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कानून की विवेचना:अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ने पर भी विधायक को अयोग्य ठहराया जा सकता है

जयपुर11 दिन पहले
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प्रतीकात्मक फोटो।
  • दसवीं अनुसूची 2(1)a और b का विवेचन कर इसकी विस्तृत व्याख्या कर रहे हैं जस्टिस (रिटायर्ड) शिव कुमार शर्मा

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल बदल कानून का विस्तार से उल्लेख है। राजस्थान के सन्दर्भ में इन दिनों यह दसवीं अनुसूची खासी चर्चा में है। एक तरफ मुख्यमंत्री आवास पर और होटल में आयोजित सत्तादल के विधायकों की बैठक के संबंध में मुख्य सचेतक द्वारा जारी की गई व्हिप की वैधता सवालों के घेरे में है तो दूसरी ओर बहुजन समाज पार्टी के सभी छ विधायकों के कांग्रेस पार्टी में विलय को अवैध बताया जा रहा है। मैं इस लेख में किसी दल के पक्ष या विपक्ष में टिप्पणी नहीं कर रहा हूं, लेकिन मेरे मत में जो कानूनी स्थिति है उसका उल्लेख कर रहा हूं।

पार्टी छोड़ने पर भी जा सकती है सदस्यता
दसवीं अनुसूची की धारा 2(1)a यह कहती है कि जब कोई विधायक स्वेच्छा से दल का परित्याग कर देता है तो वह उस दल में बने रहने की अयोग्यता अर्जित कर लेता है। यह आवश्यक नहीं है कि विधायक द्वारा ऐसा परित्याग लिखित में ही हो, उसके आचरण से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है। निस्संदेह विधायक को भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है लेकिन विधायक का ऐसा आचरण जो उसकी पार्टी के प्रति अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता हो, धारा 2(1)a के अंतर्गत अयोग्यता का आधार बन सकता है।

व्हिप के उल्लंघन पर भी अयोग्य हो सकते हैं विधायक
धारा 2(1)b दल के मुख्य सचेतक द्वारा विधानसभा सत्र के दौरान जारी की गई व्हिप के उल्लंघन से जुड़ी है। ऐसा उल्लंघन करने पर भी विधायक, उस दल की अयोग्यता अर्जित कर लेता है जिसका वह सदस्य है। धारा 2(1)a एवं धारा 2(1)b एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं। धारा 2(1)a को आकर्षित करने के लिए व्हिप का उल्लंघन किया जाना आवश्यक नहीं, केवल विधायक द्वारा ऐसा आचरण किया जाना पर्याप्त है जिससे यह परिलक्षित होता हो कि विधायक ने स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ दी है।

अब आते हैं बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) के सभी छह सदस्यों द्वारा कांग्रेस पार्टी में विलय के प्रश्न पर। दसवीं अनुसूची यह निर्देश देती है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई सदस्य दूसरे दल में खुद का विलय कर लेते हैं तो वे अयोग्यता अर्जित नही करते। इस दृष्टि से बसपा के छह सदस्यों के कांग्रेस में विलय में कोई दोष प्रतीत नहीं होता। लेकिन इस विलय की आपत्ति का आधार यह है कि बसपा चूंकि राष्ट्रीय दल है, इसलिए दल की सुप्रीमो की सहमति से या राष्ट्रीय दल का ही विलय हो सकता है।

निर्विवाद रूप से बसपा के सभी छह विधायकों का कांग्रेस में विलय सितंबर, 2019 में हो चुका था। इस विलय का ज्ञान बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्षा को सितंबर, 2019 में ही हो चुका था। लगभग 10 माह तक इस विलय को चुनौती न देना क्या इस ओर संकेत नहीं देता कि इस विलय को अप्रत्यक्ष स्वीकृति मिली हुई थी। मेरे मत में ऐसे प्रकरणों मे विलंब से दी गई चुनौती कुछ अपवादों को छोड़कर अनुतोष प्रदान करने में बाधक होती है। अंतिम निर्णय न्यायालय को करना है।

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