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अब खरीद में फंगस:राजस्थान में कुल 1800 मरीजों को औसतन 90 हजार वायल की जरूरत; DCGI की मंजूरी और केंद्र के कंट्रोल में फंसी खरीद

जयपुर2 महीने पहलेलेखक: संदीप शर्मा
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प्रदेश में 1800 मरीज; 50 इंजेक्शन प्रति मरीज की दरकार यानी 90 हजार वायल चाहिए - Dainik Bhaskar
प्रदेश में 1800 मरीज; 50 इंजेक्शन प्रति मरीज की दरकार यानी 90 हजार वायल चाहिए

कोरोना के बाद ब्लैक फंगस लोगों की जान पर भारी पड़ रहा है। इसके इलाज में काम आने वाले लाइपोसोमल एम्फोटेरेसिन-बी इंजेक्शन नहीं मिल रहे हैं। इसका इस्तेमाल सर्जरी के बाद होता है। इंजेक्शन नहीं मिलने पर मरीज को बचाना बेहद मुश्किल हो जाता है।

एक मरीज को औसतन 50 इंजेक्शन की जरूरत होती है और अभी एक-दो इंजेक्शन ही मिल पा रहे हैं। प्रदेश में कुल 1800 मरीजों को औसतन 90 हजार वायल की जरूरत है। इंजेक्शन की कमी से उन मरीजों की जिंदगी को भी बचा पाना मुश्किल हो रहा है, जिन्हें बचाया जा सकता है। बड़ा सवाल यह है कि जिस बीमारी से सैंकड़ो लोगों की जिंदगी पर संकट हो और एक महीने से लाइपोसोमल एम्फोटेरेसिन-बी की कमी चल रही हो ताे उसकी सरकार पूर्ति क्यों नहीं कर पा रही है?

मामले में जब भास्कर ने पड़ताल की तो कई चौंकाने वाले खुलासे हुए। पहला यह कि जितनी दवाओं की जरूरत थी, उसका एक तिहाई स्टॉक भी कंपनियों के पास नहीं था। दूसरा यह कि जब राज्य सरकार के निर्देश पर चिकित्सा विभाग के आला अधिकारियों ने दूसरे देशों से लाइपोसोमल एम्फोटेरेसिन बी की खरीद करने की कोशिश की तो उसमें ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) की अनुमति जरूरी थी। अब केन्द्र ने दवा आयात और वितरण खुद के पास कर रखा है तो दवाएं आने के बाद भी उन्हें केन्द्र को ही वितरित करना है। नतीजा अन्य देशों से सीधे खरीद करना संभव ही नहीं है।

व्यवस्थाएं ‘हवा’ गर्मी में तड़प रहे मरीज

तस्वीर एसएमएस के ब्लैक फंगस वार्ड की है। यहां पंखे तक नहीं लगे हैं। गर्मी में फंगस मरीजों को और परेशान कर रहा है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो अभी प्रदेश में 1800 पेशेंट हैं। एक पेशेंट को औसतन 50 वायल की जरूरत है तो कुल 90 हजार वायल चाहिए। केन्द्र से कम आ रही हैं। इधर, आरएमएससीएल के एमडी आलोक रंजन का कहना है राज्य सरकार ने केन्द्र से 24400 इंजेक्शन मांगे तो रविवार तक 9600 ही मिले। केस बढ़ने से हालात मुश्किल होंगे।

बांग्लादेश में भी ब्लैक फंगस के अधिक मरीज...इसलिए देने से मना किया

ऐसा नहीं है कि राजस्थान में ब्लैक फंगस के मरीजों को राहत देने के लिए कोशिश नहीं की गई। हरसंभव कदम उठाए गए। जहां से इंजेक्शन मिलने की गुंजाइश दिखी, वहां संपर्क किया गया। 15 मई से पहले ब्लैक फंगस के मरीजों के लिए इंजेक्शन खरीदने को राज्य सरकार ने बांग्लादेश से संपर्क किया था। हालांकि बांगलादेश में भी ब्लैक फंगस के काफी अधिक केस फैलने और इंजेक्शन की पूर्ति नहीं हो पाने की वजह से इनकार कर दिया गया। इसके बाद प्रदेश सरकार ने चीन, इटली, डेनमार्क, हंगरी, यूएस, यूके, स्विट्जरलैंड, आयरलैंड से बात की। किसी भी जगह से बड़ी मात्रा में लाइपोसोमल एम्फोटेरेसिन बी नहीं मिला। इसके बाद तीन जगह इंजेक्शन खरीदने की बात बनती दिखी लेकिन तब तक सारा प्रोसेस केंद्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिया।

यानी खरीद से लेकर वितरण तक का पूरा काम केंद्र सरकार के अधीन हो गया। अब जबकि अन्य देशों से दवा खरीद की जानी थी तो ड्रग कंट्रोलर जनरल आफ इंडिया (डीजीसीआई) की अनुमति जरूरी हो गई। इसके बाद भी ऐसे में इंजेक्शन की खरीद का प्रोसेस सीधे कर पाना संभव नहीं हो सकता था। बहरहाल सरकार की कोशिश है कि जल्द इंजेक्शन मिले और मरीजों को राहत दी जा सके। दूसरी ओर, केन्द्र सरकार ने नेटको, एलेम्बिक, ग्यूूफिक बायो साइंसेज, लाइका, एम क्योर कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने को कहा है। माना जा रहा है कि जुलाई से ये कंपनियां प्रतिमाह एक लाख वाइल तक दे सकेंगी। लेकिन तब तक मरीजों को कैसे बचाया जा सकेगा, इसमें संदेह है।

भारत मेें ये कंपनियां बनाती हैं इंजेक्शन : सिप्ला, सन फार्मा, एएचपीएल, भारत सीरम, रेनबेक्सी, लाइफ केयर, इंटास, क्रिटिकयर लैब, सीलोन और मायलन।

वैक्सीन का ग्लोबल टेंडर संभव है तो केंद्र इसको क्यों रोक रहा: रघु शर्मा

केन्द्र मनमानी कर रहा है। वैक्सीन के ग्लोबल टेंडर के लिए हां कर दी, जो प्रैक्टिकल मुश्किल है। अब एंटी फंगल की खरीद खुद के कंट्रोल में कर ली, जबकि राजस्थान को काफी जरूरत है। दवा आपूर्ति के लिए हमने केंद्र के मंत्री-अधिकारियों से वीसी की थी और सीधे विदेश से आयात की बात रखी थी। उन्होंने तर्क रखा कि डीसीजीआई की अनुमति के बिना संभव नहीं और विरतण केन्द्र ही करेगा। अब ऐसे में हम पूरी तरह मजबूर हो गए हैं। - रघु शर्मा, चिकित्सा मंत्री

विदेश से इंजेक्शन खरीद की कोशिश की थी। डीसीजीआई की मंजूरी के बिना संभव नहीं था। केस बढ़े हैं तो पोर्टल पर अधिक केस सबमिट किए हैं। उम्मीद है कि केंद्र मदद करेगा। - आलोक रंजन, एमडी, आरएमएससीएल

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