रणथम्भौर नेशनल पार्क के विस्थापित गांवों में खेती:विस्थापित परिवार पैकेज लेने के बाद भी कर रहे खेती, जिम्मेदार बेखबर, 12 साल बाद भी वन विभाग के नाम नहीं खुल सका नामांतरण

सवाई माधोपुर14 दिन पहले
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हिन्दवाड़ गांव में एक खेत में खड़ी फसल। - Dainik Bhaskar
हिन्दवाड़ गांव में एक खेत में खड़ी फसल।

रणथम्भौर नेशनल पार्क से विस्थापित गांवों में अभी भी खेती हो रही है। रणथम्भौर से विस्थापित हिन्दवाड़ गांव में विस्थापित परिवारों के खेतों में फसलें लहरा रही है, जबकि वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी इन सब से बेखबर बने हुए हैं। फलौदी रेंज क्षेत्र से हिन्दवाड़ गांव को वन विभाग की ओर से विस्थापित किया जा चुका है। विस्थापन से पहले यहां करीब 500 परिवार रहते थे। जिनमें से करीब 300 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है। विस्थापित परिवारों को वन विभाग की ओर से विस्थापन योजना के तहत पैकेज भी दिया जा चुका है।

खेत में लहलहाती फसल।
खेत में लहलहाती फसल।

पैकेज मिलने के बाद इन परिवारों को गांव और कृषि भूमि को छोड़कर जाना था, लेकिन विस्थापन के बाद भी लोग यहां अभी तक भी खेती कर रहे हैं। रणथम्भौर नेशनल पार्क में बाघों को विचरण के लिए और अधिक क्षेत्र उपलब्ध करवाने व बाघों के आबादी क्षेत्र में पलायन पर रोक लगाने के लिए पार्क में सीमा में बसे कई गांवों को विस्थापित किया जाना था। रणथम्भौर वन क्षेत्र में बसे गांवों के विस्थापन का काम 2002 से चल रहा है, लेकिन 18 सालों में विस्थापन के लिए चिन्हित किए गए 22 में से केवल 5 गांव ही विस्थापित किए जा सके हैं।

विस्थापन की इस प्रक्रिया में अब तक 1 अरब 18 करोड़ 63 लाख 50 हजार खर्च किए जा चुके हैं। इन पांच गांवों में कालीभाट, हिंदवाड़, मुंद्राहेडी, गढी, काला खोहरा आदि गांवों का 2009 में सर्वे हुआ था। 2009 में किए गए सर्वे के आधार पर हिंदवाड़ में 575, मुंद्राहेड़ी में 161 परिवार, कालीभाट में 47, गढ़ी में 49 व कालाखोहरा में 47 परिवार विस्थापन के लिए चिन्हित किए गए थे। विभाग द्वारा इन 5 गांवों के प्रत्येक परिवार को 3 किस्तों में करीब ढाई लाख रुपए के हिसाब से 21 करोड़ 97 लाख 50 हजार रुपए की राशि का भुगतान किया जा चुका है। इसके बावजूद ग्रामीण वापस गांव में आकर खेती-बाड़ी करने लग गए हैं।

12 साल बाद भी वन विभाग के नाम नहीं खुल सका नामांतरण
जानकारी के अनुसार 12 साल बाद भी वन विभाग के नाम नामांतरण भी नहीं खुल सका है। वन विभाग की ओर से 21 करोड़ 97 लाख 50 हजार रुपए की राशि का भुगतान करने के बाद भी नामांतरण अपने नाम नहीं खुलवाया गया है। जिसके चलते जो परिवार यहां से विस्थापित हो चुके है। वह अभी भी यहां खेती कर रहे हैं और फसलें लहरा रही है, जबकि वन विभाग मौन बना हुआ है।

इनका कहना है
मामला पुराना है। विस्थापन मेरे समय नहीं हुआ था। इस बारे में जानकारी लेकर कुछ कह पाउंगा। अगर विस्थापित परिवार खेती कर रहे हैं, तो कार्रवाई करवाई जाएगी।
-टीसी वर्मा, सीसीएफ, रणथम्भौर नेशनल पार्क

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