वे 3 महिलाएं, जिन्होंने आपदा को अवसर में बदला:पति की नौकरी छूटी तो मास्क बेचकर परिवार को पाला, किसी ने मुश्किल वक्त में खड़ा किया बिजनेस

जयपुरएक वर्ष पहलेलेखक: आलोक खण्डेलवाल
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कोरोना ने बहुत कुछ सीखा दिया। मुश्किल हालात से लड़ना भी। जिंदगी में पहली बार हर किसी ने लॉकडाउन देखा। धड़ाधड़ नौकरियां जा रही थीं। बिजनेस बंद हो रहे थे। रोजमर्रा की कमाई वालों पर तो जैसे पहाड़ टूट गया। बीमारी ने कुछ परिवारों से उनके सबसे अहम किरदार को छीन लिया। किसी परिवार की रोजी छिन गई। लेकिन, घनघोर अंधेरे के बीच में कुछ ऐसी भी थीं, जिन्होंने हौसले और प्रेरणा से टूटते घरों को बचाया। बिखरते सपनों को संजोया। विलाप को संकल्प में बदला। आपदा को अवसर में बदलने की ऐसी ही तीन कहानियां...

1- मास्क बनाए ताकि परिवार को भूखा न रहना पड़े

जयपुर के जवाहर नगर में रहने वाली लक्षिता के घर की स्थिति लॉकडाउन में अस्त-व्यस्त हो गई। पति का कामकाज छूट गया। परिवार में कमाने वाला कोई नहीं था। लॉकडाउन में कोई बिजनेस भी नहीं किया जा सकता था। काम कैसे चले, इस पर लक्षिता ने खुद कुछ करने की ठानी। लक्षिता ने बताया कि उसने मास्क बनाने का काम शुरू किया। लगा कि अभी मास्क की सबसे ज्यादा जरूरत है। उनको सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित किया। फिर कुर्ती, ड्रेस आदि की फोटो लेकर उनको शेयर करना शुरू कर दिया। उस समय थोड़ी हिम्मत आई, जब उसके जैसी अन्य महिलाओं को भी ऐसे ही काम की जरूरत थी। लक्षिता कहती हैं- वे महिलाएं मुझसे जुड़ गई और उन्होंने मेरे द्वारा बेचे जाने वाले आइटम्स की खरीद शुरू कर दी। सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाकर काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे काम बढ़ा तो परिवार को चला पाने की स्थिति मे खड़ी हो गई। अब कुछ बच्चों को पढ़ाने का काम भी शुरू कर दिया है। इससे परिवार को कुछ संबल दे पा रही हूं।

2- ऐसी महिलाओं को जोड़ा, जिनका परिवार सड़क पर आने की स्थिति में पहुंच गया था

जयपुर के गोविंदपुरा की रहने वाली उमा शर्मा, ऐसी महिला हैं, जिनकी नजर ऐसी महिलाओं पर पड़ी जिनका परिवार लॉकडाउन में पूरी तरह से टूट गया था। ऐसे परिवार जिनके यहां कमाने वाला साथी या तो कोरोना का शिकार हो गया या कमाई खत्म हो गई। ऐसे परिवारों की स्थिति पूरी तरह डांवाडोल होने लगी थी। उस दौरान उमा ने महिलाओं को अपने पास बुलाया और मोटिवेट किया। उमा ने बताया- जब मैंने उनके घर की स्थिति देखी तो रहा नहीं गया। आवश्यकताओं की बात दूर, खाने तक के लाले पड़ गए थे। ऐसे में मैंने उन्हें छोटा-छोटा काम करने की सलाह दी। उनको इकट्‌ठा करके मास्क, एप्रेन और ऐसी ही छोटी-छोटी चीजें बनाना सिखाया। वे इसे कैसे बेचें, यह समझाया। ऐसी महिलाओं ने सोशल मीडिया से अपने बनाए आइटम्स की बिक्री शुरू की। फिर कुछ ऐसे लोगों की खोज की जो लॉकडाउन में मास्क वितरित कर रहे थे। वे दुकानों से मास्क खरीद रहे थे, मैंने उन्हें ऐसी महिलाओं से मास्क लेने को कहा तो इन महिलाओं का काम चल गया। आज ये महिलाएं न केवल मास्क बना रही हैं, बल्कि तरीके से सिलाई सीखकर अन्य सभी तरह के कपड़े बनाने का काम यानी सिलाई का काम कर रही हैं। परिवार अब पूरी तरह महिलाओं की मेहनत के बल पर चलने लगा है।

3- परिवार पर संकट आया था, मैं तो हार गई थी, लेकिन फिर बदल गई जिंदगी

जयपुर के मॉडल टाउन एरिया में रहती हैं प्राची। लॉकडाउन में जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा था। प्राची कहती हैं- सास बीमार रहती हैं। उनकी दवा की तंगी आ गई। पति का बिजनेस ठप हो गया। घर बैठ गए। उनका कामकाज पूरी तरह बंद हो गया। बच्चे भी परेशान थे। सुबह उठते, दोपहर ऐसे ही निकलती और बस रात को बिना काम थक-हार कर सो जाते। सोचते, कल नई सुबह आएगी। फिर सुबह होती, दिन निकलता, कुछ सोचते- घंटों निकल जाते। फिर, ईश्वर ने पता नहीं कहां से हिम्मत दी। सच है, 'जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर है, ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है।' घर की दीवार पर टंगे एक कैलेंडर की इस लाइन पर नजर पड़ी। बस फिर मैंने भी सोचा, ईश्वर ने घर-परिवार दिया है, पैदा किया है तो कुछ सोच ही रखा होगा। हिम्मत जुटाई, अपने अंदर ताकत लाई और इसी हिम्मत के बीच पति ने एक फोन नंबर दिया। मेरे लिए तो यह जैसे एक बूस्टर डोज थी। मैंने कॉल किया। यह मेरे और परिवार के लिए जैसे टर्निंग पॉइंट था। मैंने अपना बिजनेस खड़ा करने का फैसला किया।

इंटरेस्ट का करो इन्वेस्टमेंट

प्राची ने बताया, जिस नंबर पर फोन किया वह महिला का था। उन्होंने सुझाव दिया कि अपने इंटरेस्ट का इन्वेस्ट करो और कमाई करो। बस मैंने वैसा ही किया। उनके द्वारा भेजे गए हैंडीक्राफ, राजस्थानी संस्कृति से जुड़े आइटम्स को अपने परिचितों में शेयर करना शुरू कर दिया। जब पहला ऑर्डर आया तो बस आंखों से पानी झलक गया था। पहली और छोटी सी डिमांड ने पूरे परिवार को नई रोशनी दे दी। उस रोशनी के उजाले में आगे बढ़ती गई। फोटो शेयर करने का सिलसिला बढ़ गया। ऑर्डर की संख्या बढ़ने लगी। चंद दिनों में परिवार को संभालने की स्थिति बन गई। जिस कोविड ने परिवार को हिला दिया था, उसी ने नई राह भी दिखा दी। आज मुझे न केवल मेरे परिवार के सदस्य बल्कि पहचान वाले भी कहते हैं- तुम तो बिजनेस लेडी बन गई हो। सुनकर मुझे बहुत अच्छा और सुकून भरा लगता है। आखिर मुझे भी अहसास हो गया न केवल अपनी ताकत का, बल्कि इस बात का भी कि आवश्यकता के अनुरूप एक महिला की भी जिम्मेदारी होती है कि वह घर चलाने का जज्बा खुद में पैदा करे।

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