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राजनीतिक में दल-बदल पर कानूनी एक्सपर्ट की राय:गया लाल ने एक पखवाड़े में ही सदन में कई बार बदला था दल, अब इस कानून को भी नए सिरे से देखने की जरूरत,

जयपुर25 दिन पहले
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लेखक ध्रुव गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं।

राजस्थान की राजनीतिक स्थिति के बीच, जहां सत्तारूढ़ सरकार को बहुमत का समर्थन साबित करना है, उसमें आम आदमी कोई मदद नहीं कर सकता, लेकिन महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में ऐसी ही घटनाओं से तुलना कर सकता है। ऐसे संकट का फिर से उभरकर सामने आना पुराने दल-बदल कानून के पुनरावलोकन की मांग करता है, उसमें संशोधन की जरूरत को रेखांकित करता है।

राजनीतिक दल-बदल का इतिहास पुराना है। यह मॉन्टफोर्ड रिफोर्म के समय से है। हालांकि वह कुख्यात ‘आया राम-गया राम’ का मामला था, जब गया लाल ने एक पखवाड़े में ही सदन में कई बार दल बदला, जिसके बाद दल-बदल विरोधी कानून बनाने को गति मिली।

1967 में तत्कालीन गृहमंत्री वाईबी चह्वाण की अध्यक्षता में ‘कमेटी ऑन डिफेक्शन’ (दल-बदल विरोधी कमेटी) का गठन हुआ। विधायकों के दल-बदल के पीछे पद का प्रलोभन प्रमुख कारण था। कमेटी को दल-बदल के दुष्परिणामों का अध्ययन करना था। कमेटी ने अनुशंसा की कि एक सदस्य को अपनी पार्टी से बंधा होना चाहिए, जिस पार्टी से वह चुनाव जीता या जीती है। दल-बदल करने वाले को मंत्री बनाने पर प्रतिबंध लगना चाहिए। 

दल-बदल को रोकने वाले कानून को 1973 और 1978 में लागू करने के दो असफल प्रयासों के बाद अंतत: संविधान संशोधन (52वां संशोधन) कानून, 1985 में लागू हुआ। कानून ने भारत के संविधान में दसवीं अनुसूची शामिल की जिसमें उन सदस्यों को अयोग्य ठहराने का प्रावधान था, जो अपने राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग देते हैं या पार्टी के निर्देश के विपरीत वोट देते हैं या वोट देने के समय अनुपस्थित रहते हैं।

हालांकि स्वेच्छा से सदन की सदस्यता त्यागने के मामले को अयोग्यता का आधार नहीं माना गया। अब जबकि कानून पार्टी के एक तिहाई सदस्यों के पार्टी से अलग होने की इजाजत देता है, तो दलबदल के बाद मंत्री पद हासिल करने के मामले में कोई रोक नहीं है, जबकि पार्टी में विभाजन पर रोक है और किसी मंत्री पद पर नियुक्त होने पर तब तक रोक है, जब तक सदस्य का शेषकाल समाप्त नहीं हो जाता या वह सदन में दुबारा नहीं चुनकर आता। संशोधन के बाद वाला हिस्सा समस्या पैदा करता है। 

दलबदल के कारण अयोग्य होने वाले सदस्य के किसी उपचुनाव में जीतकर आने व मंत्री बनने का दरवाजा खुला रहता है। कांग्रेस के सदस्य विश्वजीत राणे का उदाहरण सामने है, जिन्होंने चुनाव के बाद पार्टी से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल होकर मंत्री बन गए। यह उदाहरण प्रावधानों में संशोधन की आवश्यकता को सामने लाता है।

दल-बदल कानून में एक अन्य छिद्र यह है कि कानून सदस्य को इस्तीफा देने से नहीं रोकता बल्कि वास्तव में यह स्पीकर पर छोड़ देता है। नतीजा यह है कि जब सरकार को सदन में बहुमत नहीं होता है तो सदस्यों के बड़ी संख्या में इस्तीफा देने का चलन दिख रहा है।

हालांकि राज्य विधानसभा के संचालन की नियमावली आमतौर पर अविश्वास प्रस्ताव लाने का अवसर देती  है, जो मंत्रीमंडल पर अविश्वास को प्रदर्शित करता है। यह प्रावधान के तहत अंतिम प्रयास को दिखाता है लेकिन समूह में इस्तीफा देकर सरकार के सदन में समर्थन की संख्या को कम कर देने के तरीके को रोक नहीं पाती। इसीलिए सरकार का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह सदन में बहुमत के समर्थन को साबित करे।

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