मिर्जा इस्माइल के पड़पोते हैं घुड़सवार फुआद मिर्जा:ओलिंपिक ब्रॉन्ज मेडलिस्ट बेटीना हॉय के घोड़े पर बैठकर टोक्यो में उतरे थे, फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय

जयपुर4 महीने पहलेलेखक: प्रेरणा साहनी
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2019 में अर्जुन अवॉर्ड से नवाजे जा चुके फुआद के पार्टनर घोड़े का नाम सेन्यूअह मेडीकॉट है जो ओलिंपिक ब्रॉन्ज मेडलिस्ट बेटीना हॉय का घोड़ा है। - Dainik Bhaskar
2019 में अर्जुन अवॉर्ड से नवाजे जा चुके फुआद के पार्टनर घोड़े का नाम सेन्यूअह मेडीकॉट है जो ओलिंपिक ब्रॉन्ज मेडलिस्ट बेटीना हॉय का घोड़ा है।

2018 में जकार्ता में आयोजित एशियन गेम्स के डबल सिल्वर मेडलिस्ट रहे व टोक्यो ओलिंपिक्स में इक्वेस्ट्रियन स्पोर्ट्स में भारत को फाइनल तक ले जाने वाले फुआद मिर्जा का जयपुर से एक खूबसूरत रिश्ता है। वे सर मिर्जा इस्माइल के पड़पोते हैं जो मैसूर के दीवान थे। मिर्जा को राजा मानसिंह जयपुर ले कर आए थे। 40 के दशक में वो जयपुर के प्राइम मिनिस्टर रहे और उन्होंने जयपुर की काया पलटने के लिए कई कदम उठाए। उन्हीं के नाम पर एमआई रोड का नाम रखा गया है। फुआद मिर्जा के दादा मेजर मोहम्मद मिर्जा जयपुर की 61 कैवलरी से जुड़े थे। उन्ही के अंकल थे मिर्जा इस्माइल। साथ ही 61 कैवलरी के पूर्व कमांडिंग ऑफिसर अर्जुन अवॉर्डी कर्नल राजेश पट्‌टू उनके प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं। राजस्थान और खासकर जयपुर की विरासत से फाउद के खास रिश्ते के कारण राजस्थान इक्वेस्ट्रियन एसोसिएशन उन्हें जयपुर के पूर्व राजपरिवार के साथ मिलकर सम्मानित करने की तैयारी कर रही है। उनके भारत लौटने पर यह आयोजन किया जाएगा।

टोक्यो ओलिंपिक के फाइनल में पहुंचे फुआद मिर्जा।
टोक्यो ओलिंपिक के फाइनल में पहुंचे फुआद मिर्जा।

62 राइडर्स में फुआद ने हासिल की 23वीं रैंक

हाल ही संपन्न हुए ओलिंपिक्स के इंडीविजुअल इवेंटिंग में 59.60 के स्कोर के साथ फुआद ने 23वीं रैंक हासिल की। गौरतलब है कि फुआद से पहले इम्तियाज अनीस ने वर्ष 2000 में सिडनी ओलिंपिक्स में और स्व. विंग कमांडर आईजे लांबा ने 1996 में एटलांटा ओलिंपिक्स खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। लेकिन फुआद फाइनल तक पहुंचने वाले अकेले खिलाड़ी हैं। इस इक्वेस्ट्रियन ट्रायथलॉन में तीन इवेंट होते हैं- ड्रसाज, क्रास कंट्री और शो जंपिंग। ड्रसाज में फुआद ने 9वीं रैंक हासिल की थी। दूसरे इवेंट में 22वीं और तीसरे इवेंट में 23वीं रैंक हासिल की। पिछले साल साउथ ईस्ट एशिया ओशियाना ग्रुप में टॉप रैंकिंग में जगह बनाकर फाउद ने ओलिंपिक्स में जगह बनाई। 2019 में अर्जुन अवॉर्ड से नवाजे जा चुके फुआद के पार्टनर घोड़े का नाम सेन्यूअह मेडीकॉट है जो ओलिंपिक ब्रॉन्ज मेडलिस्ट बेटीना हॉय का घोड़ा है। फुआद के स्पॉन्सर एम्बैसी ग्रुप के सीईओ और एमडी जीतू विरमानी ने बताया कि घुड़सवारी महंगा खेल है।जिसमें इंसान और घोड़े दोनों की काबिलियत बराबर होनी चाहिए।इसके लिए अच्छे घोड़े और ट्रेनर जरूरी हैं। फुआद के घोड़ो सेग्न्योर मेडीकॉट को 2017 में 3 लाख यूरो में और दजारा 4 को 2019 में 2,75000 यूरो में खरीदा गया था।

टोक्यो ओलिंपिक में फुआद।
टोक्यो ओलिंपिक में फुआद।

2014 से देश से बाहर प्रशिक्षण ले रहे हैं फुआद

फुआद के पिता और वेटरिनेरी डॉक्टर हस्नेयन मिर्जा ने बताया कि मैसूर में 200 पर्शियन और अरबी घोड़े लाने वाले इरान स्थित शिराज के आगा अली अस्कर के पोते थे मिर्जा इस्माइल। अस्कर 16 साल के थे जब 1824 में वो अपने दो भाइयों के साथ भारत आए थे। एक दौर ऐसा था जब फातिमा बेकरी के पास स्थित उनके घर के पीछे बने अस्तबल में लगभग 700 घोड़े थे। वे मैसूर महाराजा के करीबी भी थे। मैसूर के दीवान सर मिर्जा इस्माइल घोड़े पर सवार होकर पूरे शहर में घूमते थे। कर्नाटक के विकास में उनकी अहम भूमिका रही। वे मेरे पिता के अंकल थे। चूंकि मेरे पिता मेजर मोहम्मद मिर्जा जयपुर की 61 कैवलरी में थे, ऐसे में फुआद की जिद पर हम राइडिंग के लिए 2004 में उसे जयपुर लेकर आए थे। घोड़ों से हमारे घराने का जुड़ाव पिछली 6 पीड़ियों से है। फुआद 5 साल की उम्र से राइडिंग कर रहा है । 2014 से वो भारत से बाहर रहकर इक्वेस्ट्रियन स्पोर्ट्स में प्रशिक्षण ले रहा है और इंटरनेशनल कंपीटिशन में हिस्सा ले रहा है। इसकी वजह है कि भारत में इतने इक्वेस्ट्रियन इवेंट नहीं होते जबकि विदेशों में मार्च से नवंबर के बीच लगातार कंपीटिशन होते हैं जिससे राइडर और घोड़े, दोनों फॉर्म में रहते हैं।

1980 में ओलिंपिक्स में शामिल हुए थे राजस्थान के राइडर

राजस्थान इक्वेस्ट्रियन फेडरेशन के अध्यक्ष रघुवेन्द्र सिंह डृंडलोद के मुताबिक चौंकाने वाली बात यह भी है कि आर्मी के हाथ में ईएफआई की लगाम होने के बावजूद आर्मी से 1980 के बाद कोई ओलिंपिक तक नहीं पहुंचा। 1980 में हुए मॉस्को ओलिंपिक्स में राजस्थान से विशाल सिंह, खान मोहम्मद खान,हुसैन खान और हरियाणा से धार्यव सिंह ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था । रिजर्व में जेएस आहलूवालिया थे। टीम के कोच तब 61 कैवलरी रेजीमेंट के कर्नल बिली सोढ़ी थे। पिछले साल अक्टूबर में जब खेल मंत्री ने ओलिंपिक्स की तैयारी जानने के लिए मीटिंग ली थी तब तक ईएफआई को अंदाजा भी नहीं था कि फुआद मिर्जा ओलिंपिक्स के लिए क्वालिफाई कर चुके हैं। उन्हें ईएफआई की तरफ से कोई सपोर्ट नहीं मिला। अपने स्पॉन्सर जीतू विरमानी की बदौलत वो पिछले लगभग 10 सालों से ट्रेनिंग ले रहे हैं और खेल रहे हैं।

सवाई मानसिंह के आग्रह पर मैसूर से 2000 किमी दूर स्थित जयपुर आए थे इस्माइल

1940 में महाराजा कृष्णराजा की मृत्यु के बाद नए महाराजा धर्मराजा वाडियर से उनका तालमेल नहीं बैठा और 1941 में उन्होंने मैसूर के दीवान पद से इस्तीफा दे दिया। मैसूर राजा के दीवान का पद छोड़ते ही सर मिर्जा के पास कई राजाओं ने अपने राज का दीवान पद सम्भालने का आग्रह किया। सबसे प्रबल आग्रह सवाई मानसिंह का था और उन्होंने सर मिर्जा को आश्वस्त किया कि उन्हें उनके राज्य में खुली छूट मिलेगी और जैसा उन्होंने मैसूर के लिये करके दिखाया वैसा ही जयपुर में कर दिखाएं। सर मिर्जा को जयपुर का दीवान बनाने के लिए सवाई मानसिंह ने फैसला तो कर लिया। लेकिन उन्हें जयपुर की दीवानी देना कई ठाकुरों और जागीरदारों को गवारा नहीं हुआ। जून 1942 में सर मिर्जा इस्माइल ने विरोधों के बावजूद प्राइम मिनिस्टर का पद सम्भाला और सवाई मानसिंह ने उन्हें परकोटे के बाहर के दक्षिण छोर के विकास का जिम्मा सौंपा। यह काम इतने बेहतर तरीके से अंजाम दिया गया कि केवल एक साल के लिए दीवान का पद स्वीकार करने वाले सर मिर्जा का कार्यकाल दो वर्ष बढ़ा दिया गया। उन्होंने जयपुर में अक्टूबर 1945 में पहला साहित्य उत्सव पेन कॉन्फ्रेंस करवाया था जिसमें सरोजिनी नायडू ,पं. नेहरू और डा. एस राधाकृष्णन शामिल हुए थे।