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थैलेसीमिया मरीजों की ‘जान’ से खिलवाड़:एसएमएस में 3 माह से नहीं मिल रहा ‘केल्फर-500’ कैप्सूल, आयरन बढ़ने से किडनी, लिवर और हार्ट फेल्योर का खतरा

जयपुर3 महीने पहलेलेखक: सुरेन्द्र स्वामी/नरेश वशिष्ठ
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एसएमएस जयपुर, अजमेर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर समेत कोटा मेडिकल कॉलेज में थैलेसीमिया बीमारी से जूझ रहे मरीज ‘केल्फर-500’ नामक दवा के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। - Dainik Bhaskar
एसएमएस जयपुर, अजमेर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर समेत कोटा मेडिकल कॉलेज में थैलेसीमिया बीमारी से जूझ रहे मरीज ‘केल्फर-500’ नामक दवा के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं।

एक तरफ सरकार ब्लड की कमी से होने वाली बीमारियों थैलेसीमिया, हिमोफीलिया और सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित मरीजों को इलाज की निशुल्क सुविधा देने का दावे कर रही है, वहीं एसएमएस जयपुर, अजमेर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर समेत कोटा मेडिकल कॉलेज में थैलेसीमिया बीमारी से जूझ रहे मरीज ‘केल्फर-500’ नामक दवा के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं।

इसे डेफ्रीप्रोन के नाम से भी जाना जाता है। आयरन की मात्रा बढ़ने पर नियंत्रण करने वाली केल्फर-500 दवा ही जीवन बचाने का सहारा है। दवा समय पर नहीं लेने पर शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ने पर हर समय मरीज को जान को खतरा रहता है। इधर, आरएमएससीएल के अधिकारियों का कहना है कि मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पताल लोकल स्तर पर खरीद कर मरीजों को उपलब्ध करा सकते हैं।

आयरन की मात्रा को कम करती है
डॉक्टरों के अनुसार जीवनरक्षक दवा को आयरन चिलेटिंग के नाम से भी जानते हैं। यह शरीर में आयरन की मात्रा को कम करती है। थैलेसीमिया मरीजों को खून चढ़ाने के बाद उनके शरीर में आयरन की मात्रा अधिक हो जाती है। जिससे किडनी, लिवर और हार्ट जाम होने से फेल्योर होने की अधिक आशंका रहती है।

एसएमएस में रोज 15 से 20 मरीज

  • 15 से 20 मरीज केल्फर-500 दवा की जरूरत वाले एसएमएस अस्पताल में रोजाना।
  • 1000 के पार हुई प्रदेश भर में थैलेसीमिया बीमारी से पीड़ित मरीजों की।
  • 70 से ज्यादा मरीज अकेले जयपुर में।

मरीजों ने बयां किए अपने दर्द
वैशाली नगर निवासी रजत, मालवीय नगर के राहुल, दिल्ली रोड निवासी मितुल और भूमि का कहना है कि एसएमएस समेत अन्य अस्पतालों में पहले तो दवा नहीं मिलती। फिर खून चढ़ाने के लिए की जाने वाली औपचारिकता के चलते हाथ-पांव फूलने लगते है। रजिस्ट्रेशन से लेकर खून चढ़ाने तक प्राेसीजर में 3 से 4 घंटे लग जाते हैं।

भास्कर एक्सप्लेनर

  • बीमारी से पीड़ित मरीज में लाल रुधिर कणिकाओं की उम्र 120 दिन से घटकर 20 दिन ही रह जाती है। इसका सीधा प्रभाव हिमोग्लोबिन पर पड़ता है और मात्रा कम होने से शरीर में कमजोरी के साथ किसी न किसी बीमारी की गिरफ्त में आ जाता है। समय पर इलाज नहीं मिलने पर मौत का खतरा है।
  • थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चे की जान को बचाने के लिए औसतन तीन सप्ताह में एक बोतल खून देना अनिवार्य है। किसी को ज्यादा की जरूरत पड़ती है।
  • दवा वजन के हिसाब से दी जाती है। अगर 50 से 75 किलो वजन है, तो रोजाना दस कैप्सूल लेने पड़ते हैं। बाजार में 50 कैप्सूल का पैकेट करीबन 500 रुपए का आता है।

‘केल्फर-500’ नामक दवा के उपलब्ध नहीं होने की शिकायत नहीं मिली है। अगर नहीं मिल रही है तो थैलेसीमिया मरीजों को उपलब्ध कराई जाएगी। -डॉ. विनय मल्होत्रा, अधीक्षक, एसएमएस अस्पताल

थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों में खून चढ़ने से आयरन की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे शरीर को अन्य बीमारियों का खतरा है। एसएमएस समेत अन्य अस्पतालों में आयरन की मात्रा नियंत्रण करने वाली केल्फर-500 नामक कैप्सूल उपलब्ध नहीं है। सरकार को भी पत्र लिखा जा चुका है। -नरेश भाटिया, अध्यक्ष, थैलेसीमिया चिल्ड्रन सोसायटी

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