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दवा की कमी जिंदगी पर भारी:ब्लैक फंगस के मरीजों को रोज 5000 इंजेक्शन चाहिए...मिल रहे सिर्फ 1400

जयपुर25 दिन पहलेलेखक: संदीप शर्मा
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ब्लैक फंगस के मरीजों को रोज 5000 इंजेक्शन चाहिए जबकि 1400 ही मिल पा रहे हैं। - Dainik Bhaskar
ब्लैक फंगस के मरीजों को रोज 5000 इंजेक्शन चाहिए जबकि 1400 ही मिल पा रहे हैं।

प्रदेश में कोरोना के केस भले ही कम हो रहे हों लेकिन अब ब्लैक फंगस (म्यूकोर माइकोसिस) की वजह से लोगों की जान पर बन आई है। इस बीमारी के इलाज में सबसे बड़ी बाधा बनी है, इंजेक्शन की कमी। स्थिति यह है कि जहां हर दिन प्रदेशभर के अस्पतालों में 5000 से अधिक लाइपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी के इंजेक्शन चाहिए, वहीं उन्हें सिर्फ 1400 इंजेक्शन ही मिल रहे हैं।

स्थिति यह है कि मरीजों की हालत खराब हो रही है और डॉक्टर बेबस हैं। दूसरी ओर, इसके विकल्प के रूप में दिए जा रहे साधारण एम्फोटेरिसिन बी के साइड इफेक्ट काफी अधिक होने से अन्य अंग प्रभावित हो रहेे हैं। कमी का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि दो दिन से निजी अस्पतालों को एक भी इंजेक्शन नहीं मिल पाया है।

जरूरत इतनी कि एक-एक मरीज को हर दिन 8 इंजेक्शन तक लग रहे हैं
कोविड के बाद ब्लैक फंगस की शिकार 36 साल की सुभद्रा मीणा का जयपुरिया में 18 मई को ऑपरेशन हुआ था। उसी दिन शाम सुभद्रा के बायां अंग पैरालाइज हो गया। सुभद्रा के भाई अनिल का कहना है कि ब्रेन में इंफेक्शन रह गया, जिससे परेशानी बढ़ गई। पहले एक निजी अस्पताल लेकर गए, जहां बताया गया रोजाना 8 लाइपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी लगेंगे।

दो दिन तो मिले, लेकिन अब तीन दिन से सीएमएचओ आफिस से कहा जा रहा है सीधे अस्पताल को मिलेंगे। अस्पताल की डिमांड के मुताबिक एक तिहाई ही मिले हैं। ऐसे में रोज पूरे इंजेक्शन नहीं लगे तो तबीयत और खराब होनी तय है। डॉक्टर्स का भी कहना ऑपरेशन में पूरा फंगस निकालना जरूरी है। यदि जरा भी फंगस रहे तो भी मरीज को खतरा हो सकता है।

दूसरा यह कि ऑपरेशन के बाद जरूरी लाइपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी इंजेक्शन नहीं लगे ताे हालत कभी भी बिगड़ सकती है। इस केस मेें ऑपरेशन के महज कुछ घंटे बाद पैरालाइसिस होना और फिर लाइपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी नहीं लगने की वजह से मरीज के लिए बड़ा खतरा हो सकता है।

700 से अधिक मरीज हैं अभी प्रदेशभर के अस्पतालों में और उनका इलाज चल रहा है। 1 मरीज को ही कम से कम छह इंजेक्शन रोजाना लगते हैं। यानी हर दिन कम से कम 4200 इंजेक्शन चाहिए। 1400-1500 इंजेक्शन मिल रहे हैं। अस्पतालों द्वारा रोजाना 5000 की डिमांड भेजी जाती है। लेकिन 20 से 30% तक ही डिमांड पूरी हो पाती है। हर दिन डिमांड भेजा जाना, फिर उसकी कंफर्मेशन लेना, स्टाफ को भेजना और फिर दवा मंगाना। रोजाना के इस प्रोसेस से भी अस्पताल संचालक परेशान हैं।

मरीज की हालत बिगड़ रही और हर कोई बेबस

ऑपरेशन के बाद लाइपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी की जरूरत सभी को हाेती है। लेकिन कमी की वजह से डॉक्टर सभी को नहीं लगा पाते। जिस मरीज की तबीयत अधिक खराब होती है, या इंफेक्शन बहुत अधिक बढ़ने का खतरा होता है, उसे ही इंजेक्‍शन लगता है। नतीजतन, जो मरीज जल्दी सही हा़े सकते हैं, वे भी इंजेक्शन की कतार में रहते हैं और उनकी तबीयत बिगड़ती चली जाती है।

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