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चिंताजनक:लॉकडाउन: 400 जोड़ों में तलाक, 40% केसों में शादियां सिर्फ 1 से 3 साल पुरानी

जयपुर8 महीने पहलेलेखक: संजीव शर्मा
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  • जून 2020 से दिसंबर तक 500 मामले दायर, अब तक 8150 केस लंबित

कोरोनाकाल के दस महीने में पति-पत्नी सहित अन्य परिवारजनों को एक साथ रहने का मौका मिला। लेकिन जून 2020 से दिसंबर 2020 तक 500 दंपत्तियों ने फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए अर्जियां दायर कीं। फैमिली कोर्ट ने भी अत्यधिक जरूरी प्रकृति का मानते हुए पूर्व के लंबित व नए केस सहित 400 में तलाक दिलाया।

इन केसों में 40 फीसदी केस ऐसे हैं जिनमें शादी को केवल एक से तीन साल ही हुए थे। इसके अलावा कई केस ऐसे थे जिनमें शादी को तो दस-बारह साल हो गए थे, लेकिन पति-पत्नी पिछले पांछ-छह सालों से एक दूसरे से अलग रह रहे थे।

ऐसे में उन्होंने बाकी जिंदगी एक-दूसरे से अलग रहने का फैसला करते हुए कोर्ट में पारस्परिक सहमति से तलाक की अर्जी दायर की थी। फिलहाल शहर की फैमिली कोर्ट में तलाक व भरण पोषण, बच्चों की अभिरक्षा सहित हिन्दू विवाह अधिनियम के 8150 केस लंबित हैं।

कुछ पति-पत्नी सालों से अलग रह रहे थे...तो कुछ का साथ चंद महीनों का ही रहा

केस 1 : प्रेमविवाह किया पर नहीं चली जोड़ी
एक जोड़ी ने 2013 में अंतरजातीय प्रेम विवाह किया। विवाह को दोनों परिवारों की रजामंदी नहीं थी। बाद में प्रेमी जोड़ों में भी विवाद हो गया। दोनों ने पारस्परिक सहमति से तलाक लेने के लिए कोर्ट में अर्जी लगाई। जिस पर कोर्ट ने दोनों को तलाक दे दिया।
केस 2 : छह साल बाद एक-दूसरे से हुए जुदा
2008 में शादी करने वाला जोड़ा 2014 तक साथ में रहा।। पत्नी ने 2015 में फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दायर की। कोर्ट ने दोनों की पारस्परिक सहमति से लॉक डाउन के दौरान दोनों को तलाक की डिक्री दे दी।

केस 3 : एक साल ही रह पाए एक साथ
एक अन्य मामले में 2012 में शादी करने वाला जोड़ा केवल एक साल ही साथ रहा। इसके बाद ही दोनों एक-दूसरे से अलग रहने लग गए। 2015 में उन्होंने तलाक लेने के लिए कोर्ट में केस किया। कोर्ट ने दोनों को तलाक नहीं लेने की समझाइश की। लेकिन वे नहीं माने और अंत में कोर्ट ने इस केस में भी पारस्परिक सहमति से तलाक की डिक्री मंजूर की।

सहनशीलता की कमी ने बढ़ाए तलाक के मुकदमे
फैमिली कोर्ट के पूर्व जज हरविन्दर सिंह का कहना है इसकी मुख्य वजह करियरओरिएंटेड होना व सहनशीलता की कमी है। महिला-पुरूषों का महत्वाकांक्षी होना व मतभेद से भी तलाक में बढोतरी हुई है। कानूनविद डॉ.सीपी गुप्ता का कहना है संयुक्त परिवारों का टूटना भी वजह है। पारिवारिक संतुलन नहीं होता जिससे वैवाहिक जिंदगी प्रभावित होती है।

केस बढ़े, लेकिन फैमिली कोर्ट में सुविधाएं नहीं
पारिवारिक न्यायालय बार एसो. के अध्यक्ष डीएस शेखावत व महासचिव विष्णु शर्मा का कहना है फैमिली कोर्ट की संख्या तीन से बढ़कर पांच हो गई है पर आधारभूत सुविधाएं नहीं बढ़ी है। महिलाओं और उनके साथ आने वाले बच्चों के लिए न तो बैठने की जगह है और न कोई अन्य सुविधाएं हैं।