर शेखावाटी के दानवीर सेठ सोहनलाल दुग्गड़ के दान के किस्से प्रसिद्ध हैं। वे सट्‌टे का कारोबार करते थे। कोलकाता में उनका ऐसा रुतबा था कि जब किराए की टमटम में निकलते तो बाकी व्यापारी उनसे शगुुन लेकर ही दुकान खोलते थे।

उन्होंने करोड़ों रुपए दान देकर आश्रम, भवन, गौशाला, स्कूल और काॅलेज बनवाए, लेकिन खुद आजीवन किराए पर रहे और किराए की ही टमटम से चलते रहे। मनमौजी तो ऐसे थे कि खाली जेब घूमा करते थे लेकिन अगर कोई कुछ मांग देता था, तो उसे कभी मना नहीं करते थे और फिर उसे मुंहमांगा दान दे भी दिया करते थे।

4. जहां भी अकाल पड़ता था, अन्न के जहाज भेजते थे जगड़शाह

​​​​​​​भीनमाल के श्रीमाली जैन परिवार से संबंधित जगड़शाह 13वीं सदी के बड़े कारोबारी थे। यह गुजरात के कच्छ से सुदूर अफ्रीका तक जहाजों से कारोबार करते थे। वे इतने धनी और दानवीर थे कि पूरे एशिया महाद्वीप में कहीं भी अकाल पड़ता था तो वहां जौ के मूटक और कई बार पूरे के पूरे जहाज भेज दिया करते थे।

भूखे-प्यासे लोगों तक ऊंटों से पानी या अनाज भेजा करते थे। दिल्ली के निर्धन और भूखे लोगों को भी ये जौ के मूटक भेजते। यहां तक कि मुसीबत में कोलकाता, रंगून तक भी जौ पहुंचाते थे। कहा जाता है कि एक बार अकाल जैसी स्थिति हुई तो लोगों की जिंदगियां बचाने के लिए उन्होंने इराक-ईरान तक जौ भेज दिए थे।

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