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कबूतरों पर कार्रवाई क्यों:1887 से चली आ रही परंपरा पर लगी पाबंदी, कौवों की पॉजिटिव रिपोर्ट पर कबूतरों को दंड

जयपुर8 दिन पहले
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  • अल्बर्ट म्यूजियम के चारों ओर कबूतरों को दाना डालने से रोका, दाना बेचने वालों को हटाया
  • कौन सुने इनका दर्द : भूखे परिंदे ठौर छोड़ने को तैयार नहीं हुए, उड़ते और फिर उम्मीद में वहीं आ बैठते

शहर की कोई 100 साल से ज्यादा पुरानी परंपरा पर बुधवार को पहरे लग गए। एकतरफा फैसला। कौवों में पॉजिटिव आई बीमारी की आशंका मात्र से कबूतरों का चुग्गा छीन लिया गया। बगैर इन बेजुबानों के हक में सोचे पत्थर दिल प्रशासन ने अल्बर्ट म्यूजियम के चारों ओर कबूतरों को चुग्गा डालने पर पाबंदी लगा दी।

1887 में बनकर तैयार हुई इस ऐतिहासिक इमारत के साथ ही इन पक्षियों ने यहां अपना स्थायी ठिकाना बना हुआ है। और शहर इनमें अपना सुकूं तलाशता है। खुशियों के प्रतीक कबूतर के साथ शहर का एक नाता सा बना हुआ है। कल्चर बन बैठा। पीढ़ियों के साथ सीख आगे बढ़ती गई। इस पर एकाएक पहरे से लोग आहत हैं, बुधवार को जैसे-जैसे इसकी खबर फैली, लोगों का दिल टूट सा गया।

किसी के पास कबूतरों में बीमारी के प्रमाण ही नहीं हैं : छोलक
अल्बर्ट म्यूजियम के अधीक्षक राकेश छोलक ने कहा कि फिलहाल कोई रिपोर्ट नहीं मिली। न ही पशुपालन और चिड़ियाघर प्रशासन के पास कबूतरों में फ्लू की रिपोर्ट आई है। सवाल उठता है कि फिर उन्हें भूखे मरने को क्यों तड़पने दिया जा रहा है? हुआ भी यही। चुग्गा तो छीन गया, लेकिन पक्षी वहीं जमे रहे।

दिनभर अपने खाने की उम्मीद में कि बरसों बरस की तरह लोग आएंगे। कभी उड़ते और फिर आ बैठते। पक्षी टूरिज्म वाले दाने वालों को तलाशते रहे। भावनाएं आहत हुईं। कुछ ऐसे भी नियमित दानवीर थे जो नहीं माने। उनसे गार्ड ड्यूटी की बात कहकर उलझते भी रहे।

टोटल रिकॉल: मासूम कबूतरों के लिए बाज बुलाए थे
पीपल फॉर एनिमल के प्रदेश प्रभारी बाबूलाल जाजू ने 2007 की घटना का जिक्र किया जब अल्बर्ट हॉल से परिंदों को बाज से डराकर हटाने की कोशिश की थी। विरोध में मुकदमा दर्ज कराया। शहर साथ हुआ तो विरोध के सुर और मुखरित। मामला सीएम तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को रख उन्हें अवगत कराया कि परिंदों के आवास को नष्ट नहीं कर सकते। पक्षी प्रेमी और एक्टीविस्ट सूरज सोनी ने कहा कि तब सरकार ने सभी पार्कों में कबूतरखाने बनाने की बात कही, वो तो नहीं बने।

ये अमन-चैन के प्रतीक हैं, इनसे शहर की खुशियां जुड़ी हैं
ये कैसा निर्णय है पक्षियों को चुग्गा मत डालने दो। अल्बर्ट हॉल पर कोई आज से ये पक्षी नहीं हैं, बल्कि हमारी पीढ़ियों से जब से म्यूजियम की बसावट है, तब से ये इनका ठिकाना है। भावनाएं भी मायने रखती है या नहीं। लोगों को पक्षियों को दाना डालकर जो सुकून मिलता है, प्रशासन उसको छीनने पर आमादा है।

अजीबोगरीब तर्क: कबूतर हमारे यहां के हैं भी नहीं

पुरातत्व विभाग की पहल पर चुग्गा डालने वालों को रोका है। वैसे भी कबूतर हमारे यहां का है भी नहीं। अरब देशों का है। कौवे मर रहे हैं। क्योंकि वो मांसाहारी भी है। फिर कबूतरों पर पाबंदी क्यों? वो भी मर रहे हैं, बीमारी का तो पता नहीं।
-महेश तिवारी, डीएफओ, जेडीए

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