सरकार के हवाई बेड़े का खरीदार ही नहीं:​​​​​​​अगस्ता हेलीकॉप्टर की नीलामी की 5 बार नाकाम कोशिश, अब छठी बार लगेगी बोली; निविदा जारी

जयपुर3 दिन पहले
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17 फरवरी को अगस्ता और दो अन्य विमानों के ऑक्शन की तैयारी। - Dainik Bhaskar
17 फरवरी को अगस्ता और दो अन्य विमानों के ऑक्शन की तैयारी।

बरसों पहले इस्तेमाल से बाहर हो चुके सरकार के हवाई बेड़े को कोई खरीदार नहीं मिल रहा। सरकारें बार-बार बोली लगाती हैं, लेकिन खरीदार तैयार नहीं। पिछली वसुंधरा सरकार और मौजूदा गहलोत सरकार को मिलाकर अब तक 5 बार अगस्ता की नीलामी की नाकाम कोशिशें हो चुकी हैं। अब एक बार फिर से गहलोत सरकार ने अगस्ता हेलीकॉप्टर और अपने दो विमान किंग एयर सी-90 एक तथा सी किंग बी-200 को नीलाम करने को बोली लगाई है। सिविल एविएशन निदेशालय ने नीलामी के लिए निविदा जारी कर दी है, जिसके मुताबिक 17 फरवरी को दोपहर 12 से शाम 4 बजे तक तीनों विमानों का ऑक्शन किया जाएगा।

वसुंधरा सरकार और मौजूदा गहलोत सरकार में भी हुए प्रयास, रिपेयर और मेंटिनेंस पर हर साल 2 लाख रु. का खर्चा

20 करोड़ में हुई थी खरीद
पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के लिए 2005 में 20 करोड़ रुपए के अगस्ता हैलीकाप्टर ए-109-ई की खरीद हुई थी। 2011 में यह हेलीकॉप्टर हादसे का शिकार हो गया। तत्कालीन सीएम अशोक गहलोत को ले जाते वक्त चूरू में इसकी रोटर ब्लेड्स में खराबी आ गई थी। इसके बाद से ही सरकार ने इसे उड़ान से हटा लिया था। तभी से यह स्टेट हैंगर पर खड़ा है। इसके रिपेयर और मेंटिनेंस पर सरकार हर साल 2 लाख रुपए खर्च करती है।

दो सरकारें और आठ साल से हो रहा है बेचने का प्रयास
पिछली वसुंधरा सरकार और मौजूदा गहलोत सरकार में इसे नीलाम करने के लिए कई बार बोली लगाई गई। पहले अगस्ता को करीब 18 करोड़ रुपए में नीलाम करने के लिए बोली लगी। इसके बाद 14 करोड़, 12 करोड़ 40 लाख और फिर 11 करोड़ में हेलीकॉप्टर बेचने की कोशिश कई बार हुई, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।

पहले विवादों में आ चुकी है इसकी नीलामी
पिछली वसुंधरा सरकार ने इसकी नीलामी केंद्र सरकार की कंपनी एमएसटीसी के जरिए करवाने की भी कोशिश की। तत्कालीन मुख्य सचिव ओपी मीणा की अध्यक्षता में गठित हाईपावर कमेटी की बैठक में इसका निर्णय भी लिया गया। इसके बाद सरकार ने अगस्ता का बायबैक ऑफर भी जारी किया। लेकिन सिंगल सोर्स पर टेंडर जारी किए जाने के चलते सौदा विवादों में गया। दो बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों एयरबस और बेल ने इस खरीद प्रक्रिया को अपारदर्शी बताया। इनका आरोप था कि सिंगल सोर्स टेंडर होने के कारण वे इस खरीद प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकीं। इसके बाद सरकार को यह सौदा भी रद्द करना पड़ गया।

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