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जयपुर में पतंगबाजी का सफर:महाराजा रामसिंह ने 150 साल पहले कपड़े की बनी तुक्कल से शुरू की थी पतंगबाजी, तब कटने पर घुड़सवार दौड़ाए जाते थे

जयपुर13 दिन पहलेलेखक: विष्णु शर्मा
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लखनऊ से तुक्कल पतंग लाकर जयपुर में पतंगबाजी शुरू करने वाले महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय (फाइल फोटो) और यहां म्यूजियम में रखी उनकी चरखियां। - Dainik Bhaskar
लखनऊ से तुक्कल पतंग लाकर जयपुर में पतंगबाजी शुरू करने वाले महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय (फाइल फोटो) और यहां म्यूजियम में रखी उनकी चरखियां।
  • महाराजा रामसिंह द्वितीय ने जयपुर में बनाया था पतंगबाजी का कारखाना, बाहर से आते थे कलाकार
  • शहर में जलमहल और लालडूंगरी पर हुआ करते थे दंगल, शाम को सुनाया जाता था वार्षिक पंचांग

जयपुर में पतंगबाजी का हर कोई दीवाना है। मकर संक्राति की अल सुबह छतों से शुरू हुआ "वो मारा वो काटा" का शोर देर शाम तक चलता है। हर घर की छतों पर एक तरफ फीणी और पकौड़ी का स्वाद तो दूसरी तरफ लोग आसमान में पेंच लड़ते नजर आते हैं। सिर्फ देसी ही नहीं विदेशी सैलानी भी मकर संक्रान्ति पर होने वाली पतंगबाजी को देखने जयपुर आते हैं। इसका कारण भी है। क्योंकि, जयपुर की पतंगबाजी करीब 150 साल पुरानी है। इतिहासकारों की मानें तो गुलाबी नगरी पतंगबाजी का कनेक्शन उत्तरप्रदेश के लखनऊ शहर से जुड़ा हुआ है।

जयपुर के सिटी पैलेस में महाराजा रामसिंह की डेढ़ सौ साल पुरानी तुक्कल पतंग और चरखियां।
जयपुर के सिटी पैलेस में महाराजा रामसिंह की डेढ़ सौ साल पुरानी तुक्कल पतंग और चरखियां।

पतंगबाजी की शुरुआत का श्रेय जयपुर राजपरिवार के तब के महाराजा सवाई जयसिंह तृतीय के पुत्र महाराजा रामसिंह द्वितीय (1835-1880 ईस्वी) को जाता है। जिन्होंने लखनऊ से जयपुर लेकर आई तुक्कल से पतंगबाजी का सफर शुरू किया था। तब यह पतंग कपड़े से विशेष तरीके से बनाई जाती थी। आज भी महाराजा रामसिंह द्वितीय के पतंग और चरखियां जयपुर के सिटी पैलेस म्यूजियम में सुरक्षित रखे हैं, जो कि मकर संक्रान्ति पर यहां आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं।

पढ़िए...राजस्थान में पतंगबाजी के दौरान हादसे, कोटा में पतंग लूटते समय बच्चे की मौत

मकर संक्रान्ति पर जयपुर आने वाले विदेशी सैलानियों का आकर्षण का केंद्र रहती है डेढ़ सौ साल पुरानी पतंग और चरखियां।
मकर संक्रान्ति पर जयपुर आने वाले विदेशी सैलानियों का आकर्षण का केंद्र रहती है डेढ़ सौ साल पुरानी पतंग और चरखियां।

तुक्कल कटने या टूटने पर वापस लाने के लिए घुड़सवार दौड़ाए जाते थे

सिटी पैलेस के क्यूरेटर रामकृष्ण शर्मा के मुताबिक, सवाई रामसिंह द्वितीय को पतंगबाजी इतनी भायी कि उन्होंने जयपुर रियासत में 36 कारखानों में एक और कारखाना पतंगखाना जोड़ दिया था। जहां तितली के आकार की विशाल पतंगे तुक्कलों का निर्माण होता था। लखनऊ से कुछ पतंग बनाने वाले और डोर सूतने वाले महाराजा रामसिंह के जमाने से बराबर यहां आते रहते थे।

जब महाराजा रामसिंह द्वितीय पतंगबाजी करते वक्त तुक्कल उड़ाया करते थे। तब तुक्कल कटने या टूटने पर दूर तक चली जाती थी। इसको वापस लाने के लिए पहले से तैयार घुड़सवारों को दौड़ाया जाता था। तब विशाल चरखियां और आदमकद के तुक्कल उड़ाए जाते थे। महाराजा रामसिंह ने पतंगबाजों और पतंगकारों को अपने राज में आश्रय दिया। तब जयपुर के कई मोहल्लों में पतंग बनाने का काम शुरू हुआ। राजपरिवार अपने महल के सर्वतोभद्र में पतंग महोत्सव शुरू करने लगा। महल में एक कोठरी सिर्फ पतंगों से भरी रहती थी। पतंगबाजी के इस शौक को महाराजा माधोसिंह द्वितीय ने भी जारी रखा।

सिटी पैलेस में महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय की चरखियां।
सिटी पैलेस में महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय की चरखियां।

आजादी के पहले जलमहल और लालडूंगरी में होते थे पतंगबाजी के दंगल

आजादी के पहले जयपुर में आमेर रोड पर जलमहल और लालडूंगरी के मैदान में पतंगबाजी के दंगल होते थे। जहां कई राज्यों से पतंगबाज आया करते थे। मजीद खान, कन्हैयालाल सहित कई लोगों ने इन दंगलों में अहम भूमिका निभाई। वहीं शौकत हुसैन पतंगबाजी में एंपायरिंग किया करते थे। महाकवि बिहारी और सवाई जयसिंह के कवित बखतराम ने भी आमेर में पतंग उड़ाने का वर्णन किया है।

मकर संक्रान्ति पर दिनभर पतंगबाजी के बाद शाम को सुनाया जाता था जयपुर का भविष्य

इतिहासकार बताते हैं कि मकर संक्रान्ति को दिनभर पतंगबाजी और दानपुण्य के बाद शाम को शहर के चांदपोल में जयपुर के वार्षिक ज्योतिष फल की घोषणा की जाती थी। यहां गोविंदराव जी के रास्ते के नुक्कड़ पर भविष्य फल बताने वाले ज्योतिषी जुटा करते थे। यह परंपरा सवाई जयसिंह द्वितीय के शासनकाल में शुरू हुई। यहां भविष्य फल सुनने के इच्छुक लोगों का दोपहर से ही जुटना शुरू हो जाया करता था।

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