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सिस्‍टम का भेदभाव:बारिश में टूटी सड़कें आपदा हैं, इन पर 111 करोड़ खर्च भी किए गए लेकिन कोरोना से 3200 महिलाओं की माैत आपदा नहीं?

जयपुर16 दिन पहले
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प्रदेश में कोरोना से महिलाओं की मौत के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है।(फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar
प्रदेश में कोरोना से महिलाओं की मौत के लिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है।(फाइल फोटो)

पिछले वर्ष सरकार ने 111 करोड़ रुपए टूटी सड़कों की मरम्मत पर खर्च किए। अफसरों के लिए 1.11 करोड़ के 360 वायरलैस खरीदे। 655.98 करोड़ का बजट जिलों एवं विभागों को आवंटित किया। इतना कुछ आपदा प्रबंधन के लिए। ...लेकिन सरकार के कोरोना से महिलाओं की मौत के लिए मुआवजा नहीं है। जबकि दिसंबर तक आपदा राहत कोष में दिसंबर तक 2400 करोड़ जमा थे और यदि एक महिला मृतक पर एक लाख रुपए भी मुआवजा दे तो सिर्फ 32 करोड़ ही देने होंगे।

आंकड़े बताते हैं कि राज्य आपदा निधि में वर्ष 2020-21 में 1481 करोड़ केंद्र और 494 करोड़ राज्य सरकार के इकट्‌ठे हुए यानी कुल 1975 करोड़। पुराने बचे फंड को मिलाकर 3936 करोड़ रुपए हो गए। इसमें 216 करोड़ अकाल राहत, 655 करोड़ कोरोना से संबंधित कार्यों, 111 करोड़ सड़कों की मरम्मत और 80 लाख सरकारी भवनों की मरम्मत पर खर्च किए गए हैं। यानी 31 दिसंबर तक 1465 करोड़ खर्च के बाद भी 2471 करोड़ बैलेंस पड़ा है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को कोरोना ने, पति को उनके गम ने छीन लिया
बारां। जिले के कुंडी में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता दाखाबाई की कोरोना से मृत्यु हो गई। सारे दायित्व उन पर ही थे। वह कोरोना काल में लगातार सर्वे कर रही थीं। 4 मई को जिला अस्पताल बारां में कोरोना के उपचार के दौरान मृत्यु हो गई। उनके गम में मजदूर पिता भी 20 अगस्त को नहीं रहे। बेटा 8 महीने से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। कर्ज भी हो गया लेकिन कोई सहायता राशि नहीं मिली।

आटा चक्की लगा परिवार पाल रही थी विधवा मां, वह सहारा भी छिना
कोटा। लखावा राेड निवासी कशिश और अज्ञ के पिता की 2016 में हार्ट अटैक से म़ृत्यु हाे गई थी। पत्नी चेतना ने परिवार चलाने के लिए घर में ही आटा चक्की शुरू की। सब ठीक था लेकिन 29 अप्रेल को काेराेना ने चेतना की भी जान ले ली। अब बच्चे मामा और नाना-नानी के भरोसे हैं। सरकार की तरफ से न महिला की मौत पर कोई मुआवजा मिला और न ही अनाथ बच्चों के लिए मिलने वाली सहायता की गई।

मां की मौत से बिखरा परिवार, दादा-दादी के भरोसे दो मासूम
बूंदी। शहर की गुरुनानक कॉलोनी निवासी रेखा नामा की मौत से पूरा परिवार टूट गया। पति पारस नामा की मौत के बाद रेखा नामा आशा सहयोगिनी के पद पर कार्य करती हुई जैसे-तैसे अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही थीं, लेकिन लगातार काम करने के बाद 9 जून 2021 को रेखा नामा की कोरोना से मौत हो गई। 14 साल की सुकृति व 16 साल का वैभव अकेले रह गए। दोनों बच्चों की दादा-दादी परवरिश कर रहे हैं।

पिता नहीं थे, स्वच्छता सुपरवाइजर मां का सहारा भी दो मासूमों से छिना
डूंगरपुर। शहर के वसुंधरा विहार निवासी मंजुलाबेन पाटीदार के पति की करीब 10 साल पूर्व स्टोव फटने से मौत हो गई। हाल ही 5 जनवरी को कोरोना संक्रमण के चलते मंजुलाबेन की भी मौत हो गई। अब उसके 12 और 9 वर्षीय दो पुत्र अनाथ हो चुके हैं। मंजुलाबेन स्वच्छता परियोजना में सुपरवाइजर थीं। अभी यह तय नहीं हुआ है कि अनाथ बच्चे किसके पास रहेंगे। सरकार से भी कोई सहायता नहीं मिली।

विपक्ष का विरोध, सीएम ने दिया आश्वासन

नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़: सरकार जानबूझकर राज्य में महिला की मौत पर मुआवजा नहीं दे रही है।

सांसद दीया कुमारी: महिला मुखिया के सम्मान का ढोंग करने वाली सरकार की पोल खुल चुकी है।

सीएम गहलोत: कोरोना से पीड़ित हर व्यक्ति की मदद के लिए तैयार हैं। इस मामले काे भी दिखवाएंगे।

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