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  • Because 60 Percent Of The Time Is Spent In Gathering Political Information, Most Of The Alerts Related To Law And Order Are Ridiculous.

राजस्थान की खुफिया एजेंसियां नेताओं की सूचना जुटाने में व्यस्त:दंगों की इंफॉर्मेशन में नाकाम; 20 साल से नहीं दिया बड़ा अलर्ट

जयपुर2 महीने पहलेलेखक: अवधेश आकोदिया
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जोधपुर और करौली में हुए दंगों पर कांग्रेस और भाजपा के बीच जारी सियासी संग्राम के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि इसे भांपने में पुलिस का खुफिया तंत्र नाकाम क्यों रहा? भास्कर ने जवाब की तलाश में पड़ताल की तो सामने आया कि इंटेलिजेंस यूनिट (स्टेट स्पेशल ब्रांच) की ऊर्जा संदिग्धों पर नजर रखने की बजाय सियासी सूचनाएं जुटाने में खप रही है। इस यूनिट में तैनात लगभग 1000 पुलिसकर्मियों का 60% से ज्यादा समय राजनीति से जुड़े इनपुट इकट्ठा करने में खर्च हो रहा है। बाकी 40% समय में जो कथित सूचनाएं जुटाई जाती हैं, उनके आधार पर या तो हास्यास्पद अलर्ट जारी किए जाते हैं या गलत।

पिछले 20 साल में इंटेलिजेंस ने ऐसा कोई बड़ा अलर्ट नहीं दिया है, जो सटीक निकला हो और जिसकी मदद से स्थानीय पुलिस ने कानून-व्यवस्था को बिगड़ने से बचा लिया हो। इंटेलिजेंस में काम कर चुके कई पूर्व व मौजूदा अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की। भास्कर ने इस बारे में इंटेलिजेंस के डीजी उमेश मिश्रा से बात की तो उन्होंने टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।

जिम्मेदारी है बड़ी... लेकिन हो रही खानापूर्ति

  • प्रदेश की कानून व्यवस्था से जुड़ी आंतरिक खुफिया सूचनाएं।
  • राज्य से सटे पाकिस्तान बॉर्डर पर संदिग्ध गतिविधियों पर नजर।
  • दूसरे देशों के लिए जासूसी करने वालों की पहचान व निगरानी।
  • वीवीआईपी व महत्वपूर्ण सरकारी भवनों की सुरक्षा व्यवस्था।
  • दूसरों देशों से प्रदेश में आने वाले नागरिकों की ट्रेकिंग व ट्रेसिंग।
  • केंद्र सरकार की व अन्य एजेंसियों के साथ जरूरत होने पर समन्वय।
  • हर साल त्योहार व बड़े आयोजनों से पहले कानून-व्यवस्था खराब होने की आशंका का अलर्ट जारी होता है, लेकिन इनमें यह स्पष्ट नहीं होता कि उपद्रव कहां हो सकता है व कौन कर सकता है?
  • फील्ड से खुफिया जानकारी के नाम पर स्थानीय अखबारों में छपी खबरों की कतरनों को गोपनीय बताकर इंटेलिजेंस मुख्यालय भेज दिया जाता है।
  • कई बार समाज में चल रही गपशप को सच मानकर फील्ड से इनपुट भेजा जाता है और इसकी पुष्टि किए बिना आधार पर अलर्ट जारी हो जाता है।
  • अधिकारी के पास संदिग्ध गतिविधि का पता होता है पर फील्ड में तैनान पुलिसकर्मी को इसकी भनक नहीं होती।

राजनीतिक खुफियागीरी में खप रही ज्यादा ऊर्जा
इंटेलिजेंस के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि हर पार्टी के ऑफिस और प्रमुख नेताओं के इर्द-गिर्द हम लोगों की तैनाती रहती है। बागी नेताओं और विपक्ष के बड़े चेहरों पर खास नजर रहती है। यहां तक ध्यान रखा जाता है कि कौन कहां जा रहा है और किससे मिल रहा है? इंटेलिजेंस यूनिट के राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल पर 2013 में तत्कालीन डीजीपी हरीश मीना ने सीएम अशोक गहलोत की मौजूदगी में पीड़ा जाहिर की थी कि इसका काम सिर्फ राजनीतिक खुफियागीरी तक सिमट कर रह गया है।

हालत ऐसी... जब गलत इनपुट पर ही लगा दिए 10 आईपीएस व 800 जवान
इंटेलिजेंस के गलत इनपुट की बानगी बीते रविवार को जोधपुर में श्रीआर्य मरुधर व्यायामशाला के सुरेंद्र बहादुर सिंह की मृत्यु के बाद देखने को मिली। इंटेलिजेंस ने गलत पहचान के कारण शवयात्रा में कानून-व्यवस्था खराब होने की आशंका का अलर्ट जारी किया, जिसके आधार पर 800 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया। इनमें 3 आईजी, 2 डीआईजी और 5 एसपी तैनात रहे।

इंटेलिजेंस में राजनीतिक सूचना जुटाने के लिए अलग विंग होती है। भैरों सिंह शेखावत सरकार के समय तक इसका काम सीमित होता था, लेकिन बाद में धीरे-धीरे इसका चलन बढ़ता गया। इंटेलिजेंस को दूसरे जरूरी इनपुट इकट्‌ठा करने पर ज्यादा फोकस करना चाहिए। - रामजीवन मीना, पूर्व डीजी

अलग कैडर तो बना पर भर्ती नहीं; न मुख्यालय से तालमेल न स्थानीय पुलिस से
2014 में इंटेलिजेंस का क्लोज कैडर बनने के बाद कांस्टेबल से लेकर सीआई तक इसी यूनिट से होते हैं, लेकिन एएसआई की भर्ती हुए 15 साल से ज्यादा हो गए हैं। हालांकि एसआई के एक बैच की अभी ट्रेनिंग चल रही है। मुख्यालय पर डीजी के अलावा दो आईजी व दो डीआईजी होते हैं जबकि फील्ड में आईपीएस स्तर के जोनल ऑफिसर के नीचे एिडशनल एसपी से सिपाही तक काम करते हैं। पूरी टीम के बीच कई साल से कोई संवाद नहीं हुआ है। न ही स्थानीय पुलिस से कोई तालमेल होता है।

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