विवादों में हरिदेव जोशी यूनिवर्सिटी:प्रिंट डिपार्टमेंट के HOD के पास करीब 5 साल का ही एक्सपीरियंस, चाहिए था 8 साल का

जयपुर7 महीने पहलेलेखक: स्मित पालीवाल

हरिदेव जोशी जर्नलिज्म यूनिवर्सिटी के प्रिंट डिपार्टमेंट के एचओडी मनोज लोढ़ा की यूनिवर्सिटी में नियुक्ति पर सवाल खड़े हो गए हैं। उनके खिलाफ गलत दस्तावेज और तथ्य प्रस्तुत कर यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर की नौकरी हासिल करने की शिकायत की गई थी। शिकायत पर जांच भी हुई और अब यूनिवर्सिटी ने 28 अप्रैल को होने वाली बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की बैठक में इस मामले को एजेंडे पर लिया है। बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की बैठक में सदस्यों की मौजूदगी में इस पर चर्चा होगी। सबकी सहमति बनी तो लोढ़ा पर क़ानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

वहीं अब इस पूरे भर्ती विवाद को लेकर हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के छात्रों में भी असमंजस की स्थिति है। क्योंकि मनोज लोढ़ा अगर अयोग्य घोषित होते हैं तो उनके कार्यकाल के दौरान पीएचडी करने वाले छात्रों के साथ ही उनके नेतृत्व में पढ़ने वाले सैकड़ों छात्रों की डिग्री पर भी सवालिया निशान खड़े हो जाएंगे।

यूनिवर्सिटी की कमेटी ने लोढ़ा की नियुक्ति को गलत करार दिया है। ऐसे में बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की बैठक में लोढ़ा पर कार्रवाई को लेकर फैसला लिया जाएगा।
यूनिवर्सिटी की कमेटी ने लोढ़ा की नियुक्ति को गलत करार दिया है। ऐसे में बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट की बैठक में लोढ़ा पर कार्रवाई को लेकर फैसला लिया जाएगा।

शिकायतकर्ता सत्येंद्र सिंह राठौड़ ने आरोप लगाया है कि मनोज लोढ़ा के पास यूजीसी रेग्युलेशन 2010 के तहत पर्याप्त अकादमिक अनुभव नहीं है। 2012 में जब उनकी नियुक्ति हुई, तब वे इस नियुक्ति के लिए अपात्र थे। ऐसे में उनकी नियुक्ति गलत तथ्यों के आधार पर हुई है। शिकायतकर्ता ने यूजीसी रेग्युलेशन 2010 के 4.3.0 का उल्लंघन कर मनोज लोढ़ा की नियुक्ति करने की शिकायत की है।

यूनिवर्सिटी की विभागीय जांच में पता चला है कि पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष मनोज लोढ़ा के पास नियुक्ति के वक्त यूजीसी रेग्युलेशन 2010 के तहत पर्याप्त अकादमिक अनुभव नहीं था।
यूनिवर्सिटी की विभागीय जांच में पता चला है कि पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष मनोज लोढ़ा के पास नियुक्ति के वक्त यूजीसी रेग्युलेशन 2010 के तहत पर्याप्त अकादमिक अनुभव नहीं था।

ये है यूजीसी की गाइडलाइन 4.3.0 (सह-प्रोफेसर)

  • पीएचडी डिग्री में प्राप्त श्रेष्ठ शैक्षणिक रिकॉर्ड जो डिग्री सम्बद्ध / समवर्गी/ सापेक्ष विषयों में प्राप्त की गई हो।
  • न्यूनतम 55 प्रतिशत अंकों के साथ स्नातकोत्तर डिग्री या फिर किसी 'पॉइन्ट स्केल' के अंतर्गत समस्तरीय ग्रेड हो, जहां पर ग्रेडिंग प्रणाली का अनुसरण किया जा रहा हो।
  • किसी भी विश्वविद्यालय महाविद्यालय या फिर प्रत्यायित शोध संस्थान / उद्योग में न्यूनतम 8 वर्ष का शिक्षण या फिर शोध का अनुभव हो, जो सहायक प्रोफेसर के स्तर के समतुल्य हो। इसके साथ ही जो समस्त अनुभव पीएचडी के लिए किए गए शोध के अतिरिक्त हों और प्रकाशित रचनाओं के साक्ष्य द्वारा समर्थित हो। न्यूनतम 5 प्रकाशित रचनाएं, जो पुस्तकों / शोध / विषयगत नीति जुड़े प्रपत्रों के साथ समर्थित होना जरूरी है।
  • अभ्यर्थी को शैक्षणिक नवोन्मेषी डिजाइन युक्त नया पाठ्यक्रम और पाठ्य विषयों और उसकी प्रौद्योगिकी-माध्य से युक्त शैक्षिक प्रक्रिया का अनुभव हो। इसके साथ ही इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करे कि उसने शोध छात्रों और अभ्यर्थियों का मार्ग दर्शन किया है।
  • इसके साथ ही शैक्षणिक निष्पादन सूचकांक (ए.पी.आई.) में निष्पादन आधारित समीक्षात्मक प्रणाली पर इंगित रहता है। इन सब के अनुरूप न्यूनतम प्राप्तांक होने अनिवार्य है।
ओम थानवी के कार्यकाल में मनोज लोढ़ा के खिलाफ जांच शुरू की गई थी।
ओम थानवी के कार्यकाल में मनोज लोढ़ा के खिलाफ जांच शुरू की गई थी।

जांच कमेटी ने मनोज लोढ़ा को माना अयोग्य

  • साल 2012 में आवेदन के वक्त मनोज लोढ़ा के पास के यूजीसी गाइडलाइन के अनुरूप 8 साल का वर्किंग एक्सपीरियंस नहीं था। कमेटी की जांच में पता चला है कि मनोज लोढ़ा को सिर्फ 4 साल 8 महीने का ही वर्क एक्सपीरियंस था।
  • यह भी पता चला है कि आवेदन के वक्त मनोज लोढ़ा शैक्षणिक तौर पर भी आवेदन करने योग्य नहीं थे। कमेटी को लोढ़ा की phd के दस्तावेज में भी गड़बड़ी मिली है, जिसे BOM बैठक में रखा जाएगा।
  • रिपोर्ट में यह भी पता चला है कि साल 2012 में आवेदन के लिए जो सिलेक्शन कमिटी बनाई गई थी, उसमें 14 लोगों ने आवेदन किया था। सिलेक्शन कमेटी ने सभी 14 लोगों को यूजीसी की गाइडलाइन के अनुरूप अयोग्य घोषित कर दिया था। इसके बाद गुपचुप तरीके से एक नई कमेटी का गठन किया गया। जिसने मनोज लोढ़ा को नियुक्त किया था। ऐसे में तत्कालीन सिलेक्शन कमेटी भी जांच के घेरे में आ गई है।

ओम थानवी ने रची साजिश : मनोज लोढ़ा मनोज लोढ़ा का कहना है कि ओम थानवी के कार्यकाल के दौरान यूनिवर्सिटी में काफी ऐसे काम हो रहे थे, जो नियम के अनुसार नहीं थे। जब मैंने उनका विरोध किया तो उन्होंने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया। सबसे पहले मुझे डीन पद से हटाया। उसके बाद डायरेक्टर पद से हटाया और उसके बाद हेड ऑफ द डिपार्टमेंट पद से भी हटा दिया। फिर भी मैं उनके कारनामों का विरोध करता रहा तो उन्होंने मेरी योग्यता पर ही सवाल खड़े कर दिए, जबकि मेरी नियुक्ति यूजीसी की गाइडलाइन के अनुरूप ही हुई थी।

शिकायत के बाद गठित की थी कमेटी : ओम थानवी
हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ओम थानवी ने कहा कि मनोज लोढ़ा की नियुक्ति को लेकर लगातार शिकायत मिली थी। जिसकी शुरुआती जांच यूनिवर्सिटी की इंटरनल कमेटी ने ही की थी। इसके बाद लोढ़ा की नियुक्ति की जांच एक्सटर्नल कमेटी को सौंप दी गई थी, जिसमें विश्वविद्यालय के बाहर के 3 प्रोफेसर को शामिल किया गया। इतीनों प्रोफेसर की जांच रिपोर्ट और लीगल ओपिनियन के आधार पर अब लोढ़ा की नियुक्ति पर BOM बैठक में ही फैसला होगा।

नियमों के तहत हुई थी नियुक्ति- सनी सेबेस्टियन
साल 2012 में हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे सनी सेबेस्टियन ने कहा कि मनोज लोढ़ा की नियुक्ति यूजीसी की गाइडलाइन के अनुरूप ही हुई थी। तब अटॉर्नी जनरल की गाइडलाइन के अनुरूप वर्क एक्सपीरियंस के आधार पर उन्हें नियुक्त किया गया था। उस वक्त सिर्फ मनोज लोढ़ा ही नहीं, बल्कि नारायण बारेठ और राजन महान की नियुक्ति भी वर्क एक्सपीरियंस के आधार पर हुई थी। ना जाने क्यों कुछ लोग बेवजह मनोज की नियुक्ति को विवादों में लाना चाह रहे हैं।