पापी पेट का सवाल है...3 मजबूर युवाओं की कहानी:हैंडीक्राफ्ट का काम बंद हुआ तो श्मशान में सजाने लगे चिताएं, लॉकडाउन लगा तो मंदिर और स्कूल की गाड़ी छोड़ कोविड पेशेंट की लाश ढोने लगे

जयपुर6 महीने पहलेलेखक: विष्णु शर्मा
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दौसा में लॉकडाउन से टैक्सी चलाने का काम-धंधा बंद हो गया तो तीन दिन पहले जयपुर पहुंचे बृजमोहन और मोहनलाल अब एंबुलेंस से शवों को मोक्षधाम लाने का काम करने लगे। - Dainik Bhaskar
दौसा में लॉकडाउन से टैक्सी चलाने का काम-धंधा बंद हो गया तो तीन दिन पहले जयपुर पहुंचे बृजमोहन और मोहनलाल अब एंबुलेंस से शवों को मोक्षधाम लाने का काम करने लगे।

कोरोना महामारी ने रोजगार छीना तो रोटी पर संकट आ गया। परिवार पालना मुश्किल हो गया। दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भारी पड़ने लगा। हालात ऐसे बदले कि जिस बीमारी का नाम सुनते ही लोग दूरी बना लेते हैं, उसी बीमारी से मरने वालों के आसपास रहना मजबूरी बन गई। हैंडीक्राफ्ट का काम करने वाला लाला इस समय जयपुर के आदर्श नगर स्थित मोक्षधाम में चिताएं सजाता है। मेहंदीपुर बाला मंदिर में गाड़ी चलाने वाले मोहन लाल सैन और दौसा में स्कूल वैन चलाने वाले बृजमोहन जब बेरोजगार हुए तो कोरोना मरीजों के शवों को गाड़ियों से ढोने का काम करने लगे। करते भी क्या, कोई चारा भी तो नहीं है। पापी पेट का जो सवाल है। ये दो-चार तो नाम भर हैं। इस कोरोना ने न जाने कितनों की रोजी रोटी छीन ली, तो कितनों को सड़क पर ला खड़ा किया। भास्कर के ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़िए ऐसे ही मजबूर 3 युवाओं की कहानी।

आदर्श नगर मोक्षधाम में अंतिम संस्कार करते हुए कर्मचारी।
आदर्श नगर मोक्षधाम में अंतिम संस्कार करते हुए कर्मचारी।

हैंडीक्राफ्ट का कारीगर जला रहा लाश
आदर्श नगर मोक्षधाम में कोविड पेशेंट की लाशों पर लकड़ियां सजाने में मशगूल लाला 15-20 दिन पहले ही यहां आया है। पसीने से तरबतर लाला के हाथ अचानक रुकते हैं। थोड़ा सुस्ताने के बाद एक बोतल हाथ में लिए पानी भरने चल पड़ता है। साधारण कद-काठी वाला लाला पूछने पर बताता है कि वह आदर्श नगर के जनता कॉलोनी में हैंडीक्राफ्ट का काम करता था। लॉकडाउन लगा और काम- ठप हो गया। कई दिन तक वह घर खाली बैठा रहा। इस बीच किसी परिचित ने मोक्षधाम में काम दिला दिया। यहां से उसे रोज 500 रुपये मिल जाते हैं। लाला ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से इतने शव आ रहे हैं, वक्त नहीं मिल रहा। वह पिछले साल भी काम धंधा बंद होने पर यह काम कर चुका था, लेकिन तब इतने शव नहीं देखे थे।

चांदपोल मोक्षधाम में कोरोना संक्रमित शवों को एंबुलेंस से लाने का सिलसिला शुरू हो गया है
चांदपोल मोक्षधाम में कोरोना संक्रमित शवों को एंबुलेंस से लाने का सिलसिला शुरू हो गया है

टैक्सी तक बेचनी पड़ी है
सफेद रंग का कुर्ता पायजामा पहने एक शख्स मोक्षधाम के बाहर अपने साथी के साथ खड़े थे। अपना नाम मोहनलाल सैन बताते हुए कहा कि वे आज पहली बार एंबुलेंस लेकर आए हैं। अभी गाड़ी खड़ी की है। मोहनलाल ने कहा कि कोरोना में धंधा चला गया। वे पहले खुद की टैक्सी चलाते थे। काम मिलना बंद हुआ तो कार बेच दी। इसके बाद मेहंदीपुर बालाजी में गाड़ी चलाने की नौकरी करने लगे। दोबारा कोरोना बढ़ने से मंदिर बंद हो गए। जब नौकरी चली गई तो घर बैठ गए। एक परिचित की सिफारिश पर मैं और मेरे जानने वाले बृजमोहन मीणा दो दिन पहले ही जयपुर आए है। यहां हमें ठेकेदार ने एक-एक एंबुलेंस की चाबी पकड़वाई। पीपीई किट, सैनिटाइजर देते हुए कुछ हिदायत भी दी। इसके बाद कहा कि तुम्हें अस्पताल में कोरोना से हुई मौत वाले शवों को एंबुलेंस से मोक्षधाम पहुंचाना है। वे पहली बार आदर्श नगर मोक्षधाम पहुंचे तो यहां जल रही चिताओं को देखकर सन्न रह गए।

चांदपोल में कवर में पैक कोरोना संक्रमित व्यक्ति का शव अंतिम संस्कार के इंतजार में।
चांदपोल में कवर में पैक कोरोना संक्रमित व्यक्ति का शव अंतिम संस्कार के इंतजार में।

पहले बच्चों को छोड़ते थे स्कूल
मोहनलाल के साथी बृजमोहन ने बताया कि वह भी दौसा के एक स्कूल में वैन से बच्चों को छोड़ने का काम करते थे। लॉकडाउन के बाद स्कूल बंद हो गए। खर्च चलाना मुश्किल होने लगा। रोजगार की तलाश में मोहनलाल के साथ मैं भी जयपुर आ गया। अब कोरोना शवों को अंतिम संस्कार के लिए अस्पताल से मोक्ष धाम तक छोड़ने का काम मिला है।

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