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फसल पर फसाद:देश के 41% बाजरे का उत्पादन राजस्थान में, फिर भी राज्य में एमएसपी पर खरीद नहीं

जयपुर2 महीने पहले
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  • हरियाणा के सीएम खट्‌टर ने राजस्थान के किसानों का बाजरा खरीदने से किया इनकार
  • डोटासरा बोले- भाजपा के झूठ का हुआ पर्दाफाश

(सौरभ भट्‌ट). केंद्र सरकार ने बाजरे का समर्थन मूल्य 2150 रुपए घोषित किए। राजस्थान में किसान को अपना बाजरा 1300 रुपए प्रति क्विंटल पर बेचना पड़ रहा है। जबकि भाजपा शासित पड़ोसी राज्य हरियाणा में यही बाजरा 2150 रुपए पर खरीदा जा रहा है। दोनों राज्यों के बीच बाजरे के मूल्य का यह अंतर चौंकाने वाला है। जबकि समर्थन मूल्य की गारंटी की मांग को लेकर देश का सियासी पारा पहले ही गरमाया हुआ है।

हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर ने साेशल मीडिया पर बयान दिया कि राजस्थान के किसानों को हरियाणा में बाजरा बेचने नहीं दिया जाएगा। खट्टर के इस बयान पर राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नए कृषि कानूनों के तहत एक देश एक बाजार के झूठ का पर्दाफाश खुद हरियाणा के मुख्यमंत्री कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सियासी अरोप-प्रत्यारोप के बीच जमीन हकीकत क्या है।

हरियाणा जाने को मजबूर क्यों हुआ राज्य का किसान
राजस्थान में बाजरा खुले बाजार में 1300 रु. प्रति क्विंटल तक बिक रहा है जबकि इसकी एमएसपी 2150 रु. है। जबकि हरियाणा सरकार अपने किसानों को भावान्तर दे रही है। यानी वहां व्यापारी 1200 रु. में बाजरा खरीद रहा है और एमएसपी 2150 रु. है तो किसान को 950 रु. हरियाणा सरकार देती है। हरियाणा सरकार भावान्तर दे सकती है तो पड़ाेसी राज्य के किसानों के लिए कोई भी सरकार अपने फंड से मुआवजा क्यों देगी।
किसी की भी हो सरकार, किसान का वही हाल; समर्थन मूल्य पर सिर्फ सियासत

पहली वजह : केंद्र एमएसपी पर खरीद को तैयार, पर राज्य पीडीएस में लेने को तैयार नहीं
देश का 41% बाजरा राजस्थान में होता है। जिन 24 खाद्यान फसलों के लिए एमएसपी निर्धारित है उनमें बाजरा भी है। फिर भी राजस्थान में एमएसपी पर इसकी खरीद नहीं हो रही। इसकी वजह है बाजरे का उपभोग। दरअसल केंद्र सरकार कहती है कि वह एमएसपी पर खरीदने को तैयार है लेकिन इसके बाद राज्य सरकार को पीडीएस में गेहूं के बदले बाजरा लेना होगा।

राज्य इसके लिए तैयार नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि केंद्र सरकार इस बाजरे को खरीद कर इसका करेगी क्या। क्योंकि जब उत्पादक राज्य ही इसका उपभोग नहीं करना चाहता तो अन्य राज्य इसे क्यों लेंगे। बाजरे का स्टोरेज भी बड़ी समस्या है। यह 4 महीने में ही खराब हो जाता है।

दूसरी वजह : राज्य समर्थन मूल्य पर भावांतर दे तो कम से कम 2000 करोड़ रुपए चाहिए

  • हमारे यहां 40 लाख हैक्टेयर बाजरे की फसल है। 24 लाख टन का उत्पादन होता है। इसमें से हमारी खाने की जरूरत 5-7 लाख टन से ज्यादा नहीं है। 20 लाख टन बाजरा सरप्लस है।
  • बाजरे का समर्थन मूल्य 2150 रुपए है और राजस्थान में यह एमएसपी के अभाव में 1100 से 1300 रुपए क्विंटल के भाव पर बिक रहा है। यानी इसमें एक टन पर 10 हजार रुपए का अंतर है। अब राज्य सरकार यदि इस नुकसान की भरपाई करती है तो उसे 2 हजार करोड़ रुपए चाहिए।
  • बाजरे के अलावा जौ, मक्का व अन्य फसलें भी हैं जिनके उत्पादक किसान सरकार से भावान्तर की मांग करेंगे जो राज्य सरकार के लिए संभव नहीं होगा।

तीसरी वजह : अंतरराष्ट्रीय मार्केट ही असली ताकत, कोई भी सरकार नहीं बदल सकती
भले ही राज्य सरकार एमएसपी का कानून लाने का दावा कर रही है लेकिन मूल समस्या यह है कि कमोडिटी मार्केट अंतरराष्ट्रीय दबाव पर चलता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार को सरकार एक तरफा ऊंचा या नीचा नहीं कर सकती। सरकार अंतरराष्ट्रीय समझौते से बंधी हुई है।

मसलन घरेलू बाजार में जैसे ही दालों की कीमत में तेजी आती है तो इसका इंपोर्ट शुरू हो जाता है। मसलन प्रदेश में इन दिनों मूंग, ड़द, मूंगफली और सोयाबीन की समर्थन मूल्य पर खरीद चल रही है, लेकिन उड़द व सोयाबीन के खुले बाजार में अच्छे भाव मिलने की वजह से कोई किसान सरकार के पास इन्हें समर्थन मूल्य पर बेचने नहीं आ रहा।

राज्य सरकारों ने दावे तो खूब किए, लेकिन एमएसपी पर बाजरे की खरीद नहीं हुई
भाजपा समर्थन मूल्य को डेढ़ गुना करने का दावा करती है। पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के कार्यकाल में केंद्र ने बाजरे की एमएसपी 1400 रु. से बढ़ाकर 1800 रु. कर दी थी, तब भाजपा नेताओं ने श्रेय लेने के लिए बड़े-बड़े बयान दिए लेकिन एमएसपी पर बाजरे की खरीद नहीं की। यही हाल गहलोत सरकार में भी रहा। पिछली गहलोत सरकार में बाजरे की एमएसपी पर खरीद तो हुई लेकिन सिर्फ 100 क्विंटल। इसके बाद तो मौजूदा कार्यकाल में बाजरे की एमएसपी पर खरीद के लिए प्रस्ताव तक नहीं भेजा गया।
^हमने बाजरे की खरीद के लिए केंद्र व राज्य सरकार को पत्र लिखे हैं लेकिन दोनों की तरफ से ही कोई जवाब नहीं मिलता। एमएसपी घोषित होने का अर्थ क्या है जब इस पर खरीद ही नहीं होती। प्रदेश में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की दोनों ने किसानों को सिर्फ आश्वासन ही दिया।

-रामपाल जाट,अध्यक्ष किसान महापंचायत

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