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फिल्मकार सत्यजीत रे का 100वां जन्मदिन:राजस्थान के रे; जैसलमेर के किले की पृष्ठभूमि में बनाई थी सबसे सफल कॉमर्शियल फिल्माें में शामिल सोनार केल्ला

जयपुर6 दिन पहलेलेखक: प्रेरणा साहनी
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  • विज्ञापन और ग्राफिक डिजाइन की दुनिया से लेकर किताबों और फिल्मों तक राजस्थान से उनका खास लगाव रहा है।
  • चाहे वो रेगिस्तान की जर्द मिट्‌टी से सनी,धोरों के गर्म सन्नाटे को चीरती हवाएं हों, जैसलमेर का सुनहरा किला ,वीरगाथाएं या फिर लंगा-मांगणियार का संगीत।

ये है राजस्थान से सत्यजीत के खास रिश्ते की कहानी

प्रदोश चंद्र मित्रा उर्फ फेलू दा को कौन नहीं जानता? बंगाली साहित्य का वो मशहूर जासूस जिसने 221 बेकर स्ट्रीट पर रहने वाले शरलॉक होम्स से पहले हिंदुस्तानी पाठकों को थ्रिलर और सस्पेंस से रूबरू करवाया। साबित किया कि मनोरंजन और बुद्धिमता का मेल संभव है। और इसका श्रेय जाता है लेखक और निर्देशक सत्यजीत रे को। फेलूदा के एडवेंचर पर आधारित 1971 में लिखी उनकी किताब ‘सोनार केल्ला’ यानी सोने का किला बंगाल की पीढ़ी की हर नई फसल को मुंह जुबानी याद हो जाती है। इसी कहानी पर उन्होंने 1974 में फिल्म बनाई और बंगाल को स्याही और स्क्रीन के जरिए राजस्थान से जोड़ दिया। बंगाल से निकला यह प्रादेशिक साहित्य इतना मशहूर हो गया है कि आज तक जैसलमेर के किले को सोनाल केल्ला के नाम से जाना जाता है। कहानी के किरदार मुकुल का जैसलमेर में दिखाया गया घर’ मुकुलबाड़ी’ भी पर्यटन स्थल की तरह मशहूर हो गया। ये सत्यजीत रे की रहस्यमयी कहानी का ही जादू ही है कि बंगाल से पर्यटक जैसलमेर देखने की हसरत लिए राजस्थान जरूर आते हैं। जैसलमेर के टूरिस्ट गाइड भी रे की इस फिल्म को अपनी ऐतिहासिक कहानियों के साथ सुनाने लगे हैं।

फिल्म की शूटिंग का चित्रकांन रे ने कुछ इस तरह किया था।
फिल्म की शूटिंग का चित्रकांन रे ने कुछ इस तरह किया था।

चित्तौड़ के राणाओं पर आधारित ‘राज काहिनी’ के लिए बनाए इलस्ट्रेशन

बहुत कम लोगों को पता होगा कि सत्यजीत रे का राजस्थान से रिश्ता फेलूदा के किरदार से कहीं ज्यादा पुराना है । उन्होंने 1940 के दशक में इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट के संस्थापक अबनिंद्रनाथ टैगौर द्वारा लिखी चित्तौड़ के राणाओं की वीरगाथा पर आधारित ‘राज काहिनी’संकलन के लिए इलस्ट्रेशन बनाए थे जो बिलकुल राजस्थान की पारंपरागत शैली में थे और उस दौर का एक अकल्पनीय प्रयोग भी। इस बीच उनके दादा द्वारा शुरू की गई बच्चों की मैगजीन ‘संदेश’ में उन्होंने बच्चों के लिए साइंस फिक्शन और यंग एडल्ट्स के लिए कहानियां लिखीं।

सोनार किला बुक कवर डिजाइन।
सोनार किला बुक कवर डिजाइन।

ब्लैक एंड वाइट फिल्म गूपी गायेन बाजा बायेन में नहीं दिखा सके थे राजस्थान के रंग

इटालियन फिल्म ‘ द बायसाइकिल थीफ’ देखने के बाद रे को अहसास हुआ कि सीमित संसाधनों ,नए कलाकारों और स्टूडियो से बाहर फिल्म बनाना मुमकिन है। इस फिल्म ने उनके अंदर के फिल्मकार को बाहर निकाला। उन्होंने तय किया कि वो फिल्में बनाएंगे लेकिन स्टूडियो के कंट्रोल्ड माहौल में नहीं बल्कि अलग-अलग लोकेशन पर शूटिंग कर। उन्होंने राजस्थान की लोकेशंस पर सबसे पहले अपने दादा उपेंद्र किशोर की कहानी ‘गूपी गायेन बाजा बायेन’पर एक म्यूजिकल फिल्म बनाई जिसे जैसलमेर,जोधपुर,कोटा,बूंदी और बीकानेर में शूट किया गया। वो इस फिल्म में राजस्थान के रंगों को स्क्रीन पर दिखाना चाहते थे लेकिन मुमकिन न हो सका। जैसलमेर के सूरज की किरणों से सना पीताम्बरी किला,रेलवे स्टेशन,हवाओं का संगीत उन्हें बार-बार बुलाता रहा और इसलिए अपनी सबसे चर्चित रोमांचक कहानी ‘सोनार केल्ला ‘ पर 1974 में उन्होने पर रंगीन फिल्म बनाने का फैसला लिया। उन्होंने राजस्थान के रंग,रहस्य,संगीत और गति को खूबसूरती से इस फिल्म में पिरोया।

सोन्नारर केल्ला में जैसलमेर रेलवे स्टेशन का दृश्य।
सोन्नारर केल्ला में जैसलमेर रेलवे स्टेशन का दृश्य।

45 दिनों में पूरी हो गई थी सोनार केल्ला की शूटिंग

सोनार केल्ला एक बच्चे मुकुल के पुनर्जन्म की कहानी है जिसे राजस्थान की अपने पिछले जन्म की कुछ यादें,महल,छिपा खजाना, युद्ध और सोने के किले की यादें परेशान करती हैं। पैरासाइकोलॉजिस्ट के साथ रेल मार्ग से वो उस जैसलमेर के किले तक पहुंचता है । खजाने के लालच में दो गुंडे उसे अगवा करना चाहते हैं और फेलूदा उसे बचाने की कोशिश करते हैं। यह उनकी सबसे सफल कॉमर्शियल फिल्म रही जिसके लिए उन्हें दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उनके बेटे संदीप रे ने उन्हें इस फिल्म की शूटिंग के दौरान फिल्माया था। संदीप के मुताबिक एक ही फिल्म में रेलगाड़ी, मोटर गाड़ी, ऊंट की यात्रा और टाइम ट्रैवल को एक साथ दिखाना सत्यजीत रे ही सोच सकते थे। उनके शब्द,संगीत,कहानी,किरदार,रंग और सोच सिनेमा को एक माध्यम नहीं बल्कि एक पूरा संवाद बनाते गए। सोनार केल्ला की पूरी फिल्म की शूटिंग सीमित संसाधनों और सुनियोजित तैयारी के साथ लगभग 45 दिनों में पूरी हो गई थी जिसमें से 15 दिन राजस्थान में शूटिंग हुई थी।

11 इंटरनेशनल अवॉर्ड जीत चुकी ‘पाथेर पांचाली’ के नाम के कारण फिल्म बनाने के लिए मिली सड़क निर्माण फंड से मदद

ढाई साल की उम्र में बच्चों के लिए साहित्य लिखने वाले पिता सुकुमार को खो चुके रे ने उन्ही कहानियों के जरिए अपने पिता को जाना। कॉलेज में उन्होंने पहले विज्ञान पढ़ा और उसे बीच में छोड़कर फिर इकोनॉमिक्स में ऑनर्स किया लेकिन ये दोनों उनके मन-मुताबिक विषय नहीं थे। फिर शांति निकेतन में कला को बारीकी से समझा। इस दौरान हर दिन अपने अंदर के कहानीकार की परवरिश करते रहे। जब ‘पाथेर पांचाली’ बनाने चले तो पैसों व स्पॉन्सर के अभाव में दोस्तों से 1000-1000 रुपए मांगे लेकिन ऐसे इकट्‌ठा किए 17 हजार रुपए नाकाफी थे। अपने पिता के मित्र और बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी रॉय से मदद मांगी। उस दौर में कला के लिए कोई विभाग या फंड तय नहीं था इसलिए बहुत सोचने के बाद फिल्म के नाम पाथेर पांचाली यानी रास्ते का गीत के आधार पर सड़क निर्माण के फंड से कुछ पैसे दिए। इससे पहले किसी सरकार ने किसी फिल्म को फाइनेंस नहीं किया था। 1955 में ‘पाथेर पांचाली ‘बनी और सुपरहिट फिल्म बन गई जिसने 11 इंटरनेशनल अवॉर्ड जीते।

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