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कोरोनाकाल का सबसे बड़ा घोटाला:खनन विभाग ने लाइम स्टोन को मार्बल बता 1,000 करोड़ रु. की माइंस 5 करोड़ में दी

जयपुर5 दिन पहलेलेखक: प्रेम प्रताप सिंह/हर्ष खटाना
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लाइमस्टोन की माइंस को मार्बल श्रेणी में बदलकर आरडीएसए माइनिंग को आवंटित कर दिया गया। - Dainik Bhaskar
लाइमस्टोन की माइंस को मार्बल श्रेणी में बदलकर आरडीएसए माइनिंग को आवंटित कर दिया गया।
  • भास्कर बिग एक्सपोज - सरकार और आमजन जब दूसरी लहर से जंग लड़ रहे थे, तभी माइंस विभाग का ये ‘खेल’
  • जिम्मेदार का जवाब; खनन विभाग के एसीएस सुबोध बोले- आवंटन में नियमों का पालन हुआ, कोई गड़बड़ी नहीं

राजस्थान में जब सरकार और आमजन काेरोना से जंग लड़ रहे थे, उसी वक्त राज्य का खनन विभाग कोरोनाकाल के सबसे बड़े घोटाले को अंजाम दे रहा था। दरअसल, लाइमस्टोन की माइंस को मार्बल श्रेणी में बदलकर आरडीएसए माइनिंग को आवंटित कर दिया गया, जिससे करीब एक हजार करोड़ रु. के राजस्व के नुकसान का अनुमान है।

खान विभाग ने प्रतापगढ़ के पिपलखूंट तहसील के दांता में 74.249 हेक्टेयर और केला-मेला में 10.4162 हेक्टेयर क्षेत्रफल में लाइमस्टोन यानी सीमेंट की श्रेणी बदलकर मार्बल कर दी। इससे फर्क ये पड़ा कि लाइम स्टोन मेजर मिनरल में आता है, जिसकी नीलामी केंद्र के नियमों के अनुसार करने का प्रावधान है। जबकि मार्बल माइनर मिनरल में आता है और इसकी राज्य सरकार के नियमों से नीलामी की जाती है।

श्रेणी बदलकर विभाग ने मार्बल के लिए दोनों ब्लाॅक आरडीएसए माइनिंग को आवंटित कर दिए। इसे लेकर सीधे तौर पर खनन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव सुबोध अग्रवाल और खान निदेशक केबी पांड्या की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। माना जा रहा है कि 2015 में भाजपा सरकार के दौरान हुए खान घोटाले के बाद की यह सबसे बड़ी गड़बड़ी है।

5 सवालों में पढ़िए, घोटाले का पूरा पोस्टमार्टम

1. 9 महीने में लाइम स्टोन मार्बल कैसे हो गया?

  • खान विभाग का 1983-85 के बीच कराया गया सर्वे कहता है कि प्रतापगढ़ के इन दोनों ब्लॉक में लाइम स्टोन है।
  • 24 जुलाई 2019 को एक और कमेटी ने अपनी रिपोर्ट दी कि खनिज उपयोग की दृष्टि से इसे लाइम स्टोम की श्रेणी में रखना चाहिए।
  • 9 महीने बाद ही 27 फरवरी 2020 को दो सदस्यों की दूसरी कमेटी ने कहा कि यहां लाइम स्टोन नहीं, मार्बल है। और इसी आधार पर दोनों ब्लॉक मार्बल के लिए आवंटित भी कर दिए गए।
  • 20 फरवरी 2020 को भू-वैज्ञानिक अतिरिक्त निदेशक भू वैज्ञानिक एसएन डोडिया को एपीओ करके यह खेल किया गया।

2. एक हजार करोड़ रु. का नुकसान कैसे हुआ?

इन दोनों ब्लॉक में 11.4 करोड़ टन लाइमस्टोन होने का अनुमान है। चूंकि लाइम स्टोन मेजर मिनरल है। ऐसे में इनके लिए 419 करोड़ रु. से बोली शुरू होती, जो करीब एक से डेढ़ हजार करोड़ रु. तक जाती। मगर मार्बल की श्रेणी में आते ही सिर्फ 4-5 करोड़ रु. ही जमा करने पड़ते हैं। डेढ़ हजार करोड़ की बोली के अनुमान का अाधार ये है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में नागौर में 250-250 हेक्टेयर के माइंस ब्लॉक 5-6 हजार करोड़ रु. में नीलाम हुए थे। चूंकि प्रतापगढ़ के दोनों ब्लॉक करीब 85 हेक्टेयर के हैं, ऐसे में इनकी बोली हजार-डेढ़ हजार करोड़ रु. तक जाती।

3. सिर्फ मार्बल निकालने की शर्त क्यों नहीं है?

खान विभाग की ओर से जो मार्बल की माइंस आवंटित की गई हैं। सूत्रों का कहना है कि दरअसल मार्बल के नाम पर खान का आवंटन करके इसका उपयोग लाइम स्टोन में लिया जाएगा। कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाने के लिए यह शर्त भी नहीं जोड़ी गई है कि निकलने वाले मिनरल का उपयोग सीमेंट कंपनी के लिए ही किया जाएगा। दिलचस्प यह है कि प्रतापगढ़ के पिपलखूंट तहसील के दांता और केला में मार्बल की माइंस आवंटित की गई है। जबकि उसके आसपास एक भी मार्बल की माइंस नहीं है।

4. रिकवरी 30% तक तो दावा 70% का क्यों?

अफसरों का तर्क है कि मार्बल में माइंस का आवंटन करने से 70% तक रिकवरी होगी, जिससे अधिक राॅयल्टी मिलेगी। लेकिन वास्तव में ऐसा संभव नहीं है। राजस्थान में आज तक जितनी भी मार्बल की माइंस हैं, उनसे अधिकतम 25 से 30% ही रिकवरी हो पाती है। ऐसे में 70% रिकवरी की गणना केवल मैनुपलेशन करने के लिए की गई है। नियम में यह भी प्रावधान है कि जिस खनिज के लिए नीलामी की गई है। उसकी जगह दूसरा खनिज निकला तो माइंस को निकलने वाले खनिज की श्रेणी में ही माना जाएगा।

5. सुबोध के आते ही फाइल सरपट क्यों दौड़ी?

70 साल की परंपरा तोड़कर जैसे ही सुबोध अग्रवाल जूनियर सीएस के अंडर में काम करने के लिए 8 अप्रैल 2021 को माइंस डिपार्टमेंट में आए। प्रतापगढ़ ब्लॉक व राकेश मोरदिया की फाइलें सरपट दौड़ पड़ीं। जुलाई 2020 से 4 नवंबर 2020 तक 1988 बैच के आईएएस सुबोध अग्रवाल ही खनन विभाग के मुखिया थे।

पारदर्शी तरीके से आवंटन

प्रतापगढ़ में पारदर्शी तरीके से नियमानुसार आवंटन हुआ। कोई गड़बड़ी नहीं हुई। मार्बल से सरकार को कई गुना ज्यादा रॉयल्टी मिलेगी।
-सुबोध अग्रवाल, एसीएस, खान एवं पेट्रोलियम

खनन विभाग को 273 करोड़ रुपए की एक और चपत...क्योंकि मोरदिया से वसूली के लिए कोर्ट में अपील ही नहीं करेगा विभाग

तर्क ये कि...एजी की रिपोर्ट के आधार पर फैसला लिया

जयपुर. कांग्रेस विधायक परसराम मोरदिया के बेटे राकेश मोरदिया और उनकी कंपनी एमजीएम स्टोन एग्रीगेट प्राइवेट लिमिटेड से 273 करोड़ रुपये की वसूली करने के लिए खनन विभाग हाईकोर्ट की डबल बेंच में अपील नहीं करेगा। ये फैसला भी हाल ही में लिया गया है। इससे भी खान विभाग को 273 करोड़ रुपए सीधे तौर पर राजस्व का नुकसान होगा। जबकि 7 अप्रैल 2021 को ही राज्य सरकार की ओर से अपील करने का निर्णय किया गया था। दरअसल प्रमुख सचिव खान के पास 29 दिसंबर 2014 और 9 मार्च 2015 को शिकायत आई थी।

खान विभाग की विजिलेंस टीम ने जांच में पाया कि खनन पट्टा संख्या 367/ 2006 और 368/2006 में 7.32 और 23.20 लाख मीट्रिक टन स्वीकृत क्षेत्र के अंतर से बिना कोई राॅयल्टी जमा कराए मार्बल निकाल दिया गया। 2012 में भी जांच में अवैध खनन की पुष्टि हुई थी। उस समय भी कांग्रेस सरकार थी। भाजपा सरकार के कार्यकाल में अतिरिक्त निदेशक खान आरके हीरात ने 273 करोड़ रुपए की जुर्माने की रकम को निरस्त कर नए सिरे से जांच करने का आदेश दिया था।

सरकार के संज्ञान में आते ही विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त निदेशक आरके नलवाया से जांच कराई गई। जांच के बाद सरकार ने अतिरिक्त निदेशक आरके हीरात और माइनिंग इंजीनियर अनिल खमेसरा को सस्पेंड कर दिया था। इस बीच हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने मोरदिया को राहत दे दी है, जिसके खिलाफ राज्य सरकार डबल बेंच में अपील में नहीं जा रही है। इसका नतीजा राजस्व नुकसान के रूप में सामने आएगा।

खनन विभाग ने खुद के स्तर पर काेई फैसला नहीं किया है: सुबोध

खान विभाग ने इस मामले में खुद के स्तर पर कोई फैसला नहीं किया है। इस मामले में एजी से राय मांगी गई थी। एजी की रिपोर्ट के आधार पर ही अपील न करने का फैसला किया गया है।
-सुबोध अग्रवाल, एसीएस, खान विभाग