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राजस्थान में प्रेशर पॉलिटिक्स:गहलोत के नंबर गेम से पायलट पॉवर लेस, सचिन के पास 19 विधायकों का समर्थन हो तब भी सरकार पर संकट नहीं; लेकिन खींचतान बढ़ना तय

जयपुर3 महीने पहलेलेखक: गोवर्धन चौधरी
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राजस्थान में पिछले दस दिनों से आई सियासी आंधी थम सी गई है। चमकते-गरजते बादलों के बीच पायलट दिल्ली का सफर करके आ चुके हैं। दोनों खेमों के समर्थकों की बयानों की गर्जनाओं के बीच गहलोत क्वारैंटाइन हो गए हैं। पिछले साल ये ही दिन थे। ऐसा ही बगावत का मौसम था, लेकिन इस बार सियासी समीकरण अलग हैं। अभी राजनीतिक गलियारों से सिर्फ एक ही बात सामने आ रही है कि यह प्रेशर पॉलिटिक्स से अधिक कुछ नहीं।

दैनिक भास्कर संवाददाता ने पिछले साल और इस बार के हालात का विश्लेषण किया। तीन सवालों पर एक्सपर्ट और जानकारों से बात की। समझा कि, क्या गहलोत सरकार पर कोई संकट है? क्या पायलट पिछले साल से कमजोर हुए हैं? क्या सरकार पर आगे भी संकट रहेगा? निष्कर्ष निकलकर आया कि अभी गहलोत सरकार पर कोई संकट नहीं है। पायलट के साथ मैजिक नंबर नहीं है, लेकिन वे कमजोर भी नहीं हुए हैं। भविष्य में गहलोत के लिए संकट बनेंगे। गहलोत विधायकों की संख्या अपने पक्ष में होने से पायलट खेमे को तवज्जो नहीं दे रहे।

पायलट-गहलोत गुट की लड़ाई खुलकर सामने आई
राजस्थान कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट खेमों की लड़ाई एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। पायलट और गहलोत खेमों में रोज शह और मात का खेल चल रहा है। हालात उतने ही गंभीर बताए जा रहे हैं जितने पिछले साल बगावत से पहले थे, लेकिन इस बार चीजें बदली हुई हैं। पायलट खेमा सरकार पर बयानों से हमलावर है और इस कैंप के विधायक कांग्रेस में ही रहकर अपने हक के संघर्ष की बात सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं। दोनों खेमे एक दूसरे को नीचा दिखाने और छकाने की कवायद में लग गए हैं।

पिछले साल अगस्त में बगावत के बाद सुलह हो जाने के बाद प्रियंका गांधी, केसी वेणुगाेपाल, दिवंगत अहमद पटेल के साथ सचिन पायलट और उनके समर्थक
पिछले साल अगस्त में बगावत के बाद सुलह हो जाने के बाद प्रियंका गांधी, केसी वेणुगाेपाल, दिवंगत अहमद पटेल के साथ सचिन पायलट और उनके समर्थक

पिछली बार प्रियंका ने सुनी, इस बार पायलट से मुलाकात नहीं हुई
पिछली बार बगावत से सुलह के वक्त प्रियंका गांधी ने अहम भूमिका निभाई थी। सचिन पायलट और उनके विधायक पंजाब की तर्ज पर उनके मुद्दों को सुने जाने की मांग उठा रहे हैं, पायलट पूरे पांच दिन दिल्ली रहकर आ गए लेकिन, प्रियंका गांधी सहित गांधी परिवार के किसी नेता से उनकी मुलाकात नहीं हुई। अब वापस कांग्रेस की सियासी उठापटक का केंद्र जयपुर ही बन गया है। पायलट गुट हमलावर है, लेकिन फिलहाल नंबर गेम मतलब विधायकों का वह मैजिक नंबर जो सरकार गिरा दे या बना दे वह अशोक गहलोत के पास है। कांग्रेस के कई नेता मध्यस्थता करके ताजा विवाद को निपटाने की कवायद में लगे हैं, उनमें MP के पूर्व CM कमलनाथ का नाम प्रमुख है।

पायलट खेमे के जुबानी हमलों से गहलोत से लेकर हाईकमान तक चुप
सचिन पायलट खेमे ने पिछले एक सप्ताह से ज्यादा समय से गहलोत सरकार के खिलाफ मोर्चा खेल रखा है। जनता में नरेटिव इस तरह का बन गया जैसे कांग्रेस में बहुत बड़ी हलचल मची हो, लेकिन यह हलचल बयानों तक सीमित है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पायलट खेमे को तवज्जो तक नहीं दी, उल्टे यह विवाद सामने आने के बाद एक-दो महीने किसी से फेस-टू-फेस मुलाकात से ही इनकार कर दिया, वजह बताई पोस्ट कोविड दिक्कत के बाद डॉक्टरों की सलाह ।

क्यों रिस्क नहीं ले सकते पायलट, क्या बदल गया ?

  • पिछले साल जब सचिन पायलट खेमे ने बगावत की उस वक्त मुट्ठी बंद थी। पायलट के पास कितने विधायकों का समर्थन है यह बगावत से पहले किसी को पता नहीं था। जुलाई में पायलट खेमे की बगावत के वक्त उनके साथ 18 कांग्रेस विधायक ही अंत तक टिके। हालांकि, 3 निर्दलीय विधायक भी उनके साथ थे, 3 कांग्रेस विधायक पायलट कैंप छोड़कर वापस गहलोत कैंप में आ गए थे।
  • पिछली बगावत के बाद गहलोत को पायलट की रणनीति और कट्टर समर्थक विधायकों का पता लग गया। पायलट के पास ​उतने विधायकों का समर्थन नहीं है कि वे सरकार गिरा दें।
कृषि कानूनों के खिलाफ भरतपुर के बयाना में इसी साल फरवरी में सभा को संबोधित करते सचिन पायलट।
कृषि कानूनों के खिलाफ भरतपुर के बयाना में इसी साल फरवरी में सभा को संबोधित करते सचिन पायलट।

गहलोत ने पायलट के विधायक तोड़ लिए, पिछले साल से कई चीजें बदलीं
सचिन पायलट खेमे के विधायकों में सीएम गहलोत ने सेंध लगा दी है। पायलट के साथ बाड़ेबंदी में गए भंवरलाल शर्मा, पूर्व मंत्री विश्ववेंद्र सिंह, पीआर मीणा अब गहलोत की तारीफ कर रहे हैं। इन तीनों को अब पायलट खेमे में नहीं माना जा रहा। सचिन पायलट कैंप में गहलोत की सेंध की वजह से पायलट को चुनौतियों में डाल दिया है।

पिछली बगावत से पायलट को मिला सियासी सबक, आंख मूंदकर अब किसी पर भरोसा नहीं
सचिन पायलट को पिछली बगावत के वक्त 40 से ज्यादा विधायकों के साथ का भरोसा था, लेकिन जब साथ चलने की बारी आई तो संख्या 18 पर सिमट गई। पायलट के कोटे से मंत्री बनने वालों में से दो ही साथ गए, उनके कोटे से मंत्री बने 4 नेता उनके साथ नहीं गए थे। इस बार भी पायलट कैंप के विधायकों में गहलोत ने सेंध लगाई है। पायलट अब अपने कुछ विधायकों को छोड़ आंख मूंदकर विश्वास नहीं कर सकते।

10 जुलाई को दिल्ली जाने से पहले जयुपर के सांगानेर में डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ कांग्रेस के प्रदर्शन में पायलट
10 जुलाई को दिल्ली जाने से पहले जयुपर के सांगानेर में डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के खिलाफ कांग्रेस के प्रदर्शन में पायलट

गहलोत से असंतुष्ट विधायकों पर भी पायलट की नजर, लेकिन उसके लिए अभी इंतजार
पायलट खेमा अब मंत्रिमंडल विस्तार और बड़ी राजनीतिक नियुक्तियों के इंतजार में है। पायलट कैंप को लगता है कि जिन विधायकों का नंबर मंत्री बनने और राजनीतिक नियुक्तियों में नहीं आएगा, वे बाद में उनके साथ आ सकते हैं।

नंबर गेम गहलोत के पास इसलिए सरकार पर संकट नहीं
विधानसभा की 200 सीट में से बहुमत के लिए 101 सीट चाहिए। कांग्रेस के पास बसपा से कांग्रेस में आने वाले 6 विधायकों को मिलाकर खुद के 106 MLA हैं, एक RLD कोटे से मंत्री है। 13 निर्दलीय भी सरकार के समर्थन में हैं, दो CPM विधायक भी सरकार के साथ हैं। BTP के दो और हनुमान बेनीवाल की पार्टी RLP के तीन विधायक अभी न्यूट्रल हैं। दो सीट खाली हैं। कांग्रेस के पास आज 122 विधायकों का समर्थन है, पिछली बार जितना आंकड़ा भी पायलट का मान लें तो भी 19 विधायक कम करके भी गहलोत के पास 103 विधायक रहते हैं, इसलिए सरकार पर खतरा फिर भी नहीं है। जितने विधायक पायलट के साथ थे उनमें से आज दिन कमी हो गई है। उनमें से तीन विधायकों की निष्ठा अब गहलोत के साथ है। गहलोत भाजपा खेमे में भी सेंध लगा सकते हैंं।

सिंधिया बनने के लिए पायलट को चाहिए 30 विधायक, लेकिन बीजेपी का एक खेमा गहलोत को सपोर्ट कर सकता है
सचिन पायलट को MP में ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह सरकार गिराने के लिए कम से कम 30 विधायकों का समर्थन चाहिए, वह संख्या अभी नहीं है। मौजूदा हालात में भाजपा का एक खेमा भी नहीं चाहता कि सरकार गिरे इसलिए भाजपा के कुछ विधायक रणनीतिक तौर से वो​टिंग से गैर हाजिर रहकर गहलोत सरकार की मदद कर सकते हैं। गहलाेत ने पिछली बार इसकी भी तैयारी कर रखी थी। पायलट से जब सुलह हुई थी तब 13 अगस्त 2021 को गहलोत ने कहा था- बहुमत तो हम 19 विधायकों के बिना भी साबित कर देते, लेकिन अपने तो अपने होते हैं उसमें वह बात नहीं होती।

आगे क्या होगा ? इस संघर्ष का सीजफायर नहीं
राजस्थान में पायलट और गहलोत खेमे की खींचतान जारी रहने के पूरे आसार है। गहलोत दबाव में मंत्रिमंडल विस्तार करने का मैसेज नहीं देना चाहते इसलिए डिले टेक्टिक्स के तहत इसे लंबा ​खींचकर पायलट खेमे को छकाने की रणनीति अपनाई जाएगी। पायलट खेमा बयानों से लगातार दबाव की रणनीति अपनाएगा।मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियां होने के बाद गहलोत गुट के कुछ नाराज विधायक पायलट के साथ जा सकते हैं। आगे चलकर गहलोत और पायलट एक दूसरे खेमे में सेंध लगाने का प्रयास जारी रखेंगे, लेकिन इतना तय है कि इस संघर्ष का सीज फायर तभी होगा जब एक नेता राजस्थान से बाहर जाएगा, अन्यथा इस सियासी संघर्ष का सीजफायर नहीं होगा।

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