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  • No One Reached From The Chief Wildlife Warden To Hoff In The Reception Of The Birds. Last Year Too, When The Turn Came To Protect Himself In The High Court, He Went To Take The Report.

लापरवाही:परिंदों की अगवानी में चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन से लेकर हॉफ तक कोई नहीं पहुंचा पिछले साल भी हाईकोर्ट में खुद को बचाने की बारी आई तब रिपोर्ट लेने गए थे

जयपुर8 महीने पहले
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(महेश शर्मा) सांभर झील पर मासूम परिंदों की मौत के तांडव को लेकर जैसी लापरवाही का हाल पिछले साल था, वही फिर बरती जा रही है। लगातार कई दिनों से हो रही मौत के बावजूद अधिकारी पिछले साल झील किनारे तब पहुंचे थे, जबकि उनको दूसरे दिन हाईकोर्ट में ‘खुद के बचाव’ के लिए जवाब पेश करना था।

अब जबकि प्रवासी पक्षी फिर से सिस्टम को माफ करके झील किनारे आने लगे हैं, तो भी वन विभाग के कोई बड़े अधिकारी हाल जानने दफ्तरों से बाहर नहीं निकल पाए हैं। केवल और केवल एक से दूसरे तक निर्देश पास हो रहे हैं। इतनी बड़ी तबाही के बाद शुरू हो रहे दूसरे सीजन से पहले मौके पर डीएफओ से ऊपर के सीसीएफ, एपीसीसीएफ, चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन, प्रधान मुख्य वन संरक्षक आदि कोई अफसर नहीं पहुंचा है।

वन विभाग पहले भी पूरे मामले पर सुस्त नजर आए थे, अभी भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। जिन चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ने कई बैठकों में पक्षियों को बचाने की बातें कही और जिन पीसीसीएफ को कोर्ट के निर्देश पर कमेटियां बनाने के काम मिले उन्होंने परिंदों की सुध के लिए जमीनी स्तर पर हाल देखना उचित नहीं समझा। यही वो लापरवाही है, जिसके चलते प्रदेश के माथे पर सबसे बड़ी पक्षी त्रासदी के दाग लगे।

भास्कर ऑनस्पॉट
लापरवाह सिस्टम, वन विभाग के कमजोर प्रबंधन और लचर अफसरशाही के साथ कमजोर पड़े रेस्क्यू ऑपरेशन को भास्कर ने उजागर किया तो मुख्य सचिव ने जयपुर-नागौर-अजमेर कलेक्टर की जिम्मेदारी तय थी। इनकी ओर से भी अभी तक मौके पर हाल नहीं जाने गए हैं। मुख्यमंत्री के निर्देशों पर गंभीरता नहीं दिखी और दूसरे साल आए परिंदों को बचाने के लिए मौके पर अभी तक काम शुरू नहीं हो पाए।

मेहमान परिंदों के बारे में सोचें; चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन आगे आएं, सांभर झील के हाल जांचना जरूरी
अक्टूबर माह से प्रवासी पक्षियों का खारे पानी की सबसे बड़ी झील में आगमन शुरू हो जाता है। वन विभाग के पास मौके पर एक भी रेस्क्यू सेंटर मौजूद नहीं है। पिछले साल मौत के आंकड़े तेजी से बढ़े और भास्कर ने उनका खुलासा किया तो नर्सरी में अस्थायी सेंटर चलाया गया था, लेकिन व्यवस्थाएं नाकाफी थीं। इससे मौतें बढ़ती गई।

अब रतन तालाब, झपोक डेम पास कम से कम रेस्क्यू सेंटर, डॉक्टर, एंबुलेंस, टीम की जरूरत है। इन हालात को जांचने और झील पर पानी, पक्षियों की स्थिति के लिए चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन को मौके पर पहुंच स्थितियां जांचने की जरूरत है, ताकि पूरे सीजन की पेट्रोलिंग, रेस्क्यू की जिम्मेदारी तय करके स्थितियां सुधारी जा सकें।

चुनावी शोर में गुम रहा परिंदों का दर्द फिर आए परिंदे फिर वही हालात
सांभर झील के 35 स्क्वायर किलोमीटर तटीय क्षेत्र परिंदों की मौत का गवाह बन चुके हैं। इनमें जयपुर डिविजन के 12 स्क्वायर किमी क्षेत्र के साथ ही मुख्य रूप से नागौर में फैली झील का एरिया शामिल है। भास्कर ने उजागर किया था कि पिछले साल लोकल बॉडीज के चुनावी शोर में परिंदों के मौत की आहट अनसुनी हो गई। अबकी बार फिर से चुनावी माहौल शुरू हो गया है। ऐसे में जरूरी है कि कलेक्टर और वन विभाग अभी से हालात जांचे।

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