खतरनाक डकैतों ने बंदूक छोड़ बने किसान:लोगों ने हर दिन एक लाख रुपए तक मजदूरी देकर गांव की किस्मत बदल दी

जयपुरएक महीने पहलेलेखक: महेश शर्मा/श्यामराज शर्मा
  • कॉपी लिंक

करौली में धौलपुर बॉर्डर के आसपास (डांग क्षेत्र) के गांवों में पहले पीने का पानी तक नहीं था। आजीविका का साधन नहीं था तो लोग खतरनाक डकैत बनकर हथियार उठा लेते थे। कुछ मजदूर बन सिलिकोसिस से फेफड़े गलाने वाला खनन करने पर मजबूर होते थे। फिर 10 साल पहले लोगों ने तस्वीर बदलने की ठानी। महाराजपुरा के 47 वर्षीय रणवीर सिंह गुर्जर बताते हैं, अलवर में भी अवैध खनन से जिंदगियां बर्बाद हुई थीं। हमने सुना कि रमन मैग्सेसे अवॉर्ड विजेता राजेंद्र सिंह (वाटरमैन) ने पानी बचाने के काम किए तो वहां वर्षों से रीते पड़े कुएं-बावड़ियां चल पड़े। हमने उनसे संपर्क साधा। वह आए, महीनों तक हमारे साथ सैरनी नदी के हालात देखे, जो बरसात में तो खूब चलती लेकिन पथरीली भूमि पर मानसून बाद कहीं पानी नहीं ठहरता। फिर 2011-12 में सबसे पहले महाराजपुरा के पास धानी का तालाब बनाया।

पहाड़ी-पथरीले एरिया में कभी केवल बरसात के दिनों में बाजरे की फसल हो पाती थी। जैसे ही मानसून के बाद चारा खत्म होने लगता, गांवों के लोग दीपावली के बाद अपने पशुओं के साथ मध्यप्रदेश तक चंबल किनारे-किनारे, तो कुछ यूपी में गंगा-जमुना के आसपास चले जाते। कुछ दूसरे विकल्प की ओर बढ़ते और क्षेत्र में वैध-अवैध माइनिंग में लग जाते। कोरीपुरा के 125 परिवारों के युवा पहले खानों में मजदूरी करते, खाने के लिए भी गेहूं दूसरे गांवों से लाते थे। लेकिन इस बार गेहूं-सरसों की बंपर पैदावार हुई है। कटाई के लिए करौली-गंगापुर शहर तक के मजदूरों को ट्रैक्टर में लाए, प्रतिदिन एक लाख रुपए तक मजदूरी दी। अब इन गांवों से कई ट्रक गेहूं व सरसों बाजार में बिकने जाती है। क्योंकि पूरे साल पानी रहने लगा है और हर गांव में औसतन 500-700 बीघा जमीन पर हरियाली-खुशियां लौट आई है।

तीन साल से खेती कर रहे हैं पप्पू गुर्जर। इसी की बचत से बन रहा घर।
तीन साल से खेती कर रहे हैं पप्पू गुर्जर। इसी की बचत से बन रहा घर।

करौली के भूड़खेड़ा गांव के पप्पू गुर्जर (45) जब 28 साल के थे, घर छोड़ कर जंगलों में चले गए। काम-धंधा नहीं था तो बागी बन हथियार उठा लिए। उनके बड़े भाई औतारी भी डकैत बन गए थे। लेकिन अब जिंदगी की राह बदलकर दोनों 3 साल से खेती कर रहे हैं। कुछ बचत होने लगी तो पप्पू अपना घर भी बना रहे हैं। मौके पर कारीगरी के साथ मवेशियों की सार-संभाल करते दिखे। बोले- इलाके में पानी नहीं था। पेट पालने के लिए दो ही विकल्प थे, माइनिंग कर खुद को सिलिकोसिस में झोंक दो या हथियार उठा लो। लेकिन जो किया, उसके लिए 3 साल जेल भुगत चुका। जब से क्षेत्र में पानी सहेजने के बारे में पता चला, लौट आया। अब खेती करता हूं। दिनभर मेहनत करता हूं, रात को चैन की नींद सोता हूं। पानी आया, खेती में दो पैसे बचने लगे तो घर भी बना रहा हूं।

राजवीर ने गांव में पानी आने की खबर सुन बंदूक छोड़ हल उठाया।
राजवीर ने गांव में पानी आने की खबर सुन बंदूक छोड़ हल उठाया।

इसी तरह कभी धौलपुर से आकर रुग्गापुरा में बसे राजवीर ने भी अब बंदूक छोड़ कर हल-फावड़ा उठा लिया है। इन्होंने 2004 में पुलिस के समक्ष सरेंडर किया, साढ़े सात महीने जेल में गुजारने के बाद अब सालभर में 2 फसल उगा रहे हैं। बोले- कभी पीने के पानी के भी लाले थे तो जो सूझा वही किया। अब घरवालों के साथ खेती करता हूं। पहले केवल बाजरा होता था, जिससे गुजारा मुश्किल था। अब नदी पर एनिकट-पोखर बनने से पानी आया तो कुएं-बोरवेल भी चल निकले। मई-जून में भी खेतों में पशुओं का चारा उगा लेते हैं।

यह है करौली में धौलपुर बॉर्डर पर स्थित सैरनी नदी। यह सूखी-उजाड़ थी। आखिर ग्रामीणों ने 10 साल में 36 गांवों में 250 तालाब बना दिए। नदी जिंदा हुई तो खेती बारह महीनों लहलहा रही है।
यह है करौली में धौलपुर बॉर्डर पर स्थित सैरनी नदी। यह सूखी-उजाड़ थी। आखिर ग्रामीणों ने 10 साल में 36 गांवों में 250 तालाब बना दिए। नदी जिंदा हुई तो खेती बारह महीनों लहलहा रही है।

करौली में धौलपुर बॉर्डर के आसपास के ऐसे लगभग 40 परिवारों के युवा मुख्यधारा में लौट आए हैं। कभी दस्यु बनना ध्येय था, अब किसान बन खेती कर रहे हैं। उनके बच्चे पढ़ाई में मन लगा रहे हैं। यह सब पानी की वजह से मुमकिन हो पाया है। 10 साल से यहां पानी बचाने और सहेजने पर हुए क्रांतिकारी कार्यों के चलते पार्वती नदी की सहायक ‘सैरनी’ नदी फिर जी उठी। इसके दोनों ओर बसे 36 गावों के आसपास 250 से ज्यादा छोटे-बड़े तालाब-एनीकट बनने से पूरे साल पानी रहने लगा है। सूखे कुएं फिर जिंदा हो गए। इससे हर गांव में औसतन 500-700 बीघा जमीन पर हरियाली-खुशियां लौट आईं।

मासलपुर के खेड़ा की पहाड़ियों से निकलने वाली नदी की मुख्यधारा के आगे कांजरी का तालाब बनाया।
मासलपुर के खेड़ा की पहाड़ियों से निकलने वाली नदी की मुख्यधारा के आगे कांजरी का तालाब बनाया।

आखिर कैसे बनी बात: अलवर में रिश्तेदारों से कुएं चलने के बारे में सुना तो 8 साल से मुमकिन होने लगे वही काम
महाराजपुरा के 47 वर्षीय रणवीर सिंह गुर्जर बताते हैं, यह खुशहाली पानी सहेजने से आई है। दरअसल, उनके कुछ रिश्तेदार अलवर में रहते हैं। वहां भी अवैध खनन से जिंदगियां बर्बाद हुईं। फिर रमन मैग्सेसे अवाॅर्ड विजेता राजेंद्र सिंह (वाटरमैन) ने पानी बचाने के काम किए तो वर्षों से रीते पड़े कुएं-बावड़ियां चल पड़े। हमने उनसे संपर्क साधा। उन्होंने महीनों तक हमारे साथ सैरनी नदी के हालात देखे, जो बरसात में तो खूब चलती लेकिन पथरीली भूमि पर मानसून बाद कहीं पानी नहीं ठहरता। फिर सबसे पहले मेरे गांव के पास ‘धानी का तालाब’ बनाया। गांव के 100 परिवारों ने पहले 2500-2500 और फिर 3500-3500 रुपए चंदा दिया। दो हिस्से राजेंद्र सिंह के ‘तरुण भारत संघ’ ने लाकर लगाए। फिर यही कारवां 36 गांवों में चल निकला। एक तिहाई गांव वालों की हिस्सेदारी से नदी पर जल प्रबंधन के काम होने लगे।

नदी बचाने को 36 गांवों के 75 लोगों की ‘सैरनी नदी संसद’ बनाई
वर्ष 2011-12 में सबसे पहले महाराजपुरा के तालाब बनाने के बाद 3-4 साल में भूड़खेड़ा में कांछरे का तालाब और फिर मासलपुर के खेड़ा की पहाड़ियों से निकलने वाली नदी की मुख्यधारा के आगे कांजरी का तालाब बनाया। यहां पूरे साल पानी रुकने लगा तो पहले इंजन से सिंचाई शुरू हुई। फिर हर गांव में अलख जागी। फिर तो कुछ परिवारों ने मिलकर भी छोटे पोखर बनवाए। सबकी भागीदारी के लिए नदी किनारे बसे गांवों के लोगों को लेकर सैरनी नदी संसद बनाई। यह नदी और गांवों में पानी के प्रबंधन, विवाद और भविष्य को लेकर रूपरेखा तय करती है। इसके साथ हर गांव में बनी समिति लोकल प्रबंधन देख रही है।

धरती का चेहरा बदला और जिंदगियां बदलने का भरोसा भी बना
करौली में पानी को लेकर जो काम हुए, उससे लोगों का जीवन और प्रकृति का चेहरा बदला है। 10-12 साल पहले यहां आए तब धरती का चेहरा डरावना था। बिन हरियाली पठारी एरिया में हर ओर हताशा, लोगों में बीमारी और डर का माहौल था। आज लोगों का लोगों के लिए और लोगों द्वारा किया गया नया जीवन है।
- राजेंद्र सिंह, तरुण भारत संघ