भास्कर संडे स्पेशल / तारीखें तो लौट आएंगी पर सामाजिक होने का अंदाज, अदब और आदतें अब शायद ही कभी लौटकर आएं...

कोरोना महामारी हमसे 2020 के दो माह छीन चुकी है। तारीखें खाने का सिलसिला जारी है लेकिन ये तारीखें तो अगले कैलेंडर में फिर आ जाएंगी, पर वो सब कभी नहीं लौटेगा जो हमने खो दिया। कोरोना महामारी हमसे 2020 के दो माह छीन चुकी है। तारीखें खाने का सिलसिला जारी है लेकिन ये तारीखें तो अगले कैलेंडर में फिर आ जाएंगी, पर वो सब कभी नहीं लौटेगा जो हमने खो दिया।
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कोरोना महामारी हमसे 2020 के दो माह छीन चुकी है। तारीखें खाने का सिलसिला जारी है लेकिन ये तारीखें तो अगले कैलेंडर में फिर आ जाएंगी, पर वो सब कभी नहीं लौटेगा जो हमने खो दिया।कोरोना महामारी हमसे 2020 के दो माह छीन चुकी है। तारीखें खाने का सिलसिला जारी है लेकिन ये तारीखें तो अगले कैलेंडर में फिर आ जाएंगी, पर वो सब कभी नहीं लौटेगा जो हमने खो दिया।

  • लॉकडाउन के दौरान शायद पहली बार इतने वक्त तक घर रहे। परिवार संग बिताने को समय मिला,मां-बाप के साथ घंटों बतियाए
  • परिवार की सुरक्षा हमारी बड़ी प्राथमिकता रही, सोशल डिस्टेंसिंग, हाइजीन, सैनिटाइजेशन जैसी सावधानियों से हमने कोरोना काे घर से दूर रखा

दैनिक भास्कर

May 24, 2020, 06:23 AM IST

जयपुर. कोरोना महामारी हमसे 2020 के दो माह छीन चुकी है। तारीखें खाने का सिलसिला जारी है लेकिन ये तारीखें तो अगले कैलेंडर में फिर आ जाएंगी, पर वो सब कभी नहीं लौटेगा जो हमने खो दिया। सामाजिक प्राणी होने का हमारा स्वभाव, साथ रहने-काम करने की फितरत, हाथ मिलाकर, गले मिलकर स्वागत करने की हमारी रवायत...सब कुछ। क्योंकि डब्ल्यूएचओ भी कह चुका है कि हमें कोरोना के साथ जीना सीखना होगा। भास्कर संडे स्पेशल में जानिए, हमने क्या खोया, क्या पाया और क्या कभी नहीं लौटेगा...
डिस्टेंसिंग हुई सोशल-
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है...कोरोना ने हमारे इस सार्वभौमिक सच को चुनौती दी है। जन्मजात मिलने-मिलाने की हमारी आदतों से ही हमें महरूम कर दिया है। शगुन-अपशगुन तक सिमटी रहने वाली हमारी छींकों को एकदूसरे का दुश्मन बना दिया है। बुजुर्गों की खांसकर आने की रवायत अब महामारी का बड़ा संकेत बन गई है। शरीर को गाहे-बगाहे तपा देने वाला मामूली बुखार डराने लगा है। कोरोना के खौफ की दस्तक बन चुके ये संकेत अब हमें हमेशा डराएंगे। होली हो या ईद...पहले की तरह गले लगकर मिलना शायद अब कभी नहीं होगा। बीमारी ने हमारी काया के साथ-साथ हमारी आत्मा को कमजोर किया है। जाहिर है यह नुकसान कभी पूरा नहीं होगा।
अक्षय तृतीया पर 25000 शादियां होनी थीं, टल गईं... नवरात्र, त्योहार सब फीके

  • 25000 शादियां होनी थी 26 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन जयपुर में। यह केवल रजिस्टर्ड आंकड़ा है जो होटल-पैलेस आदि की बुकिंग्स से लिया गया है। लगभग सभी आगे कर दी गईं।
  • कई वार- त्योहार आए, उत्सव, व्रत आदि आए लेकिन बिना किसी आयोजन के अपने-अपने घर में मना लिए गए। बुरा तो लगा पर मन में एक ही बात थी। जान है तो जहान है। त्योहार अगले बरस फिर आ जाएगा, मगर जिंदगी फिर नहीं मिल पाएगी।

सर्राफा, रियल स्टेट, वाहन व टैक्सटाइल क्षेत्र का 1 लाख करोड़ का व्यापार ठप

  • राजस्थान में एक साल में औसतन बिजनेस हाेता है 6 लाख कराेड़ रुपए का। दाे माह के लाॅकडाउन से एक लाख कराेड़ रुपए का काराेबार हुआ प्रभावित। 
  • राजस्थान का रियल स्टेट सेक्टर को करीब 8,000 कराेड़ रुपए का हर्जाना हुआ है। 
  • ऑटाेमाेबाइल सेक्टर को  6,500 कराेड़ रुपए नुकसान हुआ।
  • राजस्थान की पहचान माइनिंग सेक्टर भी 6000 कराेड़ रुपए के नुकसान के साथ तीसरे नंबर पर चल रहा है।
  • जयपुर का सर्राफा बाजार पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। लॉकडाउन के इन दो महीनों में इस बाजार को 4000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा है।
  • राजस्थान में टैक्सटाइल मार्केट भी खासा नाम रखता है। यहां से पूरी दुनिया में टैक्सटाइल एक्सपोर्ट होता है। लॉकडाउन के कारण यह कारोबार भी त्रस्त हुआ और 4,000 कराेड़ रुपए का काराेबार हुआ प्रभावित।

(स्राेत: फाेर्टी अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल, वित्त विशेषज्ञ पंकज घीया, फाडा राजस्थान चैयरमैन साईं गिरधर के अनुसार)
47,802 अधिकारी-कर्मचारी मिलने थे, अब होगी देरी

  • लॉकडाउन के चलते 18 बड़ी भर्तियों के 47802 पदों पर भर्तियां अटक गई। इनमें कुछ की परीक्षाएं बाकी है तो कुछ का परिणाम और नियुक्ति का काम। अब इनमें 6 माह तक की देरी हो सकती है। इनमें से 15 भर्तियां तो 2018 से चल रही है।
  • फार्मासिस्ट भर्ती परीक्षा, लाइब्रेरियन भर्ती परीक्षा, कृषि पर्यवेक्षक भर्ती परीक्षा और पशु चिकित्सा अधिकारी भर्ती परीक्षा की तारीखों का एलान हो गया था। सभी परीक्षाएं अप्रैल में होनी थी। अब स्थगित करनी पड़ी। अभी तक इन परीक्षाओं की नई तिथियों घोषित नहीं हुई हैं।
  • हालांकि लॉकडाउन के चलते कोई भर्ती रद्द नहीं हुई है। कुछ परीक्षाओं की तिथियों को स्थगित किया गया है। 5500 पदों की कांस्टेबल भर्ती के लिए इसी साल दिसंबर-जनवरी और 4421 पदों की पटवारी भर्ती के लिए जनवरी-फरवरी में आवेदन लिए गए थे। कांस्टेबल भर्ती में 17 लाख और पटवारी भर्ती में 13 लाख आवेदन आए। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग के हिसाब से इन दोनों भर्तियों की परीक्षाएं कराना बड़ी चुनौती बन गया है।
  • एलडीसी भर्ती के 11258 चयनितों और सेकंड ग्रेड शिक्षक भर्ती के 9 हजार चयनितों की केवल नियुक्ति का काम बाकी थी। संबंधित विभागों में नियुक्ति का काम प्रोसेज में चल रहा था। लॉकडाउन हटने के बाद ही इन 20258 चयनितों को नियुक्ति मिल सकेगी।
  • 2018 में आई आरएएस भर्ती, महिला सुपरवाइजर (महिला अधिकारिता), महिला सुपर-वाइजर (आंगनबाड़ी) व कृषि पर्यवेक्षक सहित कई भर्तियों का मामला कोर्ट में लंबित है।

और सीख मिली: संस्कार, स्वच्छता, बचत और सामाजिकता

संस्कार- लॉकडाउन के दौरान शायद पहली बार इतने वक्त तक घर रहे। परिवार संग बिताने को समय मिला। मां-बाप के साथ घंटों बतियाए। दादा-दादी ने पोते-पोतियों को उनके मां-बाप के किस्से सुनाए। रिश्तों पर जमी धूल साफ हो गई।
स्वच्छता- परिवार की सुरक्षा हमारी बड़ी प्राथमिकता रही। सोशल डिस्टेंसिंग, हाइजीन, सेनेटाइजेशन जैसी सावधानियों से हमने कोरोना काे घर से दूर रखा। हैंड वॉश, मास्क से खुद को सेफ रखा। बच्चों को हैंडवॉश के ढंग समझाते हुए दुलारा।
बचत- लॉकडाउन के दौर ने हमें बचत करना भी सिखाया। अभी बचाया पैसा ही आगे काम आएगा, यह सबक हमने समझा। एक-दूसरे की जरूरतें समझ में आईं और खुद को उनके अनुसार ढाला। कई अनावश्यक खर्चों को हटा दिया।
सामाजिकता- लॉकडाउन में हजारों लोगों ने लाखों बेसहारा लोगों को सहारा दिया। हर संवेदनशील इंसान इसी कोशिश में लगा रहा कि कोई गरीब भूखा न रहे। हजारों खाने के पैकेट बंटे। कई जगह लंगर लगे। लोगों के घरों तक भोजन पहुंचाया।

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