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कैमरे पर पहली बार राजस्थान की गजलक्ष्मी:एक मात्र ऐसा मंदिर जहां लक्ष्मीजी दो हाथियों पर सवार, जयपुर में है 156 साल पुराना यह मंदिर

जयपुर8 महीने पहलेलेखक: विष्णु शर्मा

छोटी काशी के नाम से पहचान रखने वाले जयपुर में कई बड़े और प्रसिद्ध मंदिर है, लेकिन यहां राजस्थान का सबसे पुराना और अनूठा लक्ष्मी मंदिर है। इस न तो मंदिर के बारे में किसी को जानकारी है और न ही यहां विराजित मां लक्ष्मी की प्रतिमा की। यह एक मात्र ऐसा मंदिर होगा, जहां लक्ष्मी जी गज लक्ष्मी के रूप में विराजित है। मां लक्ष्मी यहां दो हाथियों पर सवार है। बताया जाता है कि मंदिर करीब 156 साल पुराना है।

जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में सन 1865 में महालक्ष्मी का मंदिर आगरा रोड पर बनाया गया था। इसकी स्थापना सन 1865 में पंचद्रविड़ श्रीमाली ब्राह्मण समाज द्वारा की गई थी। श्रीमाली ब्राह्मणों की कुलदेवी होने से इस प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर में सेवा पूजा भी इसी समाज के ब्राह्मण करते हैं।

महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना सन 1865 में पंचद्रविड़ श्रीमाली ब्राह्मण समाज द्वारा की गई थी।
महालक्ष्मी मंदिर की स्थापना सन 1865 में पंचद्रविड़ श्रीमाली ब्राह्मण समाज द्वारा की गई थी।

इनके पूजन से अविवाहित लड़कियों की शादी भी जल्दी
जयपुर में यह मंदिर सांगानेरी गेट के समीप अग्रवाल कॉलेज के सामने स्थित है। मंदिर में 22 साल से सेवा पूजा कर रहे संतोष शर्मा का कहना है कि दीपावली पर विशेष पूजा अर्चना की जाती है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मनोकामना पूरी होती है। अविवाहित लड़कियों के मां लक्ष्मी के पूजन से शादी भी जल्दी होती है।

जयपुर वेधशाला के निर्माता के पूर्वजों को यहां लाया गया था
जय विनोदी पंचाग के आदित्य मोहन श्रीमाली ने बताया कि जहां भी श्रीमाली ब्राह्मण रहते हैं, वहीं पर मां लक्ष्मी जी का मंदिर जरुर होता है। जयपुर वेधशाला का निर्माण करने वाले अपने प्रधान राज्य ज्योतिषी पंडित केवलराम श्रीमाली के पूर्वजों को करीब 200 साल पहले जयपुर लाया गया था। तब जयपुर में महालक्ष्मी के पूजन के लिए मंदिर का निर्माण किया गया था।

पंडित केवल राम श्रीमाली की बुआ सदा बाई कुंवर ने अपनी संपत्ति मंदिर के लिए दान कर दी। इसका पत्र साक्ष्य आज भी मौजूद है।
पंडित केवल राम श्रीमाली की बुआ सदा बाई कुंवर ने अपनी संपत्ति मंदिर के लिए दान कर दी। इसका पत्र साक्ष्य आज भी मौजूद है।

सवाई रामसिंह द्वितीय के शासन में सन 1860 में लाला मोतीलाल जी के बाग में से करुणा शंकर भट्‌ट, रामकुमार गुर्जर गौड़ ने समस्त श्रीमाली ब्राह्मणों को डेढ़ बीघा जमीन समर्पित की थी। जमीन मिलने के बाद रुपयों की जरूरत हुई। तब पंडित केवल राम श्रीमाली की बुआ सदा बाई कुंवर ने पंचों को अपनी संपत्ति मंदिर के लिए दान कर दी। इसके बाद महालक्ष्मी के मंदिर की स्थापना की गई। इसके पत्र आज भी मौजूद है।

सैनिक टुकड़ी के लिए मंदिर की जमीन पर कब्जा कर भवन को ध्वस्त किया गया
आदित्यमोहन श्रीमाली के मुताबिक जमीन मिलने के बाद जयपुर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने सैनिक टुकड़ी के उपयोग के लिए इस डेढ़ बीघा भूमि को कब्जे में ले लिया। यहां शिवालय और लक्ष्मी मंदिर को छोड़कर इस डेढ़ बीघा भूमि को अधिग्रहित कर लिया। केवल शिवालय और लक्ष्मी मंदिर को छोड़कर समस्त भवन को ध्वस्त कर दिया। तब कब्जे की जमीन को दोबारा प्राप्त करने के लिए काफी प्रयास किए गए।

बताया जाता है कि तब जयपुर महाराजा के अंतरंग खवास जी को 500 रुपए नहीं देने पर मामला अटक गया। इसके बाद 1921 से 1923 के बीच केवलराम श्रीमाली के पौते और जयपुर राज्य के प्रधान राजज्योतिषी पंडित नारायण जी शर्मा के प्रयासों से तत्कालीन गृह मंत्री पंडित गोपीनाथ जी पुरोहित और राजमाता तंवर जी के सहयोग से दोबारा मंदिर पर कब्जाई गई भूमि को प्राप्त किया गया। वहां दो कमरों का निर्माण करवाया गया।