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राजस्थान में नकली दवाओं का ओवरडोज:बड़ी कार्रवाई दिल्ली पुलिस ने ही की, ड्रग विभाग ने क्यों नहीं

जयपुर18 दिन पहलेलेखक: संदीप शर्मा
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ताज्जुब यह कि जिन कंपनियों की दवाएं पकड़ी जा रही हैं, संबंधित कंपनी का कहना है कि दवाएं हमारी नहीं हैं। - Dainik Bhaskar
ताज्जुब यह कि जिन कंपनियों की दवाएं पकड़ी जा रही हैं, संबंधित कंपनी का कहना है कि दवाएं हमारी नहीं हैं।

प्रदेश में न केवल नकली दवाएं बिक रही हैं, बल्कि इन्हें बनाया भी जा रहा है। ताज्जुब यह कि जिन कंपनियों की दवाएं पकड़ी जा रही हैं, संबंधित कंपनी का कहना है कि दवाएं हमारी नहीं हैं। इससे मुख्य आरोपी के पहुंचने तक ही मामला सिमट जाता है।

इससे राजस्थान में ही दिल्ली व अन्य राज्यों की पुलिस टीमों की कार्रवाई से भी यहां के सिस्टम पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भास्कर ने कुछ सालों की बड़ी कार्रवाई की जानकारी जुटाई तो सामने आया कि दर्द निवारक, एंटीबायटिक और गेस्ट्रो की नकली दवाएं पकड़ी गईं, उनमें दवा कंपनी के नाम से दूसरी दवा बन रही थी।

7 साल तक नकली दवाएं बनाई-बेची, राजस्थान को पता ही नहीं

दिल्ली पुलिस ने भिवाड़ी में रीको इंडस्ट्री एरिया एच 1/607 पर 2018 में कार्रवाई की और नकली दवा (पेंटाेसिड डीएसआर), पेन 40, टेक्सिमो 200एमजी, क्लेवम 625, मोनोसेफ ओ 200, स्टेमिटिल एमडी दवाओं का जखीरा पकड़ा। दवाओं को बनाने वाली मशीनरी भी पकड़ी गई। दिल्ली पुलिस ने दोषी नवीन बंसल को गिरफ्तार किया था। भिवाड़ी से चल रहा कारोबार पूरे राजस्थान में 7 साल तक चलता रहा।

एमएनसी की दवाओं की डिटेल खंगाली तो लेबल-बार कोड से नकली की पहचान हुई

केस 1; अल्ट्रासेट टैबलेट (पेन किलर), ट्रॉमाडॉल कब कार्रवाई – 2017 में जोधपुर में दवा पकड़ी। नकली कैसे होना आया सामने साल्ट नहीं होने की जानकारी आई। जब कंपनी (जाॅनसन एंड जॉनसन) को नोटिस गया तो उन्होंने कहा- दवा उनकी नहीं, नकली है। निर्माता तक लिंक नहीं हुआ, इसलिए कंपनी पर कार्रवाई नहीं हो सकी।

केस 2; जालरा एम- (डायबिटीज), विल्डेगलिप्टिन व मेटफार्मिन; कब कार्रवाई – 2017 में हनुमानगढ़ में पकड़ी। खुलासा कैसे : जांच में आया दवा में विल्डेगलिप्टिन था ही नहीं। जब कंपनी (नोवार्टिस) को नोटिस भेजा तो उन्होंने भी पकड़ी गई दवा को खुद का बताने से इंकार किया। ऐसे में कार्रवाई लिंक नहीं हो सकी और कंपनी को अगले नोटिस थम गए।

केस 3; जोनफिक्स 200 एमजी नाम से सिफेक्सिन साल्ट की दवा मार्केट में मिलती है; कब कार्रवाई – 2017 में जैसलमेर और जयपुर। कैसे पकड़ी दवाएं: जांच में सामने आया कि दवा में सिफेक्सिन बिलकुल भी नहीं था। यानि कि नकली थी। लेबल पर प्रिंटेड एड्रेस पर जब ड्रग विभाग की टीम गई तो वहां कोई कंपनी ही नहीं थी।

भास्कर अपील

जब भी कोई दवा खरीदें बिल जरूर लें और दवा का बैच नंबर जरूर देखें ताकि नकली और असली का पता चल सके।

  • राजस्थान फार्मास्यूटिकल मैन्युफैक्चरिंग एसो. के अध्यक्ष विनोद कालानी की मानें तो सब-स्टैण्डर्ड में बहुत से फैक्टर होते हैं। हम भी नकली दवाओं पर नकेल कस रहे हैं, इसके लिए बहुत से कदम उठा रहे हैं।
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