पहली महिला कोविड नोडल इंचार्ज डॉ. शालिनी राठौड़ का इंटरव्यू:कोविड वार्ड में 300 डिलीवरी करवाईं; समय से पहले प्रसव को राजी किया, ताकि जच्चा-बच्चा बच सकें

जयपुर16 दिन पहले
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डॉ. शालिनी राठौड़, पहली महिला कोविड नोडल इंचार्ज। - Dainik Bhaskar
डॉ. शालिनी राठौड़, पहली महिला कोविड नोडल इंचार्ज।

कोरोना जब भयावह था, गर्भवती और प्रसूताओं की जान बचाना बड़ी चुनौती थी, नोडल अफसर बनकर डॉ. शालिनी राठौड़ ने इसकी कमान हाथ में ली.....

महामारी के बीच कोविड वार्ड की इंचार्ज बनीं, शुरुआती दौर कैसा रहा?
मार्च 2020 में महिला अस्पताल, जयपुर में कोविड वार्ड की प्रभारी बनी। 24 घंटे काम करना था। घर जाकर खाना भी मुझे ही बनाना होता था लेकिन कई बार रात 12 बजे बाद घर पहुंच पाती थी। मेरी हालत देखकर कोई शिकायत नहीं करता। मैं जो भी, जैसा भी बनाकर देती, सब खा लेते थे। यह मोरल सपोर्ट था।

संक्रमण के बीच गर्भवती-प्रसूताओं के साथ सबसे बड़ी चुनौती क्या आई?
रह-रहकर तकरार और हंगामे होते थे। कई मरीजों के परिजन गार्ड या स्टाफ से उलझ पड़ते। उन्हें समझाकर शान्त करते। फिर भी कई बार पुलिस बुलाने की नौबत आती। एक बार तो एक पेशेंट अड़ गई कि घर जाना है। मुश्किल से समझा-बुझाकर रोका, वरना उसकी जान तक जा सकती थी।

ऐसी घटना, जब विचलित हो उठी हों?

मुझे याद है, एक संक्रमित गर्भवती को घर से निकाल दिया गया। वह रातभर जलमहल की पाल पर अकेली घूमती रही। रात 2 बजे सीएमएचओ की टीम ने देखा तो मुझे कॉल किया। दो साल में ऐसी अनेक महिलाओं व परिजन की काउंसलिंग की। दूसरी लहर में कई पॉजिटिव मरीजों को परिजन छोड़ गए थे। कई परिजन डेड बॉडी ही नहीं ले गए।

गर्भवती में संक्रमित कितनी थीं, उन्हें बचाने में बड़ी बाधा क्या थी?

कोविड के दौर में भर्ती हुईं 1200 से ज्यादा महिलाओं में पहली वेव में 800 और दूसरी में 400 से ज्यादा गर्भवती या प्रसूताओं की रिपोर्ट पॉजिटिव आईं। कोविड वार्ड में 300 डिलीवरी हुईं। सैकेंड वेव में कई डिलीवरी समय से पहले करानी पड़ी। फेफड़े कमजोर होने, ऑक्सीजन घटने से कई बार स्थिति ऐसी बनी कि एक को बचा पाते। तब काउंसलिंग करना भी चैलेंजिंग था।

खुद का हॉस्पिटल था तो उसे छोड़कर सरकारी सेवा में कैसे आ गईं?
कुछ साल पहले सड़क हादसे में छोटे भाई की मृत्यु हो गई थी। तब खुद का हॉस्पिटल था। वहां की जिम्मेदारियों के कारण परिवार को समय देना मुश्किल होने लगा था जबकि परिवार को मेरी जरूरत थी। भाई के देहांत से एक दिन पहले मैंने किसी के कहने पर यूं ही सरकारी नौकरी के लिए अप्लाय किया था। रिजल्ट आया तो मेरा सलेक्शन हो गया था।

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