जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल:प्रसून जोशी ने कहा- लोक संगीत बार-बार सुनने के बावजूद पुराना नहीं पड़ता, यह वह पत्थर है जो बेहद तराशा हुआ है

8 महीने पहले
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2021 के वर्चुअल आयोजन में गीतकार प्रसून जोशी व गायिका विद्या शाह।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का शुक्रवार को वर्चुअल आगाज हुआ। दुनिया के सबसे बड़े और लोकप्रिय साहित्य कुंभ के इस आयोजन के पहले सत्र की शुरुआत जाने-माने गीतकार प्रसून जोशी और शास्त्रीय गायिका विद्या शाह के सेशन की हुई है। शास्त्रीय, लोक और लोकप्रिय संगीत पर आयोजित इस सेशन में लोक संगीत का बखान गूंजता रहा।

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का शुक्रवार को वर्चुअल आगाज हुआ। दुनिया के सबसे बड़े साहित्य कुंभ के इस आयोजन के पहले सत्र की शुरुआत जाने-माने गीतकार प्रसून जोशी और शास्त्रीय गायिका विद्या शाह के सेशन से हुई।

इस दौरान गीत-संगीत की सभी विधाओं में प्रसून जोशी ने लोक संगीत की तुलना एक तराशे हुए पत्थर से की। उन्होंने कहा कि लोक संगीत बार-बार सुनने के बावजूद पुराना नहीं पड़ता है। वह एक पत्थर है जो एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है। ऐसा होना ही उसकी खूबसूरती है।

प्रसून जोशी ने कहा- कई बार कठिन शब्दों पर कुछ लोगों को आपत्ति होती है। असल में मूल भाव में मिलावट से आसान तो बहुत कुछ हो जाता है। लेकिन उसका मूल भाव खत्म हो जाता है। लोक संगीत हो या शास्त्रीय संगीत। सभी के साथ एक ही बात है। कठिन दिखने वाले शब्दों का विलोपन करने से उसकी गहराई और खूबसूरती उससे छिन जाती है। मैंने एक शब्द का प्रयोग किया था- पाठशाला। पहले सोचा कि उसे लोग नहीं समझेंगे, लेकिन मैं खुद से अड़ गया। सोचा यही चलाएंगे। फिर लोग समझने लगे। ऐसे ही लोक संगीत में है। यदि कठिन समझकर हम मिलावट करेंगे तो वह नहीं चलेगा। उसकी लोक भावना नष्ट हो जाएगी।

लोक संगीत हमारी आत्मा है, क्योंकि वह संस्कृति के कण-कण में है प्रसून ने कहा- राग पहाड़ी का जन्म तो कहीं पहाड़ों से ही हुआ है। चाहे उसे लोक संगीत में सुनें या शांस्त्रीय संगीत में। यह कई अलग-अलग रूप में मिलेगा। इन दोनों में अंतर सिर्फ इतना है कि लोक संगीत हाथों-हाथ लिया जाता है। तुरंत मन-मस्तिष्क में घुस जाता है। यह वास्तव में हमारी आत्मा है। यह हमारी संस्कृति के कण-कण में है। जैसे पहाड़ों में है, नदी में है। झरनों में है।

कलाकार का ईगो भी तराशता है लोक संगीत वहीं, इस मौके पर विद्या शाह ने कहा कि लोक संगीत की उपस्थिति हिंदुस्तानी संगीत की दुनिया में रही है। उसमें 200 साल पहले ठुमरी-दादरा गाया जाता था। लोक संगीत इतना तराशा हुआ क्यों है, इसकी वजह यही हो सकती है कि वह हर तबके का संगीत है। इस पर प्रसून ने कहा- इसे भी ठीक से समझने की आवश्यकता है।

जोशी ने कहा- मैं इन दिनों ठुमरी पर काम कर रहा हूं। उसमें भी लोक संगीत का अंश है। इसका एक और रूप था। उसे संस्कृति का रक्षा कवच कह सकते हैं। आज हमारी परंपरा यदि जिंदा रही है तो वह शोख गीतों की वजह से रही हैं। फसल और जमीन के लिए क्या-क्या करना चाहिए, यह आपको गीतों में मिलता है। श्रम गीत- जैसे जोर लगाकर हइशा, बाल गीत, तीज त्योहारों से जुड़े गीत लोक संगीत का हिस्सा थे। वे हमारे जीवन को परिलक्षित करते थे।