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समस्या:पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन किसानों काे खेतों में रास्ते नहीं मिले, जिले में अब भी 377 मामले पेंडिंग, ग्रामीणों को राह दिलाएगा प्रशासन गांवों के संग अभियान!

जयपुर15 दिन पहलेलेखक: शिव प्रकाश शर्मा
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जिन किसानों के खेत मुख्य रास्तों से जुड़े नहीं हैं उन किसानों काे रास्तों के कारण अपने खेतों तक पहुंचने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। - Dainik Bhaskar
जिन किसानों के खेत मुख्य रास्तों से जुड़े नहीं हैं उन किसानों काे रास्तों के कारण अपने खेतों तक पहुंचने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

किसान का सबसे बड़ा दुख उसके खेत पर रास्ते का नहीं हाेना है। जिन किसानों के खेत मुख्य रास्तों से जुड़े नहीं हैं उन किसानों काे रास्तों के कारण अपने खेतों तक पहुंचने के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। किसानों काे दूसरे की जमीन में हाेकर या पगडंडीनुमा रास्ते से अपने खेत में पहुंचना हाेता है। बिजाई, पशुपालन से लेकर तैयार फसल काे खेत से लेकर आना मुश्किल हाेता है। खेतों तक सिंचाई के साधन भी नहीं पहुंचाए जा सकते। इतना ही नहीं रास्तों काे लेकर कई खूनी संघर्ष भी हुए हैं।

पड़ोसी खातेदारों में आपसी मन-मुटाव हाेने से पारिवारिक माहौल खराब हाेता है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में खेतों में रास्तों के विवाद के 8 हजार से अधिक मामले उपखंड स्तर पर विचाराधीन हैं। राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 में पहला 1988 और दूसरा 2012 में नई धारा 251-ए में संशोधन के 9 साल बाद भी खेतों में रास्तों के विवादों काे लेकर बदलाव नहीं हुआ। पीड़ित लाेगाें का कहना है कि प्रशासन गरीबों की सुनवाई नहीं करता। सक्षम लाेग एसडीएम के फैसलों काे नहीं मानते। प्रशासन ऐसे लाेगाें से कानून की पालना नहीं करवा पाता। अब किसानों काे प्रशासन गांवों के संग अभियान में रास्तों के मामलों का निस्तारण करने की उम्मीद है।

एसडीएम काे तीन माह में निस्तारण करना हाेता है
राजस्थान काश्तकारी अधिनियम 1955 में नई धारा 251-ए जाेड़ी गई है। इसके तहत एसडीएम के पास खेत में रास्ते का मामला विचाराधीन आने के 3 माह में इसका निस्तारण करना हाेता है। इस संशोधन काे राष्ट्रपति ने भी मंजूरी दी है। रास्तों का मौके पर ही निस्तारण करने के लिए भू-अभिलेख निरीक्षकों काे जीपीएस उपकरण भी उपलब्ध करवाए हैं। इसके बाद भी किसानों काे राहत नहीं मिली। सैकड़ों किसान परिवार अब भी एसडीएम काेर्ट व थानों के चक्कर लगाने काे मजबूर हैं। धारा 251-ए की समयबद्ध सुनवाई नहीं हाेने के तरीके से यह सार्थक नहीं हाे पाई।

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