जायकाकान्हा को मक्खन खिलाने के लिए छोड़ा सोने-चांदी का बिजनेस:फ्लेवर्ड बटर के दीवाने जयपुर के 'ठाकुर जी' भी, बड़े-बडे़ शेफ आते हैं सीखने

जयपुर2 महीने पहलेलेखक: छवि टाक

कान्हा का बर्थडे हो और माखन की बात न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। ये एक मात्र जायका है जो 4000 साल से भी पुराना है। द्वापर युग में भी था और कलयुग में भी मिल रहा है। तो राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आज बात ऐसे स्पेशल मक्खन की, जिसके दीवाने खुद जयपुर के आराध्य देव गोविंद देव जी हैं।

सुबह और शाम दोनों वक्त ठाकुर जी के भक्त इसी स्पेशल मक्खन से उन्हें भोग लगाते हैं। दो फ्लेवर में मिलने वाले बटर का स्वाद इतना लाजवाब है कि जयपुर की पूर्व रॉयल फैमिली भी इसे बड़े चाव से खाती है। तो चलिए आपको भी बताते हैं इस बेहतरीन स्वाद के बनने की पूरी कहानी....

जयपुर के चौड़ा रास्ता पर शॉप नंबर-280, जिसका नाम है जीसी डेयरी। गोविंद देव जी मंदिर में जैसे ही मंगला आरती और राजभोग झांकी का वक्त होता है, भक्त मक्खन लेने के लिए इस छोटी सी दुकान पर उमड़ पड़ते हैं।

यह पहली शॉप है, जहां दो फ्लेवर में बटर मिलता है। एक सादा व्हाइट बटर और दूसरा केसर-पिस्ता बटर। इस बटर की सबसे खास बात ये है कि इसे मशीन से नहीं बल्कि हाथ से चलने वाले बिलौने की पुरानी तकनीक से ही बनाया जाता है। दूध में जामन लगाने से लेकर मथने तक का सारा काम हाथों से होता है।

करीब 10 घंटे की प्रोसेस और 2 घंटे मथने की मेहनत के बाद मक्खन तैयार होता है। सादा मक्खन तैयार होने के बाद इसमें केसर और मिश्री एड कर नया केसर-पिस्ता फ्लेवर तैयार किया जाता है। डेयरी संचालक ओम शर्मा की मानें तो पूरे जयपुर ही नहीं राजस्थान में भी मक्खन का ऐसा फ्लेवर कहीं नहीं मिलेगा।

इस मक्खन को परोसने का तरीका भी सबसे अनूठा है। सखुआ के सूखे पत्तों पर रखकर ही ग्राहक को परोसा जाता है। मक्खन को फ्रीजिंग कर ऐसी शेप दी जाती है, जो दिखने में कोई बंगाली मिठाई जैसी लगती है।

डेयरी खोलने की कहानी भी अनोखी
ओम बताते हैं कि जीसी डेयरी का नाम उनके दादा गुलाब चंद से पड़ा, जो कभी सोने-चांदी का व्यापार करते थे। सोने को तराशने वाले गुलाब चंद के हाथों में बिलौने वाला मक्खन बनाने का भी हुनर था। गोल्ड का बिजनेस अच्छा चल रहा था, लेकिन आस-पास कहीं भी भगवान को भोग लगाने के लिए बिलौने का मक्खन नहीं मिलता था।

तब 1963 में उनके दादा गुलाब चंद ने डेयरी बिजनेस की शुरुआत की। घर पर ही देसी नस्ल की गायों के दूध से मक्खन तैयार करना शुरू किया। शुरुआत भगवान को भोग लगाने से हुई, लेकिन धीरे-धीरे ये जयपुराइट्स के लाइफस्टाइल का हिस्सा बन गया।

आज भी शाही रसोई का हिस्सा ये मक्खन
गुलाब चंद के बनाए मक्खन का स्वाद ऐसा था कि पूर्व राजघराने के दिवंगत राजा मानसिंह (द्वितीय) भी इसके दीवाने थे। फिर ऐसी परंपरा बनी कि उनकी दुकान से मक्खन सिटी पैलेस जाने लगा और शाही रसोई में शामिल हो गया।

आज भी जीसी डेयरी का मक्खन जयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य दीया कुमारी और उनके बेटे पद्मनाभ सिंह के लिए जाता है। मान सिंह तो कई बार रास्ते से निकलते हुए दुकान के पास रुक जाते थे और कार में बैठकर ही मक्खन का आनंद लेते थे।

गांव से ही मंगवाते हैं दूध
ओम शर्मा बताते हैं कि मक्खन के स्वाद के पीछे दूध की क्वालिटी और मथने की सीक्रेट रेसिपी है। दूध भी चौमूं के पास एक गांव हरनाथपुरा से वेंडर के जरिए आता है। वे बताते हैं कि उनके दादा गुलाब चंद उस दौर में भी यहीं से दूध मंगवाते थे, क्योंकि शुरू से भरोसा बना हुआ है।

इको फ्रेंडली प्रोसेस
इस मक्खन को तैयार करने की पूरी प्रोसेस इको फ्रेंडली है। दही जमाने के लिए मिट्टी का बर्तन यूज किया जाता है। वहीं हाथ से मक्खन तैयार किया जाता है और फिर सूखे पत्तों पर ही परोसा जाता है।

आज डेयरी के ये प्रोडक्ट बेच रहे
डेयरी पर शुरुआत में केवल सफेद मक्खन और छाछ बेचा जाता था, लेकिन आज केसर पिस्ता बटर, व्हाइट बटर, बटर सैंडविच, छाछ, लस्सी, श्रीखंड, फ्रूट क्रीम, रबड़ी भी सर्व की जाती है। मक्खन ऐसा प्रोडक्ट है, जिसे फ्रेश ही खाया जाता है, लेकिन बेहतरीन स्वाद का आनंद लेने के लिए फ्रिज में 2 या 3 दिन के लिए स्टोर कर सकते हैं। हालांकि इससे घी भी तैयार कर सकते हैं।

ओम शर्मा बताते हैं कि कई बार ग्राहकों की लाइन लगी रहती है और एक ही व्यक्ति पूरा मक्खन ले जाता है और बाकी लोगों के हाथ कुछ नहीं लगता।

कान्हा के बर्थ-डे सेलिब्रेशन की भी पूरी तैयारी
ओम शर्मा बताते हैं कि उनकी दुकान की एक ब्रांच गोविंद देव जी मंदिर के बाहर भी है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को देखते हुए स्पेशल मिट्टी की मटकियों में मक्खन तैयार किए गए हैं। इन दिनों सेल 200 गुना तक बढ़ जाती है। भक्त गोविंद देव जी को भोग लगाने के लिए शुद्ध मक्खन यहीं से खरीदते हैं।

सालाना कारोबार लाखों में
ओम शर्मा बताते हैं कि मक्खन का एक पीस करीब 30 से 40 ग्राम का होता है। इसका प्राइस 20 रुपए है। वहीं केसर-पिस्ता बटर 30 रुपए में बेचते हैं। वैसे सफेद मक्खन 500 रुपए किलो में बेचते हैं। आम दिनों में 10 से 15 किलो डेली की सेल होती है, लेकिन कृष्ण जन्माष्टमी पर 200 किलो से भी ज्यादा बटर बिक जाता है। एक अनुमान के मुताबिक उनका सालाना टर्नओवर 30 लाख रुपए के करीब है।

मक्खन से जुड़ी खास बातें
भारत मे 4000 से भी अधिक वर्षों से मक्खन नवनीत भोजन का अंग है। त्रेता युग से लेकर द्वापर युग में भी इसका वर्णन मिलता है। द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण का माखन प्रेम किसी से छिपा नहीं है। आइए जानते हैं मक्खन से जुड़ी कुछ रोचक बातें....

  • पौराणिक कथाओं के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने हलाहल (विष) की एक बूंद पी थी, तब इसका जहर उतारने के लिए उन्होंने माखन चखा था।
  • आयुर्वेद अनुसार जो ताजा नितारा हुआ है, वो नवनीत है, इसे नवघृत भी कहते हैं।
  • अलग-अलग धर्मों में मक्खन का बखान मिल जाता है। बौद्ध से लेकर बाइबल तक में मक्खन की बात कही गई है।
  • बाइबल में मक्खन को गॉड का खाना बताया गया है।
  • तिब्बत में आज भी मार्च के महीने में 'बटर फेस्टिवल' मनाया जाता है।

राजस्थानी जायका के बाकी ऐपिसोड यहां देखें:-

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