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अमानीशाह वाटरहैड पहला पंपिंग स्टेशन:ब्रिटिशकाल का स्टीम इंजन सिर्फ एक बार चला, 3 घंटे में ही 16 कुओं का पानी, मिट्‌टी-पत्थर तक खींच डाले

जयपुर2 महीने पहले
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  • सात समुंदर पार से आई सौगात: महाराजा रामसिंह ने 1891 में बनवाया था पंपिंग स्टेशन
  • आधे शहर की बरसों बुझाई प्यास : छोटे स्टीम इंजन से शहर की नहरों में होती थी आपूर्ति
  • पानीपेच तिराहे पर लंदन निर्मित दो स्टीम इंजनों का है यह संयंत्र

(यतीश शर्मा). राजधानी के कई अनदेखे पहलुओं में शामिल विरासतों में से एक है पानीपेच स्थित अमानीशाह वॉटरहैड। 129 साल पहले वर्ष 1891 में तत्कालीन जयपुर के महाराज रामसिंह ने शहरवासियों की प्यास बुझाने के लिए लंदन से भाप से चलने वाली दो भारी-भरकम स्टीम इंजन सैट मंगवाए थे और विधि-विधान से इनकी पानीपेच तिराहे पर स्थापना की थी।

बैबकॉक और विलकॉक्स कंपनी द्वारा निर्मित यह संयंत्र अपने आप में बेजोड़ निर्माण कला और उच्चस्तरीय सामग्री का नायाब नमूना है। इस संयंत्र में भाप से चलने वाला इंजन, कोयला भट्‌टी, कोयले की आपूर्ति व सप्लाई, मानव श्रम का बेहतर प्रबंधन, जयपुर के भौगोलिक संसाधनों का सदुपयोग और आगामी समय में होने वाली आवश्यकताओं की पूर्ति की दूरगामी सोच के कारण ही प्रदेश का यह पहला पंपिंग स्टेशन बनने का गौरव प्राप्त कर सका। बिजली की उपलब्धता के कारण इसे बंद करना पड़ा, लेकिन इसे सहेजने के बजाय जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते आज यह संयंत्र अपने अस्तित्व की पहचान बचाने के लिए संघष कर रहा है। क्या हैं इसकी खासियतें और कितना अद्भुत है यह पंपिंग स्टेशन। आइए जानते हैं. इस खास रिपोर्ट में.
पानीपेच तिराहे पर बने अमानीशाह वाॅटरहैड में स्टीम इंजनों के लिए लिफ्ट के जरिये कोयला 50 फीट नीचे ढलान में बनाई गई भट्‌टी तक पहुंचता था। इसमें स्टील की 32 मोटी रॉड को विशेष क्रम से व्यवस्थित किया गया।
भट्‌टी में जलने वाले कोयले की आंच से ये गर्म होती थीं और भाप बनती थी। भाप कोे वॉल्व से नियंत्रित कर पाइप के जरिये स्टीम इंजन तक पहंुचाया जाता था। इससे संयंत्र का पहिया घूमता था और शॉफ्ट से बड़े-बड़े लकड़ी के पिस्टन पानी खींचकर मुख्य पाइपलाइन तक भेजते थे, जो नहरों में प्रवाहित किया जाता था।

इन इलाकों में होती थी जलापूर्ति
पानीपेच पंपिंग स्टेशन की मुख्य पाइप लाइन से शहर के इलाकों के लिए बनाई गई नहरों में जलापूर्ति की जाती थी। खासाकोठी, संजय सर्किल, छोटी चौपड़ और बड़ी चौपड़ के कुंड तक पहुंचता था और शहरवासी अपनी जरूरत के अनुसार पानी भर कर घर ले जाते थे।

ये 3 कारण, जो प्रदेश के इस संयंत्र को बनाते हैं सबसे अलग

1 बिना वेल्डिंग के बना पूरा सांचा, वोल्ट से कसा, नहीं दिखे जोड़
इस संयंत्र के लिए निर्माणकर्ता बैबॉक और विलकॉक्स कंपनी ने जो सांचा बनाया था, उसमें कहीं भी वैल्डिंग नहीं है। इन सांचों को जोड़ने में भी इंजीनियरिंग का सूक्ष्मता से ध्यान रखा गया है। बड़े-बड़े बोल्ट्स से इन्हें ऐसे जोड़ा गया, कि कहीं से भी एक बार पकड़ न तो ढीली हुई और न ही रिसाव हुआ। कंपनी ने बड़े-बड़े बाेल्ट्स को खोलने-कसने के लिए विशेष औजार भी भेजे थे,जो आज भी संरक्षित हैं।

2 आज तक ना लोहे में जंग, न ही लकड़ी के पिस्टन में दीमक लगी
दोनों संयंत्रों में इतना बेहतर इस्पात बनाया गया, जिसमें आज तक जंग नहीं लगी। इसके अलावा लकड़ी के दो बड़े पिस्टन भी हैं, इनमें भी आज तक दीमक नहीं लगी है, जबकि नमी और अंधेरे वाले वातावरण में से स्थापित हैं। छोटे इंजन के शॉफ्ट को गति देने वाला लोहे का पहिया 10 फीट की परिधि का है और बात करें बड़े इंजन के शॉफ्ट को चलाने वाले पहिए की तो उसकी परिधि 24 फीट है।

3 इस विरासत को सहेजना जरूरी, ताकि लापरवाही की भेंट न चढ़े
ये जलदाय विभाग की नहीं, बल्कि संपूर्ण प्रदेश के लिए एक ऐतिहासिक मशीनरी है, जो कि ब्रिटिश काल में इंजीनियरिंग की इस नायाब मिसाल को आज के आधुनिक दौर में भी बनाना असंभव है। ये ब्रिटिश काल में इसे जिस तकनीक से बनाया गया है, उसकी जानकारी, इंजीनियर्स, शिक्षकों विद्यार्थियों व आम लोगों को भी होनी चाहिए, ताकि ज्ञानवृद्धि हो और वे भी इस ऐतिहासिक संयंत्र को सहेजने में जुट जाएं।

पानीपेच तिराहे पर लंदन निर्मित दो स्टीम इंजनों का है यह संयंत्र

पुराइतिहासकारों के अनुसार लंदन-ग्लागो में जलापूर्ति के लिए 1874 ई. में इंजीनियर्स लंदन एंड एरिथ द्वारा बैबकॉक एंड विलकॉक्स कंपनी में बना पहला बॉलयल और स्टीम इंजन लगाया गया था। इसी का दूसरा प्रारूप जो विश्व का दूसरा और अंतिम था, वह पानीपेच तिराहे स्थित अमानीशाह वाॅटर हैड पर 129 साल पहले वर्ष 1891 में तत्कालीन जयपुर के महाराज रामसिंह ने शहनाई वादन के साथ स्थापित कराया था।

इंटक के प्रयासों के बाद मिला था हेरिटेज स्वरूप : शेखावत
कर्मचारी यूनियन इंटक जलदाय विभाग प्रदेशाध्यक्ष संजय सिंह शेखावत ने कहा कि रियायत काल में शहर की प्यास बुझाने वाला और देश में सबसे अनोखा और प्रदेश का यह पहला संयंत्र अपने आप में गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। बिजली आने पर इसे बंद कर दिया गया। हमारे प्रयासों के बाद वर्ष 2016 में तत्कालीन जलदाय मंत्री किरण माहेश्वरी ने इसे हैरिटेज रूप में विकसित करने के आदेश दिए थे, लेकिन एक बार फिर यह संयंत्र प्रशासनिक अनदेखी के चलते अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

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