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जिम्मेदारों की अनदेखी मरीजों पर पड़ रही भारी:गरीबों के दिल की सुने कौन: एसएमएस में 2 साल से 24 हार्ट ट्रांसप्लांट बजट के बिना अटके, निजी को भेज रहे ब्रेनडेड के ऑर्गन

जयपुर3 महीने पहले
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प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल में दो साल से फंड की कमी की वजह से हार्ट ट्रांसप्लांट का काम बंद पड़ा है। - Dainik Bhaskar
प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल में दो साल से फंड की कमी की वजह से हार्ट ट्रांसप्लांट का काम बंद पड़ा है।

राज्य सरकार ऑर्गन डोनेट को बढ़ावा देने के लिए कई तरीके से प्रयास कर रही है, मगर इसके लिए फंड की कमी पूरी नहीं कर पा रही है। प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल में दो साल से फंड की कमी की वजह से हार्ट ट्रांसप्लांट का काम बंद पड़ा है। इसके चलते अस्पताल में प्रदेश के गरीब लोगों के हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहे हैं। वहीं अस्पताल में आने वाले ब्रेनडेड लोगों के हार्ट सहित अन्य ऑर्गन निजी अस्पतालों में भेजे जा रहे हैं। निजी अस्पतालों में हार्ट ट्रांसप्लांट के 25 लाख रुपए तक लग रहे हैं। दूसरी तरफ एसएमएस अस्पताल में करीब 10 लाख रुपए तक का ही खर्च आता है, यह राशि भी सरकार वहन करती है।

एसएमएस अस्पताल में हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए 24 मरीजों ने रजिस्ट्रेशन करा रखा है। ये लोग दो साल से इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अस्पताल में आने वाले ब्रेनडेड मरीजों के ऑर्गन और जांच में मैच होने के बाद भी फंड की कमी की वजह से ट्रांसप्लांट नहीं हो पा रहे हैं। मरीजों को मजबूरन निजी अस्पताल में जाना पड़ रहा है। दो साल में एसएमएस अस्पताल से पांच लोग ब्रेनडेड हो चुके हैं।

पांच माह...तीन ट्रांसप्लांट, लेकिन पिछले दो साल में एक भी नहीं

एसएमएस अस्पताल में जनवरी 2020 में पहला हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ था। इसके बाद इसी साल मार्च और मई में ट्रांसप्लांट हुए, फिर कोरोना आ गया। पहले तो कोरोना की वजह से ट्रांसप्लांट नहीं हुए। अब कोरोना कम हुआ तो अस्पताल प्रशासन फंड नहीं मिलने की वजह बताकर ट्रांसप्लांट नहीं कर रहा है। पहला हार्ट ट्रांसप्लांट 8 साल पहले 6 घंटे में हुआ था।

प्रदेश में सबसे पहले हार्ट ट्रांसप्लांट की शुरुआत 8 साल पहले महात्मा गांधी अस्पताल में हुई। अस्पताल में पहला ट्रांसप्लांट 2 अगस्त 2015 में हुआ। इसमें ब्रेनडेड और रिसीवर दोनों एक ही अस्पताल में मौजूद थे। ट्रांसप्लांट अस्पताल के डॉ. चिश्ती और उनकी टीम ने राजू नाम के ब्रेनडेड मरीज का हार्ट सूरजभान में ट्रांसप्लांट किया था। ट्रांसप्लांट में 12 डॉक्टर सहित 24 लोगों की की टीम लगी थी। ऑपरेशन में करीब 6 घंटे लगे थे।

पहला हार्ट ट्रांसप्लांट: महात्मा गांधी में सात साल पहले
प्रदेश का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट महात्मा गांधी अस्पताल में 2 अगस्त 2015 को नि:शुल्क हुआ था। इसके बाद एसएमएस और ईएचसीसी में हार्ट ट्रांसप्लांट की शुरुआत हुई। महात्मा गांधी में डॉ. एमए चिश्ती की टीम ने सात साल पहले सूरजभान का किया था। ट्रांसप्लांट के तीन महीने बाद ही खेत में काम करना शुरू कर दिया था। अभी खेत में काम कर रहा है। अस्पताल में मरीज का नि:शुल्क चैकअप किया जाता है।

दस में से आठ लोग जी रहे हैं नॉर्मल जिंदगी
राजधानी में आठ साल में दो निजी और एक सरकारी अस्पताल को मिलाकर 10 हार्ट ट्रांसप्लांट हुए हैं। इसमें से आठ लोग नॉर्मल जिंदगी जी रहे हैं। दो लोगों की मौत हो चुकी है। दो से एक की मौत कोविड की वजह से हुई है। सबसे अधिक हार्ट ट्रांसप्लांट ईएचसीसी अस्पताल में 6 हुए हैं। एसएमएस अस्पताल में तीन और महात्मा गांधी अस्पताल में एक हुआ है।

फंड की कमी की वजह से अस्पताल में हार्ट ट्रांसप्लांट नहीं अटके हुए हैं। मरीज के ब्लड ग्रुप सहित अन्य जांचें मैच नहीं होने की वजह से ट्रांसप्लांट नहीं हो रहे होंगे। -डॉ. विनय मल्होत्रा, अधीक्षक, एसएमएस अस्पताल

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